(Minghui.org) मास्टरजी ने स्पष्ट रूप से बताया है कि अभ्यासी को प्रत्येक व्यक्ति के प्रति करुणा रखनी चाहिए। यह वह अवस्था है जिसे हम सभी को प्राप्त करना चाहिए। यदि हम सभी के प्रति करुणा नहीं रख पाते, तो यह दर्शाता है कि हम फा-सुधार की प्रगति के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल रहे हैं। मैं अपनी हाल की साधना के कुछ अनुभव साझा करना चाहती हूँ।

एकाग्र बने रहें

मास्टरजी ने बार-बार फा-अध्ययन के महत्व पर बल दिया है, और हर अभ्यासी जानता है कि फा का अच्छी तरह अध्ययन करना इस बात की मूलभूत गारंटी है कि हम तीनों कार्य अच्छी तरह कर सकें। लेकिन वास्तव में फा का अच्छी तरह अध्ययन कैसे किया जाए?

2017 में, जब मैं ज़ुआन फालुन पढ़ती थी, तो मेरा मन लगातार भटक जाता था। इसलिए मैंने ज़ुआन फालुन को कंठस्थ करने का निश्चय किया, और अब तक मैं इसे दस से अधिक बार कंठस्थ कर चुकी हूँ। फा पढ़ने से पहले मैं स्वयं को याद दिलाती हूँ कि मेरे शरीर की प्रत्येक कोशिका दाफा के साथ आत्मसात हो जाए।

जब मैं फा को कंठस्थ कर रही थी, तो कई बार ऐसा होता था कि जैसे ही मैं ज़ुआन फालुन का कोई वाक्य दोहराती, मेरे मन में स्वतः "अगला" वाक्य आ जाता—लेकिन वह वास्तविक पाठ नहीं होता था। जब ऐसा बार-बार होने लगा, तो मैंने सोचा कि आखिर यह क्या हो रहा है। मुझे महसूस हुआ कि यह एक प्रकार का हस्तक्षेप है, जिसका उद्देश्य मुझे फा का अच्छी तरह अध्ययन करने से रोकना है।

हस्तक्षेप का एक और रूप यह था कि ज़ुआन फालुन के किसी विशेष अनुच्छेद पर पहुँचते ही मैं उसे बहुत तेजी से दोहरा देती थी, लेकिन मुझे यह याद ही नहीं रहता था कि मैंने अभी क्या कहा। मुझे लगा कि उस समय मेरी मुख्य चेतना पाठ नहीं कर रही थी, क्योंकि मुझे अभी-अभी दोहराई गई सामग्री का स्मरण नहीं रहता था। अब जब मैं फा का पाठ करती हूँ, तो यह सुनिश्चित करती हूँ कि प्रत्येक वाक्य मेरे मन में स्पष्ट रूप से उभरे। मैं गति के पीछे नहीं भागती, बल्कि गुणवत्ता को प्राथमिकता देती हूँ, ताकि मेरी मुख्य चेतना वास्तव में फा को प्राप्त कर सके।

जब मैं अभ्यास करती हूँ, तो स्वयं को याद दिलाती हूँ कि मेरा मन शून्यता और निर्विचार की अवस्था में बना रहे। जैसे ही कोई विचार उत्पन्न होता है, मैं उसे तुरंत समाप्त कर देती हूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरे शरीर की प्रत्येक कोशिका अभ्यास के संगीत तथा उस फा के साथ आत्मसात हो जाए, जिसे मास्टरजी संगीत के माध्यम से प्रकट करते हैं।

ध्यान करते समय मेरी सबसे बड़ी समस्या नींद आ जाना है। इससे बचने के लिए मैं पहले सद्विचार भेजती हूँ, ताकि वे सभी दुष्ट तत्व समाप्त हो जाएँ जो अनियमित विचारों, उनींदेपन या मानसिक धुंधलापन के माध्यम से मेरे अभ्यास में हस्तक्षेप करने का प्रयास करते हैं। मैं अपनी मुख्य चेतना को स्पष्ट और जागृत बनाए रखने का प्रयास करती हूँ, और सामान्यतः इसके अच्छे परिणाम मिलते हैं।

मेरी समझ यह है कि फा का अध्ययन और अभ्यास—दोनों ही फा की आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए। यही वह आधार है, जिसके सहारे हम फा के साथ आत्मसात हो सकते हैं और तीनों कार्य अच्छी तरह कर सकते हैं।

प्रत्येक विचार की साधना

एक बार जब मैंने एक महिला को सच्चाई बताई, तो मेरे मन में विचार आया, “क्या वह मेरी शिकायत कर देगी?”

पहले मैं केवल सद्विचार भेजकर उन दुष्ट तत्वों को समाप्त करने का प्रयास करती थी जो लोगों का उपयोग करके मेरा उत्पीड़न करवाते थे। मेरी इच्छा रहती थी कि वे दाफा के विरुद्ध अपराध न करें और इस प्रकार स्वयं को भी हानि न पहुँचाएँ। अब जैसे ही ऐसा अनुचित विचार आता है, मैं तुरंत उसे पहचान लेती हूँ और पुरानी शक्तियों से कहती हूँ, “यह विचार लोगों को नुकसान पहुँचाता है और यह मेरा वास्तविक स्वरूप नहीं है। मैं इसे पूरी तरह अस्वीकार करती हूँ और समाप्त करती हूँ। जो लोग अभ्यासियों के उत्पीड़न में भाग लेते हैं, उनका भविष्य नहीं रह सकता। अभ्यासी तुम्हें लोगों का विनाश करने की अनुमति नहीं देंगे!” इसके बाद मैं हस्तक्षेप को समाप्त करने के लिए सद्विचार भेजती हूँ।

हमारे विचार सद्विचार होने चाहिए, तभी हम हस्तक्षेप को दबा और समाप्त कर सकते हैं। हमें हर परिस्थिति को उच्च स्तर के दृष्टिकोण से देखना चाहिए। हमारी जिम्मेदारी दाफा के साथ आत्मसात होना, मास्टरजी की फा-सुधार में सहायता करना और लोगों का उद्धार करने में उनकी मदद करना है। यह तथ्य कि मास्टरजी ने हमें चुना है, इस बात का प्रमाण है कि हम इस महान जिम्मेदारी को निभाने में पूर्णतः सक्षम हैं और लोगों के उद्धार की एकमात्र आशा भी हम ही हैं। हमें इस पवित्र मिशन को पूरा करना ही होगा। जब तक हम सच्चे मन से मास्टरजी और फा पर विश्वास रखते हैं, तब तक हम हर प्रकार के हस्तक्षेप पर विजय प्राप्त कर सकते हैं और अपना मिशन पूरा कर सकते हैं, क्योंकि मास्टरजी और दाफा सर्वशक्तिमान हैं।

हमें अपने प्रत्येक विचार पर ध्यान देना चाहिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, ताकि हमारे सद्विचार और आचरण धर्मपूर्ण बने रहें। विशेष रूप से, मन में क्षणभर के लिए आने वाले किसी भी बुरे विचार को तुरंत समाप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि हमारी मुख्य चेतना मजबूत नहीं होगी, तो संभव है कि हम ऐसे विचारों को पहचान ही न सकें और उन्हें यूँ ही निकल जाने दें।

उदाहरण के लिए, मेरे ससुर और पति के बड़े भाई का स्वभाव बहुत क्रोधी था, जिसकी शिकायत मेरी सास अक्सर रिश्तेदारों और मित्रों से किया करती थीं। ससुर के निधन के बाद वे अपने बड़े बेटे के साथ रहने लगीं। एक दिन मैं उनकी छोटी बहन से बात कर रही थी। उन्होंने मेरे पति के बड़े भाई के गुस्सैल स्वभाव का उल्लेख किया। मैंने सहज ही कह दिया, “मेरे ससुर का स्वभाव तो उनसे भी अधिक खराब था, फिर भी मेरी सास ने पूरा जीवन उनके साथ बिताया। यही तो उनका भाग्य है।”

मेरी सास की बहन को मेरी बात उचित लगी और उन्होंने कुछ नहीं कहा। मुझे भी उस समय लगा कि मेरी बात बिल्कुल सही थी। लेकिन बाद में जब मैं अपनी सास के परिवार से जुड़ी बातों परअपने अंतर्मन में झाँककर विचार कर रही थी, तो यही टिप्पणी फिर से मेरे मन में उभर आई। तभी मुझे एहसास हुआ कि मेरा यह विचार सद्विचार नहीं था। उसमें दूसरे के दुर्भाग्य पर प्रसन्न होने का एक सूक्ष्म भाव छिपा हुआ था।

अब मैं समझ गई  हूँ कि यदि हम अपने उन शब्दों या विचारों को, जो फा के अनुरूप नहीं हैं, समय रहते नहीं सुधारते, तो वे विचार-कर्म का रूप ले लेते हैं। जैसे ही हमारी सतर्कता कम होती है, यही विचार-कर्म हमें नियंत्रित करने का प्रयास करता है और हमारे मन में ऐसे अनुचित विचार उत्पन्न करता है। जब भी ऐसा हो, हमें उस बुरे विचार को तुरंत पकड़कर समाप्त कर देना चाहिए।

इस अनुभव से मैंने यह भी सीखा कि अपने प्रत्येक विचार की और अधिक सावधानी से साधना करनी चाहिए। अब मैं अपने मन में आने वाले हर नकारात्मक विचार को पुरानी शक्तियों द्वारा थोपा गया, मुझे भ्रमित करने वाला एक जाल मानती हूँ। मैं अब और धोखा खाने से इनकार करती हूँ तथा ऐसे सभी विचारों को अस्वीकार और समाप्त कर देती हूँ।

मैं पुरानी शक्तियों से कहती हूँ, “मैं एक दाफा अभ्यासी हूँ, सत्य-करुणा-सहनशीलता से निर्मित एक जीवन हूँ। मैं बुद्ध फा की शक्ति का उपयोग करके अपनी सभी आसक्तियों और उन सभी मानवीय धारणाओं को समाप्त करती हूँ जो फा के अनुरूप नहीं हैं।” जैसे ही कोई विचार दाफा से भटकता है, मैं उसे तुरंत समाप्त कर देती हूँ, ताकि मेरा प्रत्येक विचार दाफा के मानकों के अनुरूप हो और मेरे आयामों में कोई भी अनुचित धारणा अस्तित्व में न रहे। मुझे सक्रिय रूप से दाफा का उपयोग करके अपने आयामों को शुद्ध करना है और स्वयं को निरंतर फालुन दाफा के साथ आत्मसात करना है।

इतने वर्षों से फालुन दाफा का अभ्यास करने के बाद, हमारे भीतर गहरी करुणा और दृढ़ सद्विचार विकसित हो जाने चाहिए। हमें अपने प्रत्येक विचार पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मन में कोई भी कठोर या नकारात्मक विचार उत्पन्न न हो।

फा-सुधार काल में साधना

मास्टरजी ने हमें सिखाया है कि दाफा मन और शरीर—दोनों का साधना का मार्ग है। साधना करते-करते हमारा शरीर धीरे-धीरे युवा अवस्था की ओर लौटता है, इसलिए हमारा स्वरूप भी अधिक युवा दिखाई देना चाहिए।

चीन में अधिकांश अभ्यासी बीस वर्षों से भी अधिक समय से साधना कर रहे हैं, और हमारे शरीर पहले ही उच्च-ऊर्जा पदार्थ से निर्मित हो चुके हैं। मैं स्वयं एक मध्यम आयु की व्यक्ति हूँ, इसलिए मेरा शरीर युवा अवस्था जैसा होना चाहिए, लेकिन मैं अभी तक उस स्थिति तक नहीं पहुँच पाई हूँ। मेरे आसपास कुछ वृद्ध अभ्यासी भी वृद्धावस्था का झूठा रूप प्रदर्शित करते दिखाई देते हैं। मेरा मानना है कि यह पुरानी शक्तियों द्वारा हमारे भौतिक शरीरों पर वृद्धावस्था का यह मिथ्या स्वरूप थोपकर किया गया उत्पीड़न है, ताकि वे हमें मास्टरजी के साथ लोगों का उद्धार करने से रोक सकें।

मैं पुरानी शक्तियों की किसी भी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती। मैं केवल मास्टरजी द्वारा हमारे लिए की गई व्यवस्था का अनुसरण करती हूँ—अर्थात एक युवा और ऊर्जावान शारीरिक अवस्था। जब भी मैं सद्विचार भेजती हूँ, तो एक विशेष विचार भी जोड़ती हूँ:

“उन सभी दुष्ट तत्वों का समूल नाश हो जो वृद्धावस्था के झूठे स्वरूप का उपयोग करके मेरे शरीर का उत्पीड़न करते हैं और लोगों का उद्धार करने की मेरी क्षमता में हस्तक्षेप करते हैं। उस वृद्धावस्था की व्यवस्था को भी समाप्त कर दो जिसे पुरानी शक्तियों ने मेरे शरीर में आरोपित किया है।”

मैं अपने भौतिक शरीर पर पुरानी शक्तियों द्वारा किए गए हर प्रकार के उत्पीड़न को पूरी तरह अस्वीकार करती हूँ। मैं चाहती हूँ कि एक युवा अवस्था में रहकर दाफा की महानता की पुष्टि करूँ और अधिक से अधिक लोगों का उद्धार कर सकूँ। यद्यपि मेरे बाहरी रूप में अभी तक कोई स्पष्ट परिवर्तन नहीं आया है, फिर भी मैं पुरानी शक्तियों के हस्तक्षेप को समाप्त करने के लिए निरंतर सद्विचार भेजती रहूँगी।

मेरी समझ यह है कि फा-सुधार काल के अभ्यासियों के हृदय में प्रत्येक व्यक्ति के प्रति करुणा होनी चाहिए। मैं अक्सर प्रार्थना करती हूँ, “मास्टरजी, कृपया मुझे प्रबुद्ध करें। मैं फा के आधार पर स्वयं को सुधारूँगी और मानवीय धारणाओं, आसक्तियों तथा अपनी कमियों को दूर करने के लिए परिश्रमपूर्वक साधना करूँगी।”

मेरी बीस वर्षों की साधना-यात्रा अनेक परीक्षाओं और कठिनाइयों से भरी रही है। मैं बार-बार गिरी, फिर उठ खडी हुई। करुणामय मास्टरजी ने मुझे कभी नहीं छोड़ा। मैं दृढ़ संकल्पित हूँ कि मास्टरजी द्वारा निर्धारित साधना-पथ पर चलती रहूँ और उनकी करुणामयी मुक्ति के योग्य बनूँ।

यह केवल मेरी व्यक्तिगत समझ है। यदि इसमें कुछ भी दाफा के अनुरूप न हो, तो कृपया करुणापूर्वक उसे इंगित करें।