(Minghui.org) मैंने 1997 में फालुन दाफा का अभ्यास शुरू किया और शीघ्र ही असाधारण स्वास्थ्य लाभ का अनुभव किया। यद्यपि मेरे पास कोई उच्च डिग्री नहीं है और मैं अपनी लेखन क्षमता को भी बहुत साधारण मानता हूँ, फिर भी साथी अभ्यासी ने मुझे अपनी कहानी साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया।
फालुन दाफा सीखने से पहले मेरा स्वास्थ्य अत्यंत खराब था। 1958 से ही मेरे दाहिने पैर में गंभीर गठिया था और मैं दशकों तक असहनीय पीड़ा सहता रहा। 1980 के दशक में मेरी गर्दन की रीढ़ में असामान्य हड्डी की वृद्धि हो गई और दोनों कंधे भी जकड़ गए। मेरा हर दिन दर्द में बीतता था, लेकिन सबसे कठिन समय अभी आना बाकी था।
दिसंबर 1991 की एक दोपहर, एक भारी डिब्बा उठाते समय मेरी कमर में गंभीर चोट लग गई। मेरी स्थिति लगातार बिगड़ती गई और अंततः मुझे चिकित्सकीय अवकाश लेना पड़ा। परिवार के एक सदस्य ने एक डॉक्टर को घर बुलाया, लेकिन उपचार के बाद मेरी हालत और खराब हो गई। मेरी कमर और दाहिने पैर की संवेदना पूरी तरह समाप्त हो गई। कुछ ही घंटों बाद मेरा बायाँ पैर भी काम करना बंद कर गया और मैं चलने-फिरने में असमर्थ हो गया।
अगले दिन मुझे स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। कई जाँचों के बाद डॉक्टर ने गठिया का निदान किया और मांसपेशियों व स्नायुओं को आराम देने तथा रक्त संचार बढ़ाकर सुन्नपन कम करने के लिए चीनी जड़ी-बूटियों की दवा दी। एक सप्ताह तक उपचार चला, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। जब मेरे कार्यस्थल के अधिकारी मुझे देखने आए और मेरी गंभीर स्थिति देखी, तो उन्होंने अस्पताल के निदेशक से आग्रह किया कि मुझे आगे की जाँच के लिए प्रांतीय अस्पताल भेजा जाए।
अगले दिन मुझे प्रांतीय अस्पताल स्थानांतरित कर दिया गया। उस समय पूरे प्रांत में केवल वहीं एमआरआई मशीन थी और जाँच के लिए लोगों की लंबी कतार लगी हुई थी। तीन दिन प्रतीक्षा नहीं करना चाहता था, इसलिए मैंने मशीन चलाने वाले डॉक्टर को कुछ पैसे दिए और तुरंत एमआरआई करवा लिया। जाँच में कमर की डिस्क खिसकने (लम्बर डिस्क हर्निएशन) का पता चला और शल्य-चिकित्सा की सलाह दी गई।
इसके बाद मुझे एक सैन्य अस्पताल में ऑपरेशन के लिए भेजा गया। ऑपरेशन के दौरान मुख्य चिकित्सक मेरी स्थिति देखकर चकित रह गए। उन्होंने कहा, "यह कैसी डिस्क की समस्या है? डिस्क तो पूरी तरह टूट चुकी है! मैंने ऐसा मामला पहले कभी नहीं देखा। ऑपरेशन के बाद भी मरीज की हालत में अधिक सुधार नहीं होगा।" यह शल्य-चिकित्सा सात घंटे तक चली। एक महीने बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ और मैं घर लौट आया।
कुछ महीनों बाद मैं फिर स्थानीय अस्पताल गया, इस आशा में कि शायद कोई दूसरा उपचार मिल सके। सीटी स्कैन के बाद डॉक्टर ने बताया कि मेरी पाँचवीं कमर की कशेरुका का ऑपरेशन करना होगा। उन्होंने प्रांतीय अस्पताल से एक प्रोफेसर को बुलाया। विस्तृत जाँच के बाद प्रोफेसर ने कहा, "आपकी स्थिति बहुत गंभीर है। मुझे डर है कि मैं आपका ऑपरेशन नहीं कर सकता।" कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि पहले ऑपरेशन के कारण नसें अपनी सामान्य स्थिति में नहीं रहीं। उन्होंने कहा, "मैं आपके लिए कुछ नहीं कर सकता," और चले गए।
अगली सुबह मैंने विभागाध्यक्ष डॉक्टर से किसी भी प्रकार के ऑपरेशन की संभावना के लिए विनती की, लेकिन उन्होंने भी मना कर दिया। निराश होकर मैंने अपने बेटे से मुझे घर ले चलने को कहा। घर पहुँचते ही मैंने सैन्य अस्पताल में फोन किया और दोबारा ऑपरेशन की संभावना पूछी। आश्चर्य की बात यह थी कि उन्होंने मुझे फिर से ऑपरेशन के लिए बुला लिया।
अगस्त 1992 में मेरा दूसरा ऑपरेशन हुआ, लेकिन उससे भी कोई लाभ नहीं हुआ। मेरी कमर और पैर वैसे ही सुन्न रहे। निराशा में मैंने तरह-तरह के फिजियोथेरेपी उपकरण खरीदे और कमर पर अनेक प्रकार के मरहम लगाए, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया।
तब तक मुझे लगभग छह वर्ष से चिकित्सकीय अवकाश पर रहना पड़ रहा था। जहाँ मेरे सहकर्मियों का वेतन बढ़ रहा था, वहीं मुझे अपने पुराने वेतन का केवल 60 प्रतिशत, अर्थात प्रति माह 190 युआन (लगभग 28 अमेरिकी डॉलर) मिलता था। मेरी पीड़ा का गहरा प्रभाव मेरी पत्नी पर भी पड़ा और उन्हें कई बार हृदय संबंधी समस्याएँ हुईं। ऐसा लगने लगा मानो हमारा पूरा जीवन बिखर गया हो।
मुझे विश्वास हो गया था कि मेरा जीवन समाप्त हो चुका है। मैंने जीने की इच्छा ही खो दी थी। मई 1997 में मैंने एक सिरिंज और एक रेज़र ब्लेड तैयार कर लिया और निश्चय किया कि जब घर में कोई नहीं होगा तब मैं आत्महत्या कर लूँगा। लेकिन हर बार जब मैं ऐसा करने की कोशिश करता, मेरे मन में एक विचार आता—"क्या पता कल मैं ठीक हो जाऊँ?"
एक दिन मेरे एक सहकर्मी मुझसे मिलने आए और पूछा कि क्या मैं फालुन दाफा सीखना चाहूँगा। उन्होंने कहा, "इस अभ्यास में रोगों को दूर करने की अद्भुत शक्ति है।" मैंने उत्तर दिया कि मेरी शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं है कि मैं अभ्यास कर सकूँ। तब उन्होंने सुझाव दिया कि मैं पहले पुस्तक पढ़ूँ। मैंने सहमति दे दी।
अगले दिन वे मेरे लिए ज़ुआन फालुन की एक प्रति लेकर आए। पढ़ना शुरू करते ही मैं पुस्तक छोड़ नहीं पाया। मुझे लगा कि उसमें लिखी हर बात मेरे मन को गहराई से छू रही है। आधी पुस्तक पढ़ते-पढ़ते प्रतिदिन पी जाने वाली शराब और सिगरेट से मेरा मोह स्वतः समाप्त हो गया और मैंने दोनों छोड़ दिए। बाद में मुझे समझ आया कि मास्टरजी मेरी सहायता कर रहे थे। उसी समय मैंने एक परिश्रमी अभ्यासी बनने का निश्चय कर लिया।
चूँकि मैं बाहर जाकर अभ्यास नहीं कर सकता था, इसलिए साथी अभ्यासी ने मेरे कमरे की दीवार पर अभ्यास की मुद्राओं वाला पोस्टर लगा दिया। मुझे सभी क्रियाएँ सीखने में दो दिन लगे। शुरुआत में मैं केवल पाँच मिनट तक ही खड़ा रह पाता था और फिर बैठना पड़ता था, लेकिन प्रतिदिन मेरी क्षमता बढ़ती गई। दो सप्ताह से भी कम समय में मैं अन्य लोगों की तरह बाहर जाकर अभ्यास करने लगा और मेरी सभी बीमारियाँ गायब हो गईं। मेरा पूरा परिवार अत्यंत प्रसन्न था।
मैं लगभग छह वर्षों तक बिस्तर पर पड़ा रहा। कोई उपचार, शल्य-चिकित्सा या दवा मुझे ठीक नहीं कर सकी, लेकिन फालुन दाफा से परिचय होने के बाद सब कुछ बदल गया। मास्टरजी और दाफा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मैंने एक सुंदर ध्वज बनाया और उसे अभ्यास स्थल पर लगाया।
मेरे अनेक सहकर्मी भी लंबे समय से गंभीर या पुरानी बीमारियों से पीड़ित थे, जिनका आधुनिक चिकित्सा से उपचार नहीं हो पा रहा था। जब उन्होंने इतने कम समय में मेरा उल्लेखनीय स्वास्थ्य लाभ देखा, तो हमारे कार्यस्थल पर अभ्यासियों की संख्या सात से बढ़कर 300 से अधिक हो गई, जिनमें कई अधिकारी भी शामिल थे। कार्यस्थल के बाहर भी लोगों तक यह अभ्यास पहुँचाने के लिए मैं दूर-दराज़ के गाँवों में गया और उन्हें अपना अनुभव तथा फालुन दाफा के स्वास्थ्य लाभों के बारे में बताया।
जून 1997 में अभ्यास शुरू करने के बाद अब लगभग 30 वर्ष बीत चुके हैं। प्रतिदिन मास्टरजी की शिक्षाओं का अध्ययन करना और अभ्यास करना मेरे स्वास्थ्य को उत्कृष्ट बनाए हुए है। मैं मास्टरजी और दाफा के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
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