(Minghui.org) हान यू को चीनी इतिहास के महानतम विद्वानों में से एक माना जाता है। वे तांग राजवंश में एक सरकारी अधिकारी भी थे। अपने साहित्यिक योगदान के अतिरिक्त, हान यू अपने भतीजे के पुत्र हान श्यांगज़ी (जिन्हें हान श्यांग भी कहा जाता है) से जुड़ी प्रसिद्ध किंवदंतियों के कारण भी जाने जाते हैं। बाद में हान श्यांगज़ी ताओवादी परंपरा के आठ अमर में से एक बने।
स्वयं को कन्फ्यूशी विचारधारा का निष्ठावान अनुयायी मानने वाले हान यू प्रारंभ में आध्यात्मिक साधना के विरोधी थे। जब वे हेनान में प्रशासक (मैजिस्ट्रेट) के रूप में कार्यरत थे, तब उनकी मुलाकात एक ऐसे युवक से हुई, जो अपना परिवार छोड़कर वांगवू पर्वत पर जाकर ताओ साधना करना चाहता था। हान यू और एक स्थानीय अधिकारी—दोनों ने उस युवक को समझाया कि वह घर पर रहकर अपने परिवार की देखभाल करे। अंततः हान यू ने न केवल उसे ताओ साधना का विचार छोड़ने के लिए मना लिया, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए चेतावनी के रूप में एक कविता भी लिखी, जिसमें उन्होंने दिव्य सत्ता का खंडन किया।
कुछ वर्षों बाद हान यू को अपनी हठपूर्ण अज्ञानता के परिणामों का सामना करना पड़ा।
सन 819 में, सम्राट श्येनज़ोंग ने एक शाही आदेश जारी किया, जिसके अनुसार फामेन मंदिर में सुरक्षित रखी गई बुद्ध की उंगली की अस्थि का सार्वजनिक सम्मान किया जाना था। यह समारोह प्रत्येक 30 वर्ष में केवल एक बार आयोजित होता था।
हान यू बौद्ध धर्म में विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने इस आयोजन की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा और यहाँ तक सुझाव दिया कि बुद्ध की उस अस्थि को नष्ट कर दिया जाना चाहिए।
लेख पढ़कर सम्राट अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने हान यू को मृत्युदंड देने का आदेश दिया। किंतु अन्य उच्च अधिकारियों के हस्तक्षेप के कारण उनकी जान बच गई। इसके बजाय उन्हें पदावनत करके दक्षिणी चीन के दूरस्थ नगर चाओझोउ भेज दिया गया।
चाओझोउ की यात्रा के दौरान हान यू के सामने सबसे पहले छिनलिंग पर्वतमाला को पार करने की कठिन चुनौती थी। सर्दियों का मौसम था, और बर्फ़ तथा हिमपात ने यात्रा को और भी कठिन बना दिया था। जब वे लानगुआन से होकर गुज़रे, तो भारी हिमपात के कारण आगे बढ़ना लगभग असंभव हो गया। यह घटना उनके जीवन के सबसे कठिन और निराशाजनक दौर का प्रतीक बन गई।
चाचा और भतीजा
गरीब परिवार में जन्मे हान यू ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था। उनके बड़े भाई हान हुई ने उनका और उनके भतीजे हान लाओचेंग का पालन-पोषण किया। समय बीतने पर उनके बड़े भाई और भतीजे—दोनों का निधन हो गया। गहरे दुःख, आत्मग्लानि और अपने पारिवारिक दायित्व की भावना से प्रेरित होकर हान यू ने अपने भतीजे के पुत्र हान श्यांगज़ी का अत्यंत स्नेह और सावधानी के साथ पालन-पोषण करने का संकल्प लिया।
लेकिन हान श्यांगज़ी कोई साधारण बालक नहीं थे। उन्हें लोगों से मेलजोल पसंद नहीं था और न ही सामाजिक नियमों का पालन करने में उनकी कोई रुचि थी। हान यू ने उनके लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की, परंतु हान श्यांगज़ी ने पढ़ने से इनकार कर दिया और कहा,
“मैं जिस ज्ञान का अध्ययन करता हूँ, उसे आप समझ नहीं पाएँगे।”
हान यू ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया और उनसे एक कविता लिखने को कहा। बिना एक पल सोचे, हान श्यांगज़ी ने तुरंत दिव्य विषय पर एक कविता लिख दी।
जब उन्होंने देखा कि हान यू अब भी आश्वस्त नहीं हुए हैं, तो हान श्यांगज़ी ने थोड़ी-सी मिट्टी इकट्ठी करके एक छोटा-सा टीला बनाया। देखते ही देखते उसमें कोमल अंकुर फूट निकले। वह पौधा तेजी से बढ़ा, हरे-भरे रूप में विकसित हुआ और उसमें पियोनी के समान एक सुंदर फूल खिल गया।
उस पौधे पर दो पंक्तियाँ प्रकट हुईं:
“छिनलिंग पर्वतों पर छाए बादलों के बीच आगे का मार्ग दिखाई नहीं देता,बर्फ़ से ढके लानगुआन में घोड़ा अपने घुटने भी आगे नहीं बढ़ा पाता।”
हान यू ने आश्चर्य से पूछा,
“इसका क्या अर्थ है?”
हान श्यांगज़ी मुस्कराए और बोले,
“आप इसका अर्थ बाद में समझ जाएँगे।”
एक अप्रत्याशित भेंट
जब हान यू छिनलिंग पर्वतमाला में बर्फ़ीले तूफ़ान से जूझ रहे थे और ठंड से काँप रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि कोई व्यक्ति उनकी ओर चला आ रहा है। वह उनके भतीजे का पुत्र हान श्यांगज़ी था।
हान श्यांगज़ी ने पूछा, “परदादा, क्या आपको उस फूल वाले पौधे पर लिखी पंक्तियाँ याद हैं?”
हान यू ने पूछा, “यह कौन-सी जगह है?”
हान श्यांगज़ी ने उत्तर दिया, “यह लानगुआन है।”
हान यू ने गहरी साँस ली। कुछ देर विचार करने के बाद उन्होंने एक कविता पूरी की, जिसमें वही पंक्तियाँ शामिल थीं:
प्रातःकाल मैंने सम्राट को अपना निवेदन प्रस्तुत किया,और उसी संध्या मुझे चाओझोउ निर्वासित कर दिया गया।मैंने केवल राज्य की त्रुटिपूर्ण नीतियों को सुधारने का प्रयास किया, यद्यपि सफल नहीं हो सका;तो फिर अपने शेष दुर्बल जीवन के लिए मुझे क्या पछतावा हो सकता है?
छिनलिंग पर्वतों पर छाए बादलों के बीच आगे का मार्ग दिखाई नहीं देता,बर्फ़ से ढके लानगुआन में मेरा घोड़ा अपने घुटने भी आगे नहीं बढ़ा पाता।तुम इतनी दूर से मुझसे मिलने आए, इसके लिए धन्यवाद।कृपया बाद में झांग नदी के तट पर मेरे अंतिम संस्कार की व्यवस्था कर देना।
टिप्पणी: झांग नदी के बारे में उस समय यह माना जाता था कि उसका जल अस्वास्थ्यकर था और रोग फैलाने वाला था।
मगरमच्छों की कहानी
जब हान यू चाओझोउ पहुँचे, तो उन्होंने स्थानीय लोगों से बातचीत कर उनके जीवन के बारे में जानकारी ली। उन्हें पता चला कि उस क्षेत्र के मगरमच्छ अधिकांश घरेलू पशुओं को खा जाते थे, जिससे लोगों का जीवन बहुत कठिन हो गया था।
क्षेत्र का निरीक्षण करने के बाद हान यू ने विचार किया कि सच्ची निष्ठा दिव्य शक्तियों को भी प्रभावित कर सकती है। उन्होंने देवताओं के लिए भेंट तैयार की और “मगरमच्छों के लिए बलि-प्रार्थना” नामक एक लेख लिखा।
उस प्रार्थना में उन्होंने लिखा कि यह स्वाभाविक है कि मगरमच्छ प्राचीन काल से उस क्षेत्र में रहते आए हैं। लेकिन उन्होंने उनसे आग्रह किया कि तांग राजवंश के सद्गुणी शासन के सम्मान में वे स्थानीय लोगों को हानि पहुँचाना बंद करें और कुछ दिनों के भीतर वहाँ से चले जाएँ—अधिमानतः समुद्र में कई मील दूर किसी स्थान पर।
उन्होंने आगे लिखा: “अन्यथा, इस क्षेत्र का प्रशासक होने के नाते मैं योग्य अधिकारियों और नागरिकों का चयन करूँगा, उन्हें शक्तिशाली धनुष-बाण और विषैले तीरों से सुसज्जित करूँगा, और मगरमच्छों के विरुद्ध युद्ध करूँगा। जब तक अंतिम मगरमच्छ का भी अंत नहीं हो जाएगा, मैं विश्राम नहीं करूँगा। उस समय यह मत कहना कि मैंने पहले से चेतावनी नहीं दी थी!”
उसी रात उस क्षेत्र में भयंकर गर्जन-तूफ़ान आया। किंतु आश्चर्यजनक रूप से नदी का जल सूख गया। इसके बाद मगरमच्छ दूसरे जलाशयों की ओर चले गए और कुछ समय बाद नदी फिर सामान्य रूप से बहने लगी।
लानगुआन में आई कठिन परीक्षा ने हान यू को दिव्य सत्ता के अस्तित्व पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित किया। इसका प्रमाण मगरमच्छों के लिए लिखी उनकी प्रार्थना तथा चाओझोउ में रहने के दौरान देवताओं से संबंधित उनके अन्य लेखों में भी मिलता है।
चाओझोउ में रहते समय हान यू का दादियन बाओतोंग नामक एक बौद्ध भिक्षु से भी घनिष्ठ संपर्क हुआ। हान यू ने उनका वर्णन इन शब्दों में किया: “वे असाधारण रूप से बुद्धिमान और विवेकी हैं... ऐसे व्यक्ति जिन्होंने शारीरिक सीमाओं का अतिक्रमण कर लिया है, जो बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होते, और जिन्हें सत्य का अत्यंत गहरा बोध है।”
एक कहावत है: “सत्य सिखाया नहीं जाता, बल्कि जिया जाता है।” हान यू की कहानी हमें यह दिखाती है कि जीवन के अनुभव, कठिनाइयाँ और आत्मचिंतन किसी व्यक्ति की सोच को बदल सकते हैं। यह कथा ऐसे विचार प्रस्तुत करती है जो हमारे जीवन और हमारी समझ को समृद्ध बना सकते हैं।
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