(Minghui.org) मैं 70 वर्ष की हूँ और मैंने 1997 में फालुन दाफा का अभ्यास शुरू किया।
फालुन दाफा का अभ्यास और बीमारी से मुक्ति
अधिकांश लोग अपने बीसवें दशक को जीवन का सबसे अच्छा समय मानते हैं, लेकिन मेरा युवाकाल बीमारी और पीड़ा से भरा था। मुझे लगातार सर्दी-जुकाम, बुखार, मासिक धर्म के दौरान तीव्र दर्द तथा अनेक अन्य शारीरिक रोगों ने घेर रखा था। मेरा जीवन लगभग पूरी तरह डॉक्टरों और दवाइयों के सहारे बीत रहा था।
तीस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते मेरा स्वास्थ्य और भी बिगड़ गया। मुझे हृदय रोग, सतही गैस्ट्राइटिस, न्यूरास्थेनिया (तंत्रिका-दुर्बलता), अनिद्रा, मायोकार्डाइटिस, निम्न रक्तचाप, रक्ताल्पता, अपेंडिसाइटिस (जिसका ऑपरेशन हो चुका था), दोनों टॉन्सिलों की सूजन (जिन्हें भी शल्यक्रिया द्वारा हटाया गया), पित्ताशय की सूजन तथा राइनाइटिस जैसी अनेक बीमारियाँ थीं।
मेरा जीवन अत्यंत दुखद हो गया था। मुझे लगता था कि जीवित रहना, मर जाने से भी अधिक कष्टदायक है। ऐसा प्रतीत होता था मानो मैं दुःख के असीम सागर में भटक रही हूँ, जिसका कोई किनारा दिखाई नहीं देता। फिर भी मेरे मन की गहराई में एक अनुभूति थी कि मैं किसी चीज़ की प्रतीक्षा कर रही हूँ—या शायद कोई मेरा इंतज़ार कर रहा था।
जुलाई 1997 में मैंने फालुन दाफा का अभ्यास शुरू किया। ज़ुआन फालुन—जो फालुन दाफा की मुख्य पुस्तक है—पूरा पढ़ने से पहले ही मुझे महसूस हो गया कि यह साधना वास्तव में असाधारण है।
अगली सुबह मैं स्थानीय सामूहिक अभ्यास स्थल पर व्यायाम सीखने गई। मैं दूरदराज़ क्षेत्र में रहती थी, इसलिए वहाँ मेरे सहित केवल तीन अभ्यासी थे। दो वरिष्ठ अभ्यासियों ने बड़े धैर्य से मुझे अभ्यास सिखाए और मैंने पूरी लगन से उनका अभ्यास किया।
जब मैंने पाँचों अभ्यास पूरे कर लिए और सुबह का अभ्यास समाप्त हुआ, तो घर लौटते समय मुझे लगा कि मेरा शरीर अत्यंत हल्का हो गया है। मेरे पैर, जो पहले सीसे की तरह भारी लगते थे, अब मानो खुशी से उछलना चाहते थे। मैं अत्यंत प्रसन्न थी और मन ही मन मास्टरजी का हृदय से धन्यवाद कर रही थी।
उस दिन के बाद से मुझे बीमारी का कोई भी लक्षण महसूस नहीं हुआ। कुछ ही दिनों में मैंने अपनी सारी दवाइयाँ फेंक दीं।
पहले मैं हमेशा सुस्त और थकी हुई रहती थी , लेकिन अब मेरा शरीर हल्का और सहज महसूस होता था। मेरा मन आनंद से भर गया था और चेहरे पर हर समय मुस्कान रहती थी। ऐसा लगता था मानो मुझे दुःख के समुद्र से निकालकर स्वर्ग पहुँचा दिया गया हो। यह परिवर्तन इतना अद्भुत था कि कभी-कभी मुझे लगता था कि कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही । लेकिन जब मैं शांत होकर सोचती, तो समझ जाती कि यह सब वास्तविक है।
हर दिन मैं दाफा की पुस्तक हाथ में लेकर फ़ा का अध्ययन करती और प्रत्येक सुबह अभ्यास स्थल पर जाकर व्यायाम करती। मास्टरजी और दाफा के मार्गदर्शन में मेरा हर दिन आनंद और आशा से भर गया।
अपने मूल लगाव की पहचान करना
मुझे मास्टरजी पर अटूट विश्वास है। अपने विश्वास के कारण अवैध रूप से हिरासत में रखे जाने की अवधि को छोड़कर मैंने कभी भी फ़ा का अध्ययन या मास्टरजी की सहायता करके लोगों को बचाने का कार्य नहीं छोड़ा।
फिर भी, क्योंकि मैं अपने मूल लगाव (फ़ंडामेंटल अटैचमेंट) को पहचान नहीं पाई थी इसलिए मैं क्रोध, घृणा, शिकायत और न्याय की प्रबल भावना जैसी मानसिक अवस्थाओं में फँसी रहती थी।
एक दिन मैं एक समन्वयक के घर गई। जैसे ही मैं अंदर पहुँची, समन्वयक और वहाँ मौजूद एक अन्य अभ्यासी ने एक साथ कहा, “अभी हम तुम्हारे बारे में ही बात कर रहे थे, और तुम आ गए!” कुछ समय बाद मैं फिर उसी समन्वयक के घर गई। वहाँ एक और अभ्यासी भी था। इस बार भी दोनों ने एक साथ कहा, “अभी हम तुम्हारे बारे में बात कर रहे थे, और तुम आ गए!”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “सच? मैं भी सुनना चाहूँगी कि क्या बात हो रही थी।”
कुछ क्षण रुकने के बाद समन्वयक ने झिझकते हुए दो बातें बताईं। उनमें से एक यह थी कि जब कोई अभ्यासी मेरे घर आता है, तो मैं दरवाज़ा खोलने में बहुत देर कर देती हूँ। दूसरी बात अब मुझे याद नहीं है।
यह जानकर मुझे अच्छा नहीं लगा कि दूसरे अभ्यासी मेरी अनुपस्थिति में मेरे बारे में चर्चा कर रहे थे। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैं स्वयं भी तो यही करती थी। जब भी मुझे किसी अभ्यासी में कोई लगाव दिखाई देता, तो मैं उसे मन में रख लेती थी और अवसर मिलने पर उसकी चर्चा करती थी। इसी कारण मेरे भीतर बार-बार क्रोध, घृणा, शिकायत और अन्याय की भावना उत्पन्न होती रहती थी, जिससे मैं अपने शिनशिंग को ऊँचा उठाने के अनेक अवसर खो देती थी।
लगभग तीन वर्ष पहले एक समन्वयक और मेरे बीच मनमुटाव हो गया। जब भी सड़क पर हमारी मुलाकात होती, हम एक-दूसरे से नज़रें चुरा लेते। कभी आवश्यकता पड़ने पर कुछ बातें भी होतीं, तो वातावरण बहुत असहज रहता।
मैंने इस दूरी को समाप्त करने के लिए सद्विचार भेजे, लेकिन कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।
अपने अंतर्मन में झाँकने से सब कुछ बदल गया
अप्रैल 2025 में एक दिन मैं अत्यंत एकाग्र होकर फ़ा का पाठ कर रही थी। तभी मैंने स्वयं से पूछा, “मैंने साधना क्यों शुरू की थी?” उसी क्षण मेरे मन में एक विचार आया—“मैं तो दुःख के समुद्र से निकलना चाहती थी।” अचानक मुझे एहसास हुआ,“अरे! यही तो मेरा मूल लगाव है!”
मैं मास्टरजी का अत्यंत आभारी हुई कि उन्होंने मुझे यह दिखाया।
उसी क्षण ऐसा लगा मानो इस आयाम और अन्य आयामों में मेरा मन परत-दर-परत टूट रहा हो। यह अनुभव वैसा था जैसे किसी परमाणु विस्फोट की शक्तिशाली तरंग सब कुछ चकनाचूर कर रही हो, या जैसे एक के बाद एक विशाल द्वार टूटकर खुल रहे हों।
मैं कई मिनट तक इस अद्भुत अवस्था का शांतिपूर्वक अनुभव करती रही। फिर सद्विचार भेजने का समय हो गया। लगभग आधे घंटे तक मैं उसी अवस्था में रही। धीरे-धीरे वह अनुभूति कम होने लगी।
मैं सोचने लगी कि मेरे विभिन्न स्तरों के शरीरों में इतना बड़ा परिवर्तन क्यों हो रहा है। आखिर क्या टूट रहा था?
तभी मुझे समझ में आया कि मेरे विभिन्न स्तरों के शरीरों में पुराने ब्रह्मांड के वे गुण, जो ग्रेनाइट की चट्टान की तरह कठोर थे और स्वार्थ तथा आत्मकेंद्रितता पर आधारित थे, फ़ा की शक्ति से समाप्त हो रहे थे।
अंतर्मन में देखने से सब कुछ बदल गया
अपने मूल लगाव को पहचानने के बाद मेरा दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से बदल गया।अब मैं अन्य अभ्यासियों की कमियों पर ध्यान नहीं देती थी। इसके बजाय मैं उनमें मौजूद अच्छाइयों को देखने लगी।
मुझे यह भी एहसास हुआ कि अपने लगावों के कारण मैंने वर्षों तक कई लोगों को दुःख पहुँचाया था। इसलिए जिन लोगों को मैंने आहत किया था, उनसे मैंने ईमानदारी से क्षमा माँगी।
कुछ समय बाद सड़क पर उसी समन्वयक से फिर मुलाकात हुई। मुझे देखते ही वह मुस्कुराई और हम दोनों गले मिल गए। उसने मुझे कसकर गले लगाया। उस समय मेरे भीतर एक गर्माहट फैल गई और मेरी आँखों में आँसू भर आए।
एक अन्य अवसर पर मैं एक अभ्यासी के घर गई। बातचीत के दौरान वह अचानक नाराज़ हो गई और मेरी अनेक कमियाँ गिनाने लगी।उसने गुस्से में कहा,“क्या तुम्हें पता है कि कोई भी तुम्हारे घर क्यों नहीं आना चाहता? सब लोग तुमसे दूरी क्यों बनाए रखते हैं? बुरी शक्तियाँ तुम्हें निशाना बना रही हैं!”
यदि पहले ऐसा हुआ होता, तो मैं तुरंत बहस करती या अपना बचाव करने लगती ।लेकिन इस बार मैं शांत रही। मैंने मन ही मन केवल यही दोहराया,“मैं इसे स्वीकार नहीं करती, मैं इसे स्वीकार नहीं करती ।”
अब जब भी मैं किसी अभ्यासी की कोई कमी देखती या उसके बारे में सुनती हूँ, तो उस पर मन नहीं लगाती। इसके बजाय मैं अपने अंतर्मन में देखती हूँ कि क्या मुझमें भी वही समस्या है।
उदाहरण के लिए, जब मैंने देखा कि एक अभ्यासी ने झूठ बोला, तो अंतर्मन में देखने पर मुझे पता चला कि मैं स्वयं भी हमेशा पूरी तरह सत्य नहीं रहती थी।जब मेरा एक पारिवारिक सदस्य, जो स्वयं भी अभ्यासी है, लंबे समय तक मुझसे मिलने नहीं आया, तो मुझे समझ आया कि मास्टरजी मुझे दूसरों पर भावनात्मक रूप से निर्भर रहने के अपने लगाव को छोड़ने में सहायता कर रहे हैं।
मैंने अनुभव किया कि चाहे कोई भी परिस्थिति हो, यदि मैं अंतर्मन में देखती हूँ, तो अपने ही लगावों को पहचान सकती हूँ। मैं संकल्प करती हूँ कि मास्टरजी द्वारा हमें दिया गया यह अमूल्य साधन— अंतर्मन में देखना—का पूरा उपयोग करूँगी, स्वयं को निरंतर शुद्ध करूँगी, अधिक से अधिक लोगों को बचाने में मास्टरजी की सहायता करूँगी और अंततः शुद्ध हृदय के साथ मास्टरजी के पीछे-पीछे अपने सुंदर स्वर्गिक घर लौटूँगी।मेरी साधना यात्रा में उठाया गया हर कदम मास्टरजी की करुणामयी रक्षा, आशीर्वाद, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन के कारण ही संभव हुआ है।
अब जबकि मेरी साधना यात्रा अपने अंतिम चरण के निकट है, मास्टरजी ने मेरा मूल लगाव दिखाकर मुझे फ़ा की पुष्टि करने के सही मार्ग पर चलने योग्य बनाया है।
मैं भली-भाँति जानती हूँ कि मेरे जैसे एक शिष्य को बचाने के लिए मास्टरजी ने कितना विशाल कर्मभार अपने ऊपर लिया है और मेरे उद्धार के लिए कितने अथक प्रयास किए हैं।
इसलिए अब मुझे और भी अधिक परिश्रमपूर्वक साधना करनी चाहिए।
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