(Minghui.org) 2019 में जब COVID चीन से पूरी दुनिया में फैल गया और व्यापक दहशत का कारण बना, तब मुझे लगा कि मानवता एक बंद गली में पहुँच गई है। मैं एक पवित्र भूमि की खोज करने के लिए व्याकुल थी।

मैंने फालुन दाफा की खोज की

31 मार्च, 2021 को मुझे पहली बार ज़ुआन फालुन पढ़ने का सौभाग्य मिला। जब मैंने इसे पूरा पढ़ लिया, तो मुझे निश्चित हो गया कि यही वह पवित्र भूमि है जिसकी मैं खोज कर रही थी। उसी दिन से मैंने फालुन दाफा का अभ्यास शुरू कर दिया।

मैं प्रतिदिन पाँचों अभ्यास करती थी, "ऑन दाफा" और होंग यिन को कंठस्थ करती थी तथा ज़ुआन फालुन को हाथ से लिखकर उतारती थी। मेरे भीतर गहरी शांति और स्थिरता का अनुभव होने लगा, और भविष्य के प्रति आशा से मेरा हृदय भर गया। लेकिन स्वयं को दूसरों से अलग-थलग रखने और अर्जित धारणाओं के कारण बनी मानसिक बाधाओं की वजह से मैं यह नहीं समझ पाई कि अंतर्मन में कैसे देखना है। इसलिए एक अभ्यासी होने का मेरा बोध केवल सतही स्तर तक ही सीमित रहा।

मानवीय भावनाओं और धारणाओं के नियंत्रण में

व्यक्तिगत लाभ की मेरी आसक्ति और प्रतिष्ठा बचाने की इच्छा बार-बार उभर आती थी। मैं बहस करती, मन में नाराज़गी पालती और बिल्कुल एक साधारण व्यक्ति की तरह व्यवहार करती। बाद में मुझे गहरा पछतावा होता कि मैं फालुन दाफा के सत्य, करुणा और सहनशीलता के मार्गदर्शक सिद्धांतों से पूरी तरह भटक गई थी, फिर भी मुझे स्वयं को बदलने में असहायता महसूस होती थी।

मैंने उस असहायता की भावना को एक ओर रख दिया और साधना जारी रखी। यद्यपि मेरा संकल्प दृढ़ था, फिर भी मैं अपने झूठे स्व से चिपकी रही। मैं भीतर झाँककर अपने शिनशिंग को ऊँचा नहीं उठा पाई और न ही अपने पारिवारिक संबंधों में संतुलन बनाए रख सकी।

इसका परिणाम यह हुआ कि मेरे पति की मेरे प्रति गलतफहमियाँ और बढ़ गईं, और हमारा वैवाहिक संबंध टूटने की कगार पर पहुँच गया। हमारे बीच बढ़ते तनाव को देखकर अप्रैल 2024 के अंत में मेरे माता-पिता और छोटे भाई ने लंबी यात्रा करके मुझसे मिलने का निर्णय लिया। उन्होंने मुझे साधना छोड़ देने के लिए समझाया। लेकिन मैंने भी एक साधारण व्यक्ति की तरह प्रतिक्रिया दी और उनसे बहस करने लगी। अंततः निराश होकर मैंने उन्हें घर से जाने के लिए कह दिया।

मानवीय तर्कों में फँसी हुई

परिवार के चले जाने के बाद मैं पूरी तरह टूट गई। ऐसा लगा मानो मेरी सारी ऊर्जा निकल गई हो। मुझे लगा कि मेरी साधना इतनी कमजोर है कि यदि वे फिर से मेरे सामने आ जाएँ, तो भी मैं उनके साथ करुणापूर्वक व्यवहार नहीं कर पाऊँगी। यह स्पष्ट था कि मेरा आचरण एक अभ्यासी के अनुरूप नहीं था।

मैं जानती थी कि मैं फ़ा के मानकों पर खरा नहीं उतर रही हूँ, फिर भी मैं अपनी मानवीय प्रकृति में उलझी हुई थी और गहरे अवसाद में डूब गई ।

मैं बार-बार यह सोचती रही कि मैंने उनसे इतनी तीखी बहस क्यों की। उस समय मेरे मन में यह दृढ़ धारणा थी कि "आस्था की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है, और किसी को भी किसी व्यक्ति के विचारों या उसकी आस्था को बदलने का अधिकार नहीं है।"

मेरे भीतर एक और गहरी धारणा भी छिपी हुई थी—"मेरे माता-पिता अपने बच्चों का सम्मान नहीं करते। वे बच्चे को केवल अपना एक विस्तार मानते हैं, जिसे अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी रूप में ढाला जा सकता है।"

सच्चा स्व बनाम झूठा स्व

मेरे और मेरे माता-पिता के बीच संवाद का जो तरीका वर्षों से बना हुआ था, वह दमन और विरोध पर आधारित था। जब मैंने इस पर गंभीरता से विचार किया, तो अचानक "धारणाएँ" और "गहराई से जड़ जमाना" जैसे शब्दों ने मेरा ध्यान एक महत्वपूर्ण बात की ओर आकर्षित किया—अर्जित धारणाओं से निर्मित मेरा झूठा स्व।

जब मैं इस झूठे स्व के नियंत्रण में होती हूँ, तब मैं यह प्रमाणित करने के बजाय कि फालुन दाफा कितना महान है, केवल यह सिद्ध करने की कोशिश करती हूँ कि मैं सही हूँ, और दूसरों की बात सुनने से इनकार कर देती हूँ। अर्जित धारणाओं से बना यह झूठा स्व इतना शक्तिशाली और घना है कि यह मेरे वास्तविक स्व को दबा देता है और उसे बाँध देता है। यही मेरे और दाफा के बीच एक अवरोध खड़ा कर देता है, जिससे मैं स्वयं को असहाय और शक्तिहीन महसूस करती हूँ।

जो मानवीय पक्ष लगातार यह कहता है कि "मेरी गलती नहीं है", "मैं फ़ा की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सकती ", या "मैं अच्छी तरह साधना नहीं कर सकती "—वह वास्तव में जन्म के बाद बनी धारणाओं से निर्मित झूठा स्व है। वह मेरा वास्तविक स्वरूप नहीं है!

जब मुझे यह बात सचमुच समझ में आई, तो मेरा अवसाद तुरंत दूर हो गया, और साधना के प्रति मेरा उत्साह तथा आत्मविश्वास लौट आया।

अब जबकि मैं जन्म के बाद बनी धारणाओं से बने इस मोटे आवरण या झूठे स्व को पहचान चुकी हूँ, मैं उसे अब स्वीकार नहीं करती और उसे समाप्त करने का प्रयास करती हूँ। मेरे लिए अपने वास्तविक स्व और झूठे स्व के बीच अंतर कर पाना अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है।

मास्टरजी ने कहा:

"कुछ लोग लंबे समय तक विचार-कर्म को क्यों समाप्त नहीं कर पाते? क्योंकि वे यह पहचानने का प्रयास ही नहीं करते कि कौन-से विचार वास्तव में उनके अपने हैं। हम आपसे साधना करने के लिए क्यों कहते हैं? सबसे पहले आपको साधना के माध्यम से बुरे विचारों को समाप्त करना चाहिए। आप उन बुरी चीज़ों से इसलिए छुटकारा पा सकते हैं क्योंकि आप उन्हें अपना नहीं मानते। यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। जब आप उन्हें अपना नहीं मानते, तभी आप उन्हें समाप्त कर सकते हैं। वास्तव में वे आप नहीं हैं। वे जन्म के बाद आपके द्वारा किए गए कार्यों से विकसित हुई विभिन्न धारणाएँ या कर्म हैं।" "मनुष्य क्या चाहता है, यह उसी पर निर्भर करता है। केवल जब आप उन चीज़ों को नहीं चाहते, तभी उन्हें आपके लिए हटाया जा सकता है।"

— (पश्चिमी अमेरिका फ़ा सम्मेलन में शिक्षाएँ )

अब मैं विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि जब अगली बार मेरी मुलाकात अपने माता-पिता और छोटे भाई से होगी, तो मैं शांत रहूँगी और स्वयं को याद दिलाऊँगी कि जन्म के बाद बनी वे धारणाएँ—वह झूठा स्व—मुझे फिर से भावनात्मक और तीखी बहस में न धकेल सके।

अनुभव-साझाकरण लेखों से मिली और गहरी समझ

करुणामय मास्टरजी ने एक बार फिर मेरी स्वार्थ की आसक्ति के संबंध में मेरा मार्गदर्शन किया।

नवंबर 2024 में, मिंगहुई रेडियो ने 21वें मुख्यभूमि चीन फ़ा सम्मेलन के अनुभव-साझाकरण लेखों पर आधारित 16 कड़ियों की एक श्रृंखला प्रकाशित की।

इनमें से "दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्र में शिक्षण" शीर्षक वाले एक लेख में एक अभ्यासी के अनुभव का वर्णन था। उत्पीड़न के शुरुआती वर्षों में वह एक शिक्षिका के रूप में कार्य करते हुए फ़ा की महानता को प्रमाणित करती रहीं और दमन का दृढ़तापूर्वक सामना करती रहीं।

उन्हें शहर के एक प्रतिष्ठित विद्यालय से पदावनत करके उनके घर से 20 किलोमीटर (लगभग 12.5 मील) दूर एक पर्वतीय क्षेत्र के विद्यालय में पढ़ाने के लिए भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने कई वर्षों तक अध्यापन किया।

उन्होंने दाफा के सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन करते हुए उस पर्वतीय क्षेत्र के लोगों में फालुन दाफा के प्रति सकारात्मक समझ विकसित की। उदाहरण के लिए, जब वर्षा या बर्फबारी के कारण सड़कें कीचड़ से भर जातीं और अन्य शिक्षकों के लिए दोपहर के भोजन हेतु घर लौटना कठिन हो जाता, तो वे उनके लिए भोजन तैयार करती थीं। ऐसे वातावरण में, जहाँ दाफा के विरुद्ध बदनाम करने वाला प्रचार व्यापक रूप से फैलाया जा रहा था, उन्होंने अपने विद्यार्थियों को दाफा की सच्चाई बताई तथा उन्हें सदाचार और दूसरों के साथ उचित व्यवहार करने के सिद्धांत सिखाए। उनकी कहानी ने मुझे गहराई से प्रभावित किया।

मैंने महाविद्यालय में शिक्षा विषय का अध्ययन किया था और शिक्षक बनने का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। मैंने स्वयं से पूछा, "यदि मैं उनकी स्थिति में होतीं, तो क्या मैं भी उस अभ्यासी की तरह फ़ा की महानता को प्रमाणित कर पातीं? क्या मैं भी उनकी तरह लगनपूर्वक साधना कर पातीं?" उत्तर था—नहीं।

क्यों नहीं? मेरे मन में एक ही उत्तर आया—"स्वार्थ की आसक्ति!" तभी मुझे ऐसा लगा मानो मास्टरजी मुझे यह समझा रहे हों। अचानक मेरे मन में यह स्पष्ट बोध हुआ, "हाँ! यही कारण है! मुझमें स्वार्थ की आसक्ति है!"

इसके बाद मुझे मिंगहुई पर प्रकाशित "स्व' की आसक्ति के बारे में मेरी समझ" शीर्षक वाला एक लेख मिला। मुझे लगा कि उसमें इस झूठे स्व का अत्यंत व्यापक और गहन विश्लेषण किया गया है। लेखक की समझ के आधार पर मेरा मानना है कि जब हम अर्जित धारणाओं का खंडन करते हैं और उन्हें अस्वीकार करते हैं, जब हम अपनी आसक्तियों को हल्के में लेकर उन्हें छोड़ते हैं, और जब हम दृढ़ सद्विचारों के माध्यम से विचार-कर्म तथा रोग -कर्म जैसे कर्मों को समाप्त करते हैं, तब वास्तव में हम उसी "स्व" का परित्याग कर रहे होते हैं और उसके प्रति अपनी आसक्ति को समाप्त कर रहे होते हैं।

एक साथी अभ्यासी ने कर्म का खंडन करने और उसका प्रतिरोध करने के विषय में अपनी समझ साझा की। उन्होंने कहा:

"जब तुम्हारी धारणाएँ तुम्हें बताती हैं कि तुम्हें दर्द हो रहा है या तुम असहज हो, तो उनसे कहो, 'दर्द तुम्हें हो रहा है! असहज तुम हो!' और जब वे कहें कि तुम मरने वाले हो, तो उत्तर दो, 'मरने वाले तुम हो!'"

मेरा मानना है कि कर्म का इस प्रकार खंडन और अस्वीकार करने का तरीका विभिन्न आसक्तियों और अर्जित धारणाओं को समाप्त करने में भी लागू किया जा सकता है। अर्थात् भ्रम के साथ बहने के बजाय उसका खंडन करना, उसे अस्वीकार करना और उसे समाप्त करना।

दैनिक जीवन में दृढ़तापूर्वक साधना करना

पारिवारिक वातावरण में मुझे यह स्पष्ट दिखाई देता है कि स्वार्थ की आसक्ति कितनी सूक्ष्म और खतरनाक हो सकती है। परिवार के सदस्य एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते हैं और उनके बीच भावनात्मक संबंध भी बहुत गहरे होते हैं। यदि हम सावधान न रहें, तो हम आसानी से भावनाओं के दृष्टिकोण से परिस्थितियों को देखने लगते हैं।

उदाहरण के लिए, मुझे पता है कि मेरे पति को चाय पसंद है, इसलिए मैं उनके लिए एक कप चाय बनाकर लाती हूँ। लेकिन वे उसे स्वीकार करने के बजाय कोई दूसरा पेय ढूँढ़ लेते हैं। या मैं उन्हें ओढ़ने के लिए कंबल देती हूँ, पर वे उसका उपयोग नहीं करते।

ऐसे समय मेरे भीतर असंतोष और नाराज़गी उत्पन्न होती है: "मैं तुम्हारे लिए अच्छा करना चाहती हूँ, फिर भी तुम उसे स्वीकार नहीं करते। तुम्हें तो अच्छा और बुरा भी समझ में नहीं आता! यदि सद्विचारी देवता और बुद्ध मुझे स्वीकार करते हैं, तो तुम क्यों नहीं करते?"

लेकिन बाद में मुझे एहसास हुआ कि यह विचार अहंकार से उत्पन्न हुआ था। यह इसलिए था क्योंकि मैं फ़ा के अनुरूप नहीं सोच रही थी और अपने स्वार्थ से चिपकी हुई थी।

जब मैं शांत हुई और फ़ा के दृष्टिकोण से स्थिति को देखा, तो मुझे मास्टरजी की यह शिक्षा याद आई:

"...कोई भी कार्य करते समय सबसे पहले दूसरों का विचार करना है..."— ( ज़ुआन फालुन, व्याख्यान नौ )

अपने पति की स्थिति पर विचार करने पर मुझे समझ आया कि वास्तव में वे भी कष्ट झेल रहे थे। जब मैंने साधना शुरू की थी, तब मेरा व्यवहार एक अभ्यासी के अनुरूप नहीं था, इसलिए उन्होंने मुझसे दूरी बना ली।

इसके अतिरिक्त, कर्म के रूपांतरण का पहलू भी है। वे मेरे कर्म को समाप्त करने में मेरी सहायता कर रहे हैं और मेरे चरित्र को ऊँचा उठाने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। मुझे तो उनका आभारी होना चाहिए। फिर मैं अपने अहंकार से क्यों चिपकी रहूँ और क्रोध या नाराज़गी क्यों पालूँ?

साथ ही, मुझे लगता है कि स्वार्थ की आसक्ति की जड़ स्वार्थपरता और निजी लाभ की भावना है। केवल फ़ा का ईमानदारी और गहराई से अध्ययन करके तथा स्वयं से कठोरता से दाफा के सिद्धांतों के अनुसार आचरण की अपेक्षा करके ही मैं वास्तव में सच्ची साधना कर सकती हूँ, स्वार्थ की आसक्ति को समाप्त कर सकती हूँ और उस अवस्था को प्राप्त कर सकती हूँ जिसका वर्णन मास्टरजी ने किया है:

 "आपको प्रत्येक कार्य में सबसे पहले दूसरों का विचार करना चाहिए, ताकि आप निःस्वार्थता और परोपकार की सद्विचारपूर्वक ज्ञानप्राप्ति प्राप्त कर सकें।" — "बुद्ध-स्वभाव में कोई चूक नहीं", (आगे और उन्नति के लिए आवश्यकताये)

यह मेरी वर्तमान साधना-स्थिति के स्तर पर मेरी समझ है। यदि इसमें कोई अनुचित बात हो, तो कृपया करुणापूर्वक उसका संकेत दें।