(Minghui.org) ताइवान भर के स्वयंसेवी फालुन दाफा समन्वयक 4 और 5 जुलाई को ताइपेई के चिएन तान यूथ एक्टिविटी सेंटर में एकत्र हुए। उन्होंने दो दिनों तक फ़ा का अध्ययन किया और अपनी साधना के अनुभव साझा किए। इस दौरान उन्होंने साधना से प्राप्त अपनी समझ पर विचार-विमर्श किया तथा विभिन्न परिस्थितियों में मिलकर बेहतर प्रगति करने के तरीकों पर चर्चा की। चर्चा के मुख्य विषयों में फ़ा का अध्ययन, अभ्यासियों के उत्पीड़न के बारे में लोगों को सच्चाई बताना, अपने शिनशिंग (नैतिक चरित्र) को ऊँचा उठाना और आपसी समन्वय को बेहतर बनाना शामिल था।
चौदह समन्वयकों ने अपने साधना अनुभव साझा किए। उन्होंने जिम्मेदारी निभाने, सामूहिक साधना के वातावरण को बेहतर बनाने, आत्मसंतोष पर विजय पाने, विभिन्न आसक्तियों को छोड़ने तथा आत्मनिरीक्षण और निस्वार्थ सहयोग के माध्यम से अपने चरित्र को निरंतर उन्नत करने के अनुभवों पर प्रकाश डाला।

समन्वयकों ने 5 जुलाई, 2026 की सुबह ताइपे में चिएन टैन यूथ एक्टिविटी सेंटर में अभ्यास किया (Minghui.org)

पूरे ताइवान के समन्वयकों ने 5 जुलाई की दोपहर को एक साझाकरण सत्र आयोजित किया (Minghui.org)
स्मार्टफोन की लत से मुक्ति
चेंग-होंग ने बताया कि उन्होंने अभ्यास करते समय बार-बार नींद आने की समस्या पर कैसे विजय पाई। साथी अभ्यासियों ने भी देखा था कि अभ्यास के दौरान उन्हें झपकी आने लगती थी। उन्होंने स्वयं को सतर्क रहने की याद दिलाई, यहाँ तक कि आँखें खुली रखकर अभ्यास करने का प्रयास किया। लेकिन कुछ समय बाद उनकी आँखें धीरे-धीरे बंद हो जातीं और वे फिर सो जाते।
उन्होंने महसूस किया कि उनींदापन केवल एक सतही लक्षण है; इसके पीछे छिपी मूल आसक्तियों को पहचानना आवश्यक है। आत्मनिरीक्षण करने पर उन्होंने पाया कि वे अक्सर अपने मोबाइल फोन पर लगातार स्क्रॉल करते रहते थे और वीडियो देखते रहते थे। इससे उनकी लगन और परिश्रमपूर्वक साधना करने की दृढ़ता कमजोर हो रही थी। इसलिए उन्होंने मोबाइल फोन का उपयोग कम करने का संकल्प लिया। परिणामस्वरूप, शाम के समय उनके पास अधिक खाली समय रहने लगा। वे सुबह लगभग 4:00 बजे उठकर अभ्यास करने लगे और उनका मन पहले की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट और एकाग्र हो गया।
इस अनुभव से चेंग-होंग ने समझा कि मोबाइल फोन की लत कितनी आसानी से लग सकती है। कई बार वे केवल काम से संबंधित कोई कार्य करने के उद्देश्य से फोन उठाते, लेकिन कुछ ही क्षणों में स्वयं को कोई वीडियो देखते हुए पाते। उन्हें यह देखकर आश्चर्य होता कि यह तो उनका वास्तविक उद्देश्य था ही नहीं, फिर भी उनका हाथ मानो किसी अदृश्य शक्ति के प्रभाव में स्वयं ही ऐसा कर रहा था।
उन्होंने अनुभव किया कि मोबाइल फोन पर अपनी निर्भरता कम करने से न केवल उनकी साधना में सुधार हुआ, बल्कि समय की बर्बादी भी रुकी और वे अपनी जिम्मेदारियों को पहले से अधिक अच्छी तरह निभाने में सक्षम हुए।
सुंदर दिखने की आसक्ति छोड़ने पर दर्द समाप्त हो गया
शिन-मेई ने बताया कि उनके शरीर के आधे हिस्से में दर्द रहने लगा था। पैरों, घुटनों, कमर, छाती और पीठ तक लगातार दर्द रहता था। उनका स्वास्थ्य सामान्यतः अच्छा था, इसलिए वे समझ नहीं पा रही थीं कि ऐसा क्यों हो रहा है।
आत्मनिरीक्षण करने पर उन्हें एहसास हुआ कि वे अपने शरीर के आकार-प्रकार को लेकर अत्यधिक चिंतित थीं। उन्हें लगता था कि अधिक वजन होने से वे आकर्षक नहीं दिखतीं, और इसी कारण उनके भीतर अपने रूप-रंग के प्रति एक आसक्ति विकसित हो गई थी। वजन कम करने के लिए उन्होंने विशेष प्रकार का सूप पीना शुरू कर दिया।
समय के साथ उन्होंने समझा कि एक अभ्यासी को सामान्य और संतुलित भोजन करना चाहिए तथा व्यक्ति का शारीरिक स्वरूप भी दैवी व्यवस्था के अनुसार होता है। उन्होंने महसूस किया कि हाल के दिनों में उनकी शारीरिक असुविधा का वास्तविक कारण सुंदरता और बाहरी रूप-रंग के प्रति उनकी आसक्ति थी। उन्होंने वजन घटाने वाला सूप पीना बंद कर दिया, और जैसे ही उन्होंने उसे छोड़ा, उनका दर्द भी समाप्त हो गया।
उन्होंने कहा कि सामान्य लोग उम्र बढ़ने के साथ विभिन्न शारीरिक समस्याओं का अनुभव करते हैं, लेकिन एक अभ्यासी साधारण लोगों के सिद्धांतों से बंधा नहीं होता। उन्होंने कहा,
"अभ्यासियों के पास बीमारी नहीं, बल्कि कर्म होता है। यदि शरीर में कोई असामान्य स्थिति उत्पन्न हो, तो व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और अपने शिनशिंग (नैतिक चरित्र) को उन्नत करना चाहिए।"
अधिक जिम्मेदारी उठाना
युंग-ताई ने बताया कि जब उन्होंने तीन वर्ष पहले फालुन दाफा का अभ्यास शुरू किया, तब दिनभर काम में व्यस्त रहने के कारण वे शाम को फ़ा का अध्ययन करते और अपनी साधना की स्थिति का आत्मनिरीक्षण करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने फ़ा अध्ययन का समय बढ़ाया, प्रतिदिन अपनी कमियों को लिखना और भीतर झाँकना शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप उनकी साधना में निरंतर प्रगति होने लगी।
वर्ष 2025 में काऊशुंग में आयोजित उस कार्यक्रम के दौरान, जो उत्पीड़न शुरू होने की स्मृति में आयोजित किया गया था, स्थल पर तेज़ हवाओं और मूसलाधार वर्षा का सामना करना पड़ा। इस परिस्थिति ने युंग-ताई के मन में यह इच्छा जगाई कि वे स्थानीय अभ्यासियों के लिए साधना के वातावरण को बेहतर बनाएँ। शीघ्र ही उन्हें एहसास हुआ कि यह वही जिम्मेदारी है जिसे उन्हें निभाना चाहिए। इसके बाद उन्होंने नौ-दिवसीय फालुन दाफा कक्षाओं में अभ्यासों का प्रदर्शन करने, फ़ा-अध्ययन समूहों का समन्वय करने तथा क्षेत्रीय समन्वयक के रूप में सेवा करने जैसी अनेक जिम्मेदारियाँ संभाल लीं।
क्षेत्रीय समन्वयक बनने के बाद युंग-ताई ने अभ्यास स्थल और फ़ा-अध्ययन स्थलों के वातावरण को सुधारने में स्वयं को समर्पित कर दिया। एक अभ्यास स्थल पर पहले लगभग कोई भी अभ्यासी नियमित रूप से नहीं आता था। उन्होंने प्रतिदिन वहाँ समय से पहले पहुँचकर स्थान की सफाई करना, अभ्यास करना और फ़ा का अध्ययन करना शुरू किया, साथ ही अन्य अभ्यासियों को भी साथ आने के लिए आमंत्रित किया। अब वहाँ नियमित रूप से सात या आठ अभ्यासी अभ्यास करने आते हैं।
उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति जिम्मेदारी लेने और योगदान देने के लिए तैयार होता है, तो अक्सर अप्रत्याशित सकारात्मक परिवर्तन सामने आते हैं। उनके अनुभव ने उन्हें यह भी सिखाया कि अन्य अभ्यासियों के साथ निस्वार्थ भाव से सहयोग करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मन को शांत रखना और दूसरों की बात सुनना
वित्तीय क्षेत्र में कार्यरत फांगलिंग ने कहा कि अभ्यासी सामूहिक फ़ा-अध्ययन और अनुभव-साझा करने के वातावरण से स्वयं को अलग नहीं कर सकते। यदि कोई सचमुच अन्य अभ्यासियों के अनुभवों को ध्यानपूर्वक सुनता है, तो प्रत्येक अनुभव स्वयं के सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत बन सकता है।
उन्होंने कहा, "जब मैं दूसरों के अनुभव सुनती हूँ, तो वह केवल उनकी बात नहीं होती; वह मुझे यह भी दिखाता है कि मुझे स्वयं किन क्षेत्रों में आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है।"
एक अन्य अभ्यासी ने बताया कि जब भी वह काम करते समय स्वयं को थका हुआ महसूस करने लगती थीं, तो उनके सहकर्मियों में भी थकान और उत्साहहीनता के लक्षण दिखाई देने लगते थे। इस अनुभव से उन्हें समझ में आया कि व्यक्ति के विचार अपने आसपास के वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बाद उन्होंने अपने प्रत्येक विचार पर ध्यान देना शुरू किया और हर परिस्थिति में स्वयं को दाफा की आवश्यकताओं के अनुरूप आचरण करने का प्रयास किया।
सच्ची जिम्मेदारी
चाओ-जेन ने कहा कि इस वर्ष के अनुभव-साझा कार्यक्रम की सबसे गहरी छाप उन पर यह पड़ी कि साथी अभ्यासी खुले मन से अपने साधना अनुभव और अपनी समझ साझा करने के लिए तैयार थे। इससे उन्हें साधना के इस अनमोल अवसर को संजोने और अपनी साधना में निरंतर नई प्रगति करने के महत्व का और भी गहरा बोध हुआ।
पहले वे चाहते थे कि अनुभव-साझा सत्रों का संचालन कोई और करे, लेकिन अब वे स्वयं इन सत्रों का संचालन करते हैं और साथी अभ्यासियों को अपने अनुभव साझा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उनका मानना है कि प्रत्येक अभ्यासी के जीवन के अनुभव और साधना से प्राप्त समझ अलग-अलग होती है, और अनुभव साझा करने की प्रक्रिया परस्पर प्रेरणा तथा सामूहिक उन्नति का माध्यम बनती है।
समन्वयक शू-लिएन का मानना है कि इस भूमिका का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष समन्वय या प्रबंधन करना नहीं, बल्कि साथी अभ्यासियों के साथ साधना के मार्ग पर चलना है। उनका विश्वास है कि जब हम साथी अभ्यासियों से संवाद करें, तो समानता और सच्ची भावना के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करें, न कि स्वयं को श्रेष्ठ मानकर उनसे अपेक्षाएँ रखें।
उन्होंने कहा, "मैं स्वयं भी इसी मार्ग पर चली हूँ। मैं केवल अपनी समझ इसलिए साझा करती हूँ कि शायद इससे साथी अभ्यासियों को कुछ सहायता मिल सके।" उन्होंने यह भी कहा कि जब लोग एक-दूसरे की बात सुनने और परस्पर स्नेह एवं सहयोग दिखाने के लिए तैयार होते हैं, तो सभी की उन्नति होती है।
चुपचाप जिम्मेदारी निभाना और योगदान देना
चिंग-वेन ने बताया कि हाल ही में उन्हें "बिना किसी शर्त के सहयोग" का एक नया अर्थ समझ में आया। उनके अनुसार, सच्चा सहयोग केवल मन मारकर किया गया प्रयास नहीं होता, बल्कि वह हृदय से उत्पन्न होने वाली स्वेच्छापूर्ण प्रतिबद्धता होती है।
वे कई वर्षों से समन्वयक हैं और अक्सर अभ्यासियों के बीच उत्पन्न मतभेदों को सुलझाने तथा उनके बीच संवाद स्थापित करने में सहायता करती रही हैं। दबाव और गलतफहमियों के कारण कभी-कभी उनके मन में शिकायत और पीड़ा की भावना भी उत्पन्न हुई। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें यह समझ आया कि हर बार जब वे दूसरों की सहायता करती हैं, तो वास्तव में वह उनके अपने आध्यात्मिक उत्थान का अवसर होता है। साथी अभ्यासियों द्वारा सामना की जाने वाली कठिनाइयाँ भी उनकी अपनी साधना के लिए सीख बन जाती थीं। उन्होंने अनुभव किया कि केवल फ़ा में उत्तर खोजकर ही वे वास्तव में दूसरों की सहायता कर सकती हैं और अपनी आसक्तियों के बंधनों से मुक्त हो सकती हैं।
जैसे-जैसे उनकी समझ गहरी होती गई, वैसे-वैसे उनके मन में साथी अभ्यासियों और अन्य समन्वयकों के प्रति कृतज्ञता बढ़ती गई, और वे निस्वार्थ भाव से योगदान देने के अपने संकल्प में और भी दृढ़ हो गईं।
दो दिनों तक चले फ़ा-अध्ययन और अनुभव-साझा कार्यक्रम में अनेक समन्वयकों ने फ़ा-अध्ययन, आत्मनिरीक्षण तथा समन्वय और सहयोग से संबंधित अपनी सच्ची समझ और साधना के अनुभव साझा किए। इन विचार-विमर्शों के माध्यम से उन्होंने एक-दूसरे को प्रेरित किया और परिश्रमपूर्वक साधना करते हुए साथ मिलकर निरंतर उन्नति करने के अपने विश्वास को और अधिक मजबूत किया।
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