(Minghui.org) पिछले कई वर्षों से मैं मुख्य रूप से ऐसी सामग्री छापने का कार्य करती रही हूँ जो लोगों को सच्चाई से अवगत कराने में सहायता करती है। लेकिन चिंता और भय जैसी मानवीय आसक्तियों के कारण मैं स्वयं बाहर जाकर लोगों को आमने-सामने सच्चाई नहीं बता पाती थी। इसलिए मैं हमेशा उन अभ्यासियों की प्रशंसा करती थी जो गरिमापूर्ण और सद्विचारपूर्ण तरीके से यह कार्य करते थे।
मैंने अंतर्मन में झाँककर देखा और पाया कि मेरे मन में एक स्वार्थपूर्ण विचार छिपा हुआ था—यदि मैं स्वयं बाहर जाकर लोगों को सच्चाई नहीं बताऊँगी, तो शायद मैं साधना के लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाऊँगी। इसके साथ ही मेरे भीतर अपमानित होने का भय भी था।
एक और कारण यह था कि मेरे माता-पिता का देहांत बहुत पहले हो गया था। बचपन से ही मेरा पालन-पोषण दूसरों के घर में हुआ। इसलिए मैं सामान्यतः बहुत कम बोलती थी। मुझे डर रहता था कि कहीं मैं दूसरों के लिए बोझ न बन जाऊँ या उन्हें अप्रसन्न न कर दूँ, जिससे वे मेरी बात सुनना ही बंद कर दें। समय के साथ यह भय बढ़ता गया। अंततः मुझे न तो बोलना अच्छा लगता था और न ही यह समझ आता था कि दूसरों से कैसे बात करूँ। मेरी बेटी अक्सर मज़ाक में कहती थी कि मैं एक अच्छी श्रोता हूँ, क्योंकि मैं हमेशा दूसरों की बातें सुनती हूँ, लेकिन अपने विचार कभी व्यक्त नहीं करती।
बाद में मुझे एहसास हुआ कि यह स्थिति सही नहीं थी। मैंने समझा कि यह पुरानी शक्तियों द्वारा बनाई गई एक धारणा और बाधा थी, जिससे मेरे भीतर कम बोलने की प्रवृत्ति विकसित हो गई, ताकि मैं आमने-सामने लोगों को सच्चाई बताने के अपने दायित्व को पूरा न कर सकूँ और जीवों को बचाने के इस महत्वपूर्ण कार्य में बाधा उत्पन्न हो।
एक दिन मैंने अपने मन की बात एक अन्य अभ्यासी से साझा की और बताया कि मैं भी बाहर जाकर लोगों को आमने-सामने सच्चाई बताना चाहती हूँ। उन्होंने तुरंत मेरी सहायता की। उन्होंने मुझे एक छोटे से सत्य-स्पष्टीकरण समूह से मिलवाया और एक ऐसी अभ्यासी से मेरा परिचय कराया, जो लंबे समय से बाहर जाकर लोगों को सच्चाई बता रही थीं। उनके मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से धीरे-धीरे मुझमें भी लोगों से बात करने का साहस आने लगा।
मैंने यह सोच छोड़ दी कि अब मेरी आयु सत्तर वर्ष से अधिक हो चुकी है। मैंने विनम्रतापूर्वक युवा अभ्यासियों से सीखा कि लोगों को सच्चाई कैसे बताई जाए। क्योंकि मुझे बोलना पसंद नहीं था, इसलिए मैंने अनजान लोगों से अधिक बातचीत करने और उनसे सहजता से जुड़ने का अभ्यास शुरू किया।
मैंने स्वयं से कहा कि मुझे अधिक बोलने के भय, अपने अत्यधिक अहंकार और प्रतिष्ठा की आसक्ति को अवश्य छोड़ना होगा। केवल अपने अहं को त्यागकर ही मैं लोगों को सच्चाई बताने की दिशा में पहला कदम उठा सकती हूँ।
आमने-सामने सच्चाई बताने की शुरुआत
कुछ ही समय बाद एक दिन मुझे पहली सफलता मिली। सड़क किनारे बैठी एक वृद्ध महिला से मैंने बातचीत शुरू की। मैंने उन्हें सच्चाई बताई और वे सीसीपी तथा उसके युवा संगठनों से अपना संबंध समाप्त करने के लिए सहमत हो गईं। इस अनुभव ने मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ा दिया और मेरे लिए लोगों को सच्चाई बताने का मार्ग खुल गया।
इसके बाद मैंने निरंतर प्रयास जारी रखा। मैंने देखा कि बस-स्टॉप पर अनेक लोग बस की प्रतीक्षा करते रहते हैं। प्रतीक्षा के दौरान किसी अनजान व्यक्ति से सहज बातचीत शुरू करना आसान होता है, और धीरे-धीरे बातचीत को मुख्य विषय तक ले जाया जा सकता है। जब लोग मेरी बात समझ लेते, तो वे सीसीपी छोड़ने के लिए तैयार हो जाते।
इसके अतिरिक्त, जब मैं बाज़ार में सामान खरीदने जाती, तो मूल्य-वृद्धि या बाज़ार की स्थिति जैसे सामान्य विषयों पर भी अनजान लोगों से बातचीत करती। ऐसी साधारण बातचीत भी धीरे-धीरे सीसीपी छोड़ने के विषय तक पहुँच जाती।
समय के साथ मैं इन प्रारंभिक औपचारिक तरीकों से भी आगे बढ़ गई। अब यदि सड़क पर किसी से मुलाकात हो जाती, तो मैं उसे भी सच्चाई बता देती। जब मैं सार्वजनिक बस में यात्रा करती, तो अपने बगल में बैठे व्यक्ति का अभिवादन करती और वहीं से बातचीत शुरू होकर सच्चाई बताने तक पहुँच जाती।
चुनौतियों पर विजय पाना और एक खतरनाक परिस्थिति से बचना
धीरे-धीरे लोगों को आमने-सामने सच्चाई बताना मेरे लिए स्वाभाविक हो गया। चीनी लोगों को ईश्वर में विश्वास न करने जैसी विकृत धारणाओं से बाहर निकालकर उन्हें पारंपरिक संस्कृति की ओर लौटने में सहायता करना, तथा अपने भीतर के भय पर विजय पाकर उन्हें सच्चाई समझाना—यह सब मैं केवल दाफा और सद्विचारों के सहारे ही कर सकी।
इस दौरान मुझे अनेक प्रकार के लोगों का सामना करना पड़ा। कुछ लोग मेरी बात सुनकर अनदेखा कर देते थे, कुछ क्रोधित हो जाते थे, कुछ ऊँची आवाज़ में डाँटते थे और कुछ अपशब्द भी कहते थे।
एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा, "क्या तुम्हें पेंशन मिलती है? तुम्हें पेंशन कौन देता है?"
मैं उत्तर भी नहीं दे पाई थी कि उसने तुरंत कहा, "तुम्हारे भीतर ज़रा भी अंतरात्मा नहीं है!" इतना कहकर वह गुस्से में वहाँ से चला गया।
ऐसी परिस्थितियों से मैं कभी निराश नहीं हुई। मैं केवल वही करती रही जो मास्टरजी ने हमसे करने के लिए कहा है।
कई बार ऐसा भी हुआ कि अनजाने में मेरा सामना पुलिस अधिकारियों से हो गया।
एक बार मैंने लगभग बीस-बाईस वर्ष की आयु के तीन युवकों को पेय पदार्थों की बोतलों से खेलते हुए देखा। मुझे लगा कि वे विश्वविद्यालय के छात्र हैं और गर्मी की छुट्टियों में घर आए होंगे। इसलिए मैं उनके पास गई और उनसे सच्चाई पर बातचीत शुरू की।
मैंने उनसे पूछा कि क्या वे जानते हैं कि शांति और सुरक्षा के लिए सीसीपी तथा उसके युवा संगठनों से अपना संबंध समाप्त करना क्या होता है।
वे तीनों आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगे। मैंने उन्हें समझाया कि यदि वे कभी सीसीपी या उसके किसी युवा संगठन में शामिल हुए हों, तो उससे अपना संबंध समाप्त कर देना चाहिए।
तभी उनमें से एक युवक अचानक उठकर चला गया। बाकी दो युवक मेरी बातें सुनते हुए मुस्कुराते रहे।
मैंने उनसे उनका उपनाम पूछा, लेकिन उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। मैंने उन्हें शुभकामना-चिह्न (ताबीज़) दिए, जिन्हें उन्होंने स्वीकार कर लिया। लेकिन जब मैंने पूछा कि क्या वे सीसीपी छोड़ना चाहेंगे, तो वे चुप रहे।
पूरी बातचीत के दौरान मुझे लगातार महसूस हो रहा था कि कुछ ठीक नहीं है। मेरे साथ चल रही एक अन्य अभ्यासी ने भी यह बात महसूस की और मेरा हाथ पकड़कर संकेत किया कि हमें तुरंत वहाँ से निकल जाना चाहिए।
जब हम कुछ दूर ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ भीड़ कम थी, तब उस अभ्यासी ने बताया कि जो पहला युवक उठकर गया था, वह पीछे जाकर किसी को फ़ोन कर रहा था।
यह सुनकर मैं चौंक गई। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वे तीनों युवक एक काली कार में बैठ चुके थे।
जब हम पूर्व दिशा की ओर चले, तो उनकी कार भी पूर्व दिशा के चौराहे पर आकर रुक गई और हमें देखने लगी। जब हम दक्षिण की ओर मुड़े, तो उनकी कार दक्षिण दिशा के चौराहे पर पहुँचकर फिर हमें देखने लगी।
उस समय मैं स्पष्ट रूप से समझ गई कि दाफा अभ्यासियों का उत्पीड़न करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है, और यह परिस्थिति मेरे अपने भय की परीक्षा भी थी। हम तो लोगों को बचाने के लिए निकले हैं, फिर डरने की क्या बात है?
बाद में मास्टरजी की सुरक्षा में हम एक आवासीय परिसर में प्रवेश कर गए और अंततः उनसे पीछा छुड़ाने में सफल रहे।
दयालु लोगों की कृतज्ञता
लोगों को सच्चाई बताने की इस यात्रा में यद्यपि कुछ जोखिमपूर्ण अनुभव भी हुए, लेकिन उससे कहीं अधिक ऐसे लोग मिले जिन्होंने सच्चाई को समझा। अनेक दयालु लोगों ने सीसीपी द्वारा दाफा अभ्यासियों पर किए जा रहे उत्पीड़न के बारे में सुनने के बाद अपनी सहानुभूति और समर्थन व्यक्त किया। कुछ लोगों ने तो मेरा धन्यवाद भी किया और स्पष्ट रूप से भावुक दिखाई दिए।
एक बार मैं बस-स्टॉप की लंबी बेंच पर बैठी बस की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी एक महिला जल्दी-जल्दी वहाँ पहुँची। उसका पैर मुड़ गया और वह लगभग गिर ही गई थी।
मैं तुरंत उठकर उसकी सहायता करने पहुँची।
उन्होंने कहा, "अभी मेरा टखना मुड़ गया था, लेकिन अब मैं ठीक हूँ।"
मैंने उनसे कुछ देर बैठकर आराम करने का आग्रह किया। फिर मैंने पूछा, "क्या किसी ने आपको कभी बताया है कि शांति और सुरक्षा के लिए सीसीपी तथा उसके युवा संगठनों से अपना संबंध समाप्त करना क्या होता है?"
उन्होंने कहा कि उन्होंने इसके बारे में पहले कभी नहीं सुना था।
तब मैंने उन्हें इसका अर्थ समझाया और कहा, "यदि आप चाहें तो मैं आपको एक शुभ उपनाम (छद्म नाम) देकर यह घोषणा करने में सहायता कर सकती हूँ।" मैंने उनका उपनाम पूछा। उन्होंने बताया कि उनका उपनाम झांग है। तब मैंने उनके लिए "झांग तियानयुआन" नाम चुना और मुस्कुराकर कहा, "हमारा आज मिलना भी एक पूर्वनिर्धारित संबंध (युआनफेन) के कारण है। यदि ऐसा न होता, तो आज हमारी मुलाकात ही नहीं होती।"
उन्होंने मुस्कुराते हुए वह नाम स्वीकार कर लिया और स्नेहपूर्वक मेरी ओर देखती रहीं। इसके बाद मैंने उन्हें एक चाबी का छल्ला दिया, जिस पर लिखा था: "फालुन दाफा अच्छा है, सत्य-करुणा-सहनशीलता अच्छी है।" साथ ही मैंने उन्हें सच्चाई बताने वाली एक साप्ताहिक पत्रिका भी दी और उनसे अनुरोध किया कि घर जाकर उसे ध्यान से पढ़ें। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक वे सभी सामग्री स्वीकार कर ली। तभी एक और वृद्ध महिला वहाँ आईं और उसी बेंच पर बैठ गईं। वे बार-बार कह रही थीं कि वे बहुत थक गई हैं। मैं तुरंत थोड़ा खिसककर बैठी ताकि उनके लिए पर्याप्त जगह बन जाए।
कुछ देर उनसे सामान्य बातचीत करने के बाद मैंने एक शुभकामना-ताबीज़ निकाला और उनसे कहा कि वे अक्सर यह वाक्य दोहराएँ: "फालुन दाफा अच्छा है, सत्य-करुणा-सहनशीलता अच्छी है।" मैंने उनसे कहा कि ऐसा करने से न केवल उन्हें शुभ फल प्राप्त होंगे, बल्कि वे अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु का भी आनंद लेंगी। मैंने उनकी आयु पूछी। उन्होंने बताया कि वे 84 वर्ष की हैं।
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "तब तो आप अवश्य ही बहुत दयालु व्यक्ति होंगी। आपकी भलाई और सदाचार के कारण ही आपने इतने पुण्य संचित किए होंगे कि आज इस आयु में भी आपका स्वास्थ्य अच्छा है।" फिर मैंने उनसे पूछा कि क्या वे कभी सीसीपी या उसके किसी संबद्ध संगठन में शामिल हुई थीं।
उन्होंने उत्तर दिया, "हाँ।" तब मैंने उनसे कहा कि यदि वे चाहें, तो मैं उनकी ओर से उन सभी संगठनों से उनका संबंध समाप्त करने में सहायता कर सकती हूँ।
उन्होंने सहर्ष सहमति दे दी।
इसके बाद मैंने उन्हें सच्चाई बताने वाली एक साप्ताहिक पत्रिका, एक चाबी का छल्ला और एक शुभकामना-ताबीज़ दिया। मैंने उनसे कहा कि ताबीज़ पर लिखे वाक्य को वे बार-बार दोहराएँ, क्योंकि इससे उन्हें बहुत लाभ होगा।
उन्होंने मेरी सद्भावना को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया और एक बार फिर मेरा धन्यवाद किया। उसी समय वह बस आ गई जिसका मैं इंतज़ार कर रही थी। मैंने उनसे जल्दी से विदा ली और बस में चढ़ गई।
अब मुझे गहराई से यह अनुभव होने लगा है कि जिन-जिन लोगों से मेरी मुलाकात होती है, वे सभी पूर्वनिर्धारित संबंध (युआनफेन) के कारण मेरे जीवन में आते हैं। चाहे वे अंततः सीसीपी छोड़ने का निर्णय लें या न लें, मेरा कर्तव्य है कि मैं उन्हें सीसीपी से संबंध समाप्त करने का यह जीवन-रक्षक संदेश अवश्य बताऊँ, ताकि उन्हें स्वयं अपना निर्णय लेने का अवसर मिल सके।
धन्यवाद, मास्टरजी, आपके करुणामय उद्धार के लिए।
मैं केवल और अधिक लगन से साधना करूँगी, तीन कार्यों को अच्छी तरह करूँगी और अधिक से अधिक लोगों तक यह संदेश पहुँचाकर उन्हें लाभान्वित करने का प्रयास करूँगी। यही मेरे लिए मास्टरजी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का सर्वोत्तम तरीका है।
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