(Minghui.org)

नाम: लियू यिंगश्यू 

चीनी नाम: 刘应旭

लिंग: पुरुष

आयु: 53 वर्ष

शहर: चेंगदू

प्रांत: सिचुआन

पेशा: अभियंता (इंजीनियर)

मृत्यु की तिथि: मई 2026

सबसे हाल की गिरफ्तारी: अक्टूबर 2008 के अंत में

सिचुआन प्रांत के चेंगदू शहर के 53 वर्षीय अभियंता श्री लियू यिंगश्यू का मई 2026 में स्ट्रोक आने के बाद निधन हो गया। उनका निधन फालुन दाफा का अभ्यास करने के कारण दशकों तक झेले गए उत्पीड़न की एक दुखद परिणति थी।

श्री लियू ने नवंबर 1994 में, जब वे चोंगचिंग यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी में अध्ययन कर रहे थे, फालुन दाफा का अभ्यास शुरू किया। अभ्यास शुरू करने के कुछ ही समय बाद वे नेफ्राइटिस, हेपेटाइटिस और मस्तिष्काघात के दुष्प्रभावों से स्वस्थ हो गए। स्नातक होने के बाद उन्हें सिचुआन प्रांत के म्यांझू शहर स्थित डोंगफांग टरबाइन फैक्ट्री में सहायक अभियंता की नौकरी मिली।

जब जुलाई 1999 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने फालुन दाफा के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी दमन शुरू किया, तो तीन महीने बाद श्री लियू अपने विश्वास की स्वतंत्रता की अपील करने के लिए बीजिंग गए। उन्हें गिरफ्तार कर लगभग 40 दिनों तक बीजिंग में हिरासत में रखा गया और फिर म्यांझू वापस ले जाया गया। 30 दिसंबर 1999 को उन्हें एक वर्ष के जबरन श्रम शिविर की सज़ा दी गई और अगले दिन शिनहुआ श्रम शिविर भेज दिया गया।

श्रम शिविर में रहते समय उनके नियोक्ता ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। अक्टूबर 2000 में रिहा होने के बाद उन्होंने दूसरी नौकरी ढूँढ़ ली, लेकिन 4 जून 2001 को उन्हें कार्यस्थल से फिर गिरफ्तार कर लिया गया। जुलाई 2001 में उन्हें दो वर्ष के लिए पुनः शिनहुआ श्रम शिविर भेजा गया। अपने विश्वास पर दृढ़ रहने के कारण उनकी अवधि दस दिन और बढ़ा दी गई। सज़ा पूरी होने के बाद पुलिस उन्हें सीधे एक ब्रेनवॉशिंग केंद्र भेजना चाहती थी, लेकिन उनके माता-पिता के कड़े विरोध के कारण ऐसा नहीं हो सका।

बाद में श्री लियू चेंगदू में अस्थायी कार्य करके जीवनयापन करने लगे। 14 नवंबर 2007 को उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया और तीन दिन बाद शिनजिन ब्रेनवॉशिंग सेंटर भेज दिया गया। 31 मई 2008 को उन्हें जिननियू ब्रेनवॉशिंग सेंटर स्थानांतरित किया गया। 20 जून 2008 को वे वहाँ से निकलने में सफल रहे।

अक्टूबर 2008 के अंत में एक और गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने उन्हें मुक्कों और लातों से पीटा तथा अज्ञात दवाओं के इंजेक्शन लगाए। उन्होंने विरोध में भूख हड़ताल की और 21 दिन बाद रिहा किए गए।

श्री लियू अकेले नहीं थे जिन्हें उनके विश्वास के कारण प्रताड़ित किया गया। उनके माता-पिता को कई बार ब्रेनवॉशिंग केंद्र में उनके साथ रहने के लिए मजबूर किया गया। अधिकारियों ने उन्हें फालुन दाफा की निंदा करने वाले वीडियो देखने और अपने पुत्र को “परिवर्तित” करने के लिए बाध्य किया।

एक बार उनकी माँ उनके सामने घुटनों के बल बैठकर उनसे अपना विश्वास छोड़ने की विनती करने लगीं। दूसरी बार उन्हें रात 1 बजे तक लगातार प्रचार वीडियो देखने के लिए मजबूर किया गया। मानसिक दबाव इतना बढ़ गया कि उन्होंने लगभग खिड़की से कूदकर आत्महत्या करने का प्रयास कर दिया। इसके बावजूद केंद्र के कर्मचारियों ने धमकी दी कि जब तक उनका पुत्र अपने विश्वास का त्याग नहीं करेगा, तब तक उन्हें और उनके पति को वहीं रखा जाएगा।

सीसीपी के दबाव के कारण उनकी मंगेतर ने उनसे संबंध तोड़ लिया। रिश्तेदार भी उनसे दूरी बनाए रखने लगे क्योंकि उन्हें भय था कि वे भी उत्पीड़न का शिकार हो सकते हैं।

अपने अंतिम वर्षों में भी श्री लियू लगातार पुलिस उत्पीड़न का सामना करते रहे। पुलिस उनके नियोक्ताओं पर उन्हें नौकरी से निकालने का दबाव डालती थी। जब भी वे ट्रेन से यात्रा करते, सुरक्षा जाँच के दौरान फालुन दाफा अभ्यासी के रूप में पहचान होने पर उनसे बार-बार पूछताछ की जाती। होटल में ठहरने पर भी पुलिस वहाँ पहुँचकर उनसे सवाल-जवाब करती थी।

एक समय वे सिचुआन के क्योनगलाई शहर में अस्थायी काम कर रहे थे। वहाँ की पुलिस ने उनके मकान-मालिक का फोन नंबर माँगा और उनके अपार्टमेंट के बाहर लगे पेड़ों को कटवा दिया, जिससे उनका कमरा निगरानी कैमरों के सामने पूरी तरह खुल गया। पुलिस ने उनके तत्कालीन नियोक्ता पर उन्हें निकालने का दबाव डाला और कार्यस्थल के सुरक्षा कर्मियों से उनकी गुप्त तस्वीरें भी खिंचवाईं।

बाद में श्री लियू वापस चेंगदू लौट आए। वर्षों तक चले निरंतर उत्पीड़न और मानसिक दबाव के कारण उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। अप्रैल 2026 में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। अगले महीने उन्हें स्ट्रोक आया और शीघ्र ही उनका निधन हो गया।

श्री लियू यिंगश्यू का मामला उन अनेक फालुन दाफा अभ्यासियों की स्थिति को दर्शाता है, जिन्होंने अपने विश्वास पर कायम रहने के कारण वर्षों तक गिरफ्तारी, जबरन श्रम, ब्रेनवॉशिंग, निगरानी, रोजगार से वंचित किए जाने और पारिवारिक विघटन जैसी कठिनाइयों का सामना किया।

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