(Minghui.org) मैं 80 वर्ष की हूँ। फालुन दाफा का अभ्यास शुरू करने के बाद मास्टरजी ने मेरी सभी बीमारियाँ दूर कर दीं। अब मेरी दृष्टि तेज़ है, सुनने की क्षमता अच्छी है, मैं फुर्ती से चलती हूँ और ऊर्जा से भरपूर रहती हूँ।

मास्टरजी की करुणा ने मुझे कठिन परीक्षाओं से पार कराया

मैं पूरे वर्ष लोगों को फालुन दाफा के बारे में बताने के लिए बाहर जातीहूँ। शुरुआत में जब मुझे ऐसे लोग मिलते थे जो फालुन दाफा पर हो रहे उत्पीड़न के बारे में मेरी बात सुनना नहीं चाहते थे, तो मैं डर जाती थी और स्वयं को आहत महसूस करती थी। लेकिन धीरे-धीरे मैं उन्हें दाफा के विरुद्ध अपराध करने से रोकने में सक्षम हो गई । बाद में मैं अपनी इच्छा के अनुसार अपनी अलौकिक शक्तियों का उपयोग भी कर सकती थी। एक कठिन साधना-प्रक्रिया से गुजरने के बाद, मास्टरजी ने मुझे अलौकिक शक्तियाँ प्रदान कीं और अपनी असीम करुणा से मेरे आगे आने वाली कठिन परीक्षाओं का समाधान किया।

बर्फीले रास्ते पर भय और अपमान की भावना ने मेरी इच्छाशक्ति को मजबूत किया

चाहे कड़ाके की ठंड हो, भीषण गर्मी, तेज़ हवा या बर्फबारी—मैं बिना किसी हिचकिचाहट के लोगों को सच्चाई बताने के मार्ग पर आगे बढ़ती रहती हूँ। हर वर्ष मैं चीनी नववर्ष की पूर्व संध्या तक लोगों को सच्चाई बताती हूँ, फिर दो दिन विश्राम करती हूँ और तीसरे दिन फिर निकल पड़ती हूँ। शुरुआत में जब मुझे बुरे लोग मिलते थे, तो मैं भयभीत हो जाती थी और मन ही मन दुखी भी होती थी। लेकिन पीछे मुड़कर देखने पर समझ आया कि वे केवल मेरी इच्छाशक्ति को दृढ़ बना रहे थे।

सन् 2014 की एक सर्दियों के दिन भारी बर्फबारी हो रही थी, फिर भी मैं अपनी साइकिल धकेलते हुए बाहर निकल पडी । जब भी मुझे कोई पूर्वनियत संबंध वाला व्यक्ति मिलता, मैं उसे सुरक्षा-ताबीज देती, उसे फालुन दाफा के बारे में सच्चाई बताती और अपनी शुभकामनाएँ देती। चलते-चलते मैं ठंड और बर्फ को भूल गई । मेरा पूरा ध्यान केवल ऐसे लोगों को खोजने पर था जिनका दाफा से पूर्वनियत संबंध हो।

तभी मैंने देखा कि एक व्यक्ति सामने आ रहा है। मैं जल्दी से अपनी साइकिल धकेलते हुए उसके पास पहुँ ची और उसे सुरक्षा-ताबीज देना चाहा। लेकिन ताबीज बिना किसी आवाज़ के बर्फ पर गिर गया। सफेद बर्फ की पृष्ठभूमि पर वह ताबीज और भी सुंदर दिखाई दे रहा था। ठंड के कारण मेरे हाथ इतने सुन्न हो चुके थे कि ताबीज पर मेरी पकड़ ही छूट गई थी।

उस व्यक्ति से फालुन दाफा के बारे में बात करने के बाद मैं बिना अधिक सोचे आगे बढ़ गया। तभी मैंने मन में सोचा, “मुझे कुछ अजीब-सा क्यों लग रहा है? मेरा शरीर कुछ बोझिल क्यों महसूस हो रहा है?” नीचे देखा तो पाया कि मेरी छाती तक बर्फ से ढकी हुई थी, मानो मैंने सामने बर्फ से भरा कोई भारी ढक्कन बाँध रखा हो। लेकिन मुझे इसका बिल्कुल एहसास नहीं हुआ था। उलटे, मेरा शरीर गर्माहट महसूस कर रहा था।

2004 में एक परीक्षा जिसने मेरी इच्छाशक्ति को और दृढ़ किया

सन् 2004 में मैं अपनी साइकिल से लोगों को फालुन दाफा के बारे में बताने निकली थी। रास्ते में मेरी मुलाकात लगभग 40 वर्ष के एक व्यक्ति से हुई। जब बात फालुन गोंग पर आई, तो वह गुस्से से चिल्लाया, “दफ़ा हो जाओ! यहाँ से निकल जाओ!”

उस क्षण मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने सोचा, “मैं तो तुम्हारे ही भले के लिए यह कर रही हूँ, फिर भी तुम मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हो। मुझे बहुत अन्याय महसूस हो रहा है।”

उसी समय मास्टरजी की यह कविता मेरे मन में आई:

“एक महान प्रबुद्ध व्यक्ति कठिनाइयों से नहीं डरता,

जिसकी दृढ़ इच्छाशक्ति वज्र के समान गढ़ी गई है।

जीवन और मृत्यु के प्रति आसक्ति से मुक्त होकर,

वह आत्मविश्वास और गरिमा के साथफ़ा-संशोधन के मार्ग पर चलता है।”

(“सद्विचार और सद्कर्म,” होंग यिन II)

मैंने इस कविता का तीन बार पाठ किया और मेरा मन शांत हो गया। मैंने सोचा, “मैं एक दाफा अभ्यासी हूँ, जो साधना करके एक प्रबुद्ध अस्तित्व बनने का प्रयास कर रहा है। एक साधारण व्यक्ति की केवल एक कठोर बात सुनकर मैं आँसू कैसे बहा सकती हूँ? क्या प्रबुद्ध प्राणी आँसू बहाते हैं?”

मैंने अपनी आँखें पोंछीं और आगे बढ़ गई। मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो मास्टरजी मेरे ठीक सामने खड़े हों। इसके बाद जब भी कोई मुझे डाँटता या अपमानित करता, मैं फिर कभी नहीं रोई। मैं केवल उसकी ओर देखती और वह शांत हो जाता।

जब मुझे लगता कि कोई व्यक्ति मास्टरजी या दाफा की निंदा करने वाला है, तो मैं शांत भाव से कहती, “चुप रहिए।” वह व्यक्ति भी शांत हो जाता। जब मैं उस दिन लोगों को सच्चाई बताकर लौटी, तो मैंने यह अनुभव एक अन्य अभ्यासी को बताया। उन्होंने कहा, “मास्टरजी ने तुम्हें शक्तियाँ प्रदान की हैं। उनका उपयोग क्यों नहीं करते? ये शक्तियाँ लोगों को बचाने के लिए हैं।”

अलौकिक शक्तियाँ मेरे साथ रहीं

कुछ समय बाद मैंने अनुभव किया कि लोगों को सच्चाई बताना पहले की तुलना में कहीं अधिक सहज हो गया है। मैंने अपनी अनेक आसक्तियों को छोड़ना शुरू किया और खुलकर तथा गरिमापूर्ण ढंग से लोगों को फालुन दाफा के बारे में बताने लगा।

कभी-कभी मेरी मुलाकात विशेष पदों पर कार्यरत लोगों से भी होती थी। ऐसे अवसरों पर मैं उनके भीतर की जन्मजात सद्भावना को जागृत करने का प्रयास करती और पूरी कोशिश करती कि उनके मन में नकारात्मक विचार उत्पन्न न हों। इस प्रकार कई संभावित खतरनाक परिस्थितियाँ सुरक्षित रूप से टल जाती थीं।

2022 की एक घटना

सन् 2022 में, तीन वर्ष तक चले महामारी लॉकडाउन के समाप्त होने के कुछ समय बाद, सड़क किनारे मेरी मुलाकात लगभग 60 वर्ष के एक व्यक्ति से हुई। जब मैंने फालुन गोंग का विषय छेड़ा, तो उसने क्रोध से कहा, “मेरा एक रिश्तेदार पुलिस प्रमुख है। मैं अभी उसे फ़ोन करता हूँ और तुम्हें पुलिस थाने भिजवाता हूँ।” उसने अपना मोबाइल फ़ोन निकाल लिया। मैं मुस्कराई और शांत स्वर में बोली, “भाई, मैं यह सब आपके ही भले के लिए कह रही  हूँ। यह गंभीर संकट के समय आपकी रक्षा कर सकता है। क्या आप सचमुच मेरी शिकायत कर पाएँगे? मैं सत्तर वर्ष से अधिक आयु की हूँ। हमारे बीच न कोई दुश्मनी है और न कोई वैर। यदि हम एक ही इमारत में रहते, तो आप मुझे ‘बड़ी बहन’ कहकर बुलाते। क्या कोई अपनी बड़ी बहन को पुलिस के हवाले करेगा?”

वह कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया, फिर बोला,“जाइए।”

इस घटना ने मुझे यह समझाया कि जब मेरे सद्विचार दृढ़ होते हैं, तब दूसरे व्यक्ति के लिए बुराई करना कठिन हो जाता है। मेरे करुणामय विचारों ने उसके पीछे काम कर रहे नकारात्मक विचारों को शांत कर दिया।

उस दिन घर लौटने के बाद मुझे लगा कि मास्टरजी ने मेरा उत्साहवर्धन किया। मैं साढ़े तीन घंटे तक ध्यान में बैठी  रही और इस दौरान मेरे पैरों में बिल्कुल भी दर्द नहीं हुआ।

लोगों को पूरी तरह सच्चाई समझाना आवश्यक है

दुष्ट तत्वों को समाप्त करने से पहले हमें लोगों को पूरी तरह सच्चाई समझानी चाहिए। केवल तभी उन्हें वास्तव में बचाया जा सकता है।

सन् 2023 में सड़क किनारे मेरी मुलाकात एक सेवानिवृत्त व्यक्ति से हुई, जिसके व्यक्तित्व में विशेष गरिमा दिखाई देती थी। जब मैंने उससे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) से अपने संबंध समाप्त करने की बात कही, तो उसने उपेक्षा से कहा, “क्या तुम्हें लगता है कि तुम कुछ लोग मिलकर पार्टी को गिरा दोगे?” मैंने उत्तर दिया, “हम पार्टी को गिराना नहीं चाहते। सीसीपी एक दुष्ट सत्ता है, इसलिए स्वर्ग ही उसे समाप्त करना चाहता है। हम केवल लोगों के हित के लिए यह बात बताते हैं। आजकल कुछ उच्च पदस्थ अधिकारियों के अंग खराब होने पर उन्हें नए अंग प्रत्यारोपित किए जाते हैं। इसके लिए जबरन अंग निकाले जाने की घटनाएँ शुरू हुईं। क्या यह सामान्य लोगों का व्यवहार है?

हमारे मास्टरजी मानसिक रोगियों को अपने व्याख्यानों में प्रवेश नहीं करने देते थे। फिर सीसीपी का यह प्रचार कि फालुन गोंग लोगों को मानसिक रूप से असामान्य बना देता है, कैसे सही हो सकता है?

वांग जिनदोंग का शरीर गंभीर रूप से जल गया था, लेकिन उसके बाल और उसके पैरों के बीच रखी मिट्टी के तेल की बोतल नहीं जली। लियू सिइंग की श्वासनली क्षतिग्रस्त बताई गई, फिर भी वह स्पष्ट रूप से बोल रही थी और गाना भी गा रही थी। लियू चुनलिंग की मृत्यु भी संदिग्ध परिस्थितियों में हुई…

कृपया यह सुरक्षा-ताबीज रख लीजिए। मेरी कामना है कि यह आपको संकटों से सुरक्षित रखे तथा शांति और मंगल प्रदान करे।”

इसके बाद मैंने उत्पीड़न से जुड़े अन्य विषयों पर भी बात की और उसे शुभकामनाएँ दीं। अंततः वह सच्चाई को समझ गया और मेरी ओर मुड़कर बोला, “आपकी शिक्षा अवश्य बहुत उच्च होगी। यह वास्तव में अद्भुत है। मैं पूरी तरह आश्वस्त हो गया हूँ। लगभग चालीस वर्ष पहले मैं सीसीपी में शामिल हुआ था। तीन-चार समूह पहले भी मुझे सच्चाई समझाने आए थे, लेकिन मैंने पार्टी नहीं छोड़ी। कृपया मेरी ओर से सीसीपी से संबंध समाप्त करा दीजिए। आपने इतनी अच्छी तरह समझाया है।”

यह देखकर कि उसने सच्चाई को स्वीकार कर लिया, मुझे उसके लिए बहुत प्रसन्नता हुई। एक फैशनेबल महिला से मुलाकात एक बार मैंने एक सुसज्जित महिला को सच्चाई बतानी शुरू की, जो देखने में सीसीपी व्यवस्था से जुड़ी लग रही थी। जैसे ही मैंने बात शुरू की, वह घबरा गई और तुरंत पुलिस को फ़ोन करने लगी।

मैंने शांत स्वर में कहा,“आप शांत रहिए।” वह कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गई। मैंने मुस्कराते हुए कहा, “बहन, नाराज़ होने की आवश्यकता नहीं है। मेरी बात पर विश्वास करना या न करना आपका अपना निर्णय है। मैं केवल आपके हित के लिए यह कह रहा हूँ। मेरी आशा है कि जब कोई आपदा आए, तो दिव्य शक्तियाँ आपकी रक्षा करें। यह सुरक्षा-ताबीज रख लीजिए।”

ऐसा लगा जैसे वह कुछ कहना चाहती हो, लेकिन उसने केवल मुँह खोला; बहुत प्रयास करने पर भी उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। इसके बाद मैं वहाँ से चली गई । काफी दूर जाने के बाद जब मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो वह अब भी वहीं स्थिर खड़ी थी, मानो जड़ हो गई हो।

मेरे अनुभव में, उस समय मास्टरजी ने एक बार फिर मेरी रक्षा की और स्थिति को शांतिपूर्वक समाप्त होने दिया। साथ ही उस महिला ने भी कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिससे उसके लिए नकारात्मक परिणाम उत्पन्न होते। यहाँ मैं करुणामय और महान मास्टरजी के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ।

मास्टरजी हर समय अपने शिष्यों की रक्षा करते हैं

जब हम लोगों को सच्चाई बताते हैं, तब मास्टरजी अपने शिष्यों की रक्षा करते हैं। वास्तव में, वे हर समय अपने शिष्यों पर ध्यान रखते हैं।

एक बार मैं सड़क पर साइकिल चला रही थी। मैंने देखा कि सड़क साफ़ करने वाला एक वाहन किनारे खड़ा था। उससे बचने के लिए मैं सड़क के एकदम किनारे हो गई । तभी पीछे से मोटरसाइकिल चला रहा एक युवक मुझसे टकरा गया।

टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि मैं दूर जाकर ज़मीन पर गिर पडी । मेरा सिर सबसे पहले ज़मीन से टकराया। मैंने हाथ से सिर पकड़ा तो महसूस हुआ कि वहाँ से रक्त बह रहा है।युवक घबरा गया। एक राहगीर ने उससे कहा, “आपने अभी तक इस बुज़ुर्ग महिला को उठाया क्यों नहीं?” मैंने कहा,“मैं ठीक हूँ। मैं स्वयं उठ सकती हूँ।” मैं उठ तो गई, लेकिन फिर दोबारा ज़मीन पर बैठ गई। युवक तुरंत दौड़कर आया और मुझे सहारा देकर खड़ा किया।

मैंने उससे कहा,“बेटा, डरो मत। मैं फालुन दाफा का अभ्यासी हूँ। क्या तुमने कभी सुना है कि सीसीपी और उससे जुड़े संगठनों से अपने संबंध समाप्त करने से व्यक्ति के लिए शांति और सुरक्षा का मार्ग खुल सकता है?”उसने उत्तर दिया, “नहीं।” मैंने आगे पूछा,“क्या तुम कभी युवा लीग में शामिल हुए थे या लाल स्कार्फ़ पहना था?” उसने कहा,“हाँ, दोनों किया था।”

मैंने सिर पकड़े-पकड़े अपनी साइकिल तक जाकर एक पेन और वह छोटी पुस्तिका निकाली, जिसमें उन लोगों के नाम लिखती थी  जिन्होंने सीसीपी से अपने संबंध समाप्त करने पर सहमति दी थी। फिर मैंने उससे अपना नाम लिखने के लिए कहा और उसकी ओर से सीसीपी तथा उससे संबद्ध संगठनों से संबंध समाप्त करने में उसकी सहायता की।इसके बाद मैंने उस युवक से कहा, “बेटा, मैं फालुन दाफा का अभ्यास करती हूँ। मास्टरजी मेरी रक्षा करेंगे और मुझे सुरक्षित रखेंगे। यदि मैं एक साधारण व्यक्ति होता, तो क्या आज तुम बिना किसी परेशानी के यहाँ से जा पाते? मेरी आयु तो सत्तर वर्ष से भी अधिक है।”

आसपास खड़े लोगों ने आश्चर्य से कहा,“आपकी उम्र सत्तर से अधिक है, फिर भी इतने गंभीर हादसे के बाद आपको कुछ नहीं हुआ?” मैंने उत्तर दिया,“मैं बिल्कुल ठीक हूँ। बेटा, अब तुम जा सकते हो।” मैंने अपने सिर को टटोलकर हाथ देखा। आश्चर्य की बात यह थी कि वहाँ न तो खून था और न ही कोई सूजन। इसके बाद मैं फिर लोगों को सच्चाई बताने निकल पडी और बाद में घर लौटी। यदि यह दुर्घटना किसी साधारण व्यक्ति के साथ हुई होती, तो पता नहीं उसे कितनी गंभीर चोटें आतीं।

उस दिन दोपहर में फ़ा का अध्ययन करते समय मैंने पुस्तक खोली तो आश्चर्यचकित रह गया। पुस्तक के सभी शब्द सुनहरे रंग के दिखाई दे रहे थे। वे अत्यंत सुंदर लग रहे थे। यहाँ तक कि विराम-चिह्न भी सुनहरे दिखाई दे रहे थे। एक अन्य अवसर पर मेरी साइकिल अचानक नियंत्रण से बाहर होकर सड़क के किनारे मुड़ने लगी। मैंने उसे सीधा करने का प्रयास किया, लेकिन हैंडल मेरे नियंत्रण में ही नहीं आ रहा था। तभी अचानक ज़ोर की आवाज़ हुई और मैं जाकर एक कार के पीछे टकरा गई।

न तो किसी व्यक्ति को चोट लगी और न ही कार को कोई नुकसान पहुँचा। मैंने सोचा कि यदि मैं कार से न टकराती, तो शायद सड़क पर गिरकर गंभीर रूप से घायल हो जाती। मैंने समझा कि मास्टरजी की सुरक्षा के कारण ही मैं एक कर्म-ऋण चुका सकी।

एक और बार मैं साइकिल चला रही थी कि अचानक मुझे होश ही नहीं रहा। जब मुझे चेतना लौटी, तो देखा कि मेरा शरीर किसी कार के पीछे टिका हुआ है। यदि वह कार वहाँ न होती, तो मेरे साथ क्या होता, इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। उस समय कार में भी कोई नहीं था। ऐसी घटनाएँ कई बार हुईं, लेकिन हर बार मैं मास्टरजी की रक्षा में सुरक्षित रही ।

साथी अभ्यासियों से आगे आने और अपनी प्रागैतिहासिक प्रतिज्ञाओं को मिलकर पूरा करने का आवाहन

मास्टरजी चाहते हैं कि दाफा अभ्यासी अधिक से अधिक लोगों को सच्चाई बताएँ और उन्हें बचाएँ। मैंने देखा कि अभी भी बहुत-से अभ्यासी बाहर आकर यह कार्य नहीं कर रहे थे। लेकिन हम सब एक ही शरीर के समान हैं, और प्रत्येक दाफा अभ्यासी का अपना एक मिशन है। इसलिए मैंने उन साथी अभ्यासियों से आग्रह किया कि वे भी आगे आएँ और अपनी प्रागैतिहासिक प्रतिज्ञा को पूरा करें।

एक बार मैं लोगों को सच्चाई बताने के लिए लगभग 113 किलोमीटर (70 मील) दूर एक ग्रामीण क्षेत्र में गई। वहाँ के लोग बहुत सरल और निष्कपट थे। मैंने एक साथ 40 से अधिक लोगों को सच्चाई बताई और वे सभी उसे समझ गए। वापस लौटकर मैंने कुछ अभ्यासियों से कहा कि वहाँ के लोगों तक पहुँचना अपेक्षाकृत आसान है। वे प्रेरित हुए और अगली बार हम सब साथ गए।

एक दिन हम लगभग छह अभ्यासी 113 किलोमीटर दूर स्थित एक ग्रामीण बाज़ार पहुँचे। उस वर्ष गर्मी असाधारण रूप से अधिक थी। 38 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी में हम तपती धूप के बीच पूरे बाज़ार में पूर्वनियत संबंध वाले लोगों की तलाश करते रहे। उस दिन प्रत्येक अभ्यासी ने सामान्य दिनों की तुलना में लगभग दस अधिक लोगों तक सच्चाई पहुँचाई। सभी अत्यंत प्रसन्न थे।

बस से उतरने के बाद हम सभी सफ़ेद बालों वाली वृद्ध महिलाएँ पूरे उत्साह के साथ अपनी-अपनी साइकिलों पर घर लौट रही थीं। उस दृश्य को देखकर मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैंने मन ही मन कहा,“मास्टरजी, आपके शिष्यों ने फ़ा-संशोधन की प्रगति के साथ कदम मिला लिया है और अब लोगों को सच्चाई बताने के लिए आगे आ गए हैं।”

पहले सभी अभ्यासी केवल अपने-अपने घरों के आसपास ही लोगों से मिलते थे, इसलिए प्रतिदिन सीमित लोगों तक ही पहुँच पाते थे। कई लोगों को दूर जाना कठिन लगता था और वे चिंतित रहते थे।लेकिन अब स्थिति बदल गई है। अब कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। सभी मिलकर चर्चा करते हैं कि अगली बार किस स्थान पर जाना है।

एक बार मुझे चिंता हुई कि कहीं बस में हम सबके लिए पर्याप्त सीटें न हों। मैंने कहा, “मुझे डर है कि बस में हमारे लिए जगह कम पड़ जाएगी।”एक अभ्यासी ने मुस्कराकर कहा,“यदि जगह कम होगी तो हम थोड़ा और सिमटकर खड़े हो जाएँगे।” मैंने पूछा,“और यदि तब भी जगह न मिले?” उन्होंने उत्तर दिया,“तो अगली बस में चढ़ जाएँगे।”

यही वह अभ्यासी थीं जो पहले अपने घर से बाहर निकलकर लोगों को सच्चाई बताने के लिए तैयार नहीं होती थीं, क्योंकि उनके पड़ोस में उन्हें ऐसे लोग नहीं मिलते थे जिन्हें वे पूर्वनियत मानती थीं। लेकिन अब उन्हें कोई भी कठिनाई रोक नहीं सकती थी।

मास्टरजी की सहायता करते हुए फ़ा-संशोधन में भाग लेने का सभी का उत्साह निरंतर बढ़ता जा रहा है। आज हमारे सात अभ्यासियों का समूह मास्टरजी की देखरेख और संरक्षण में इस मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ रहा है।

मेरा विश्वास है कि केवल पूरे मन और पूरी शक्ति से प्रयास करके ही मैं दाफा अभ्यासी होने के उस दुर्लभ सम्मान के योग्य बन सकती हूँ, जो युगों-युगों में विरले ही प्राप्त होता है। मैं आशा करती हूँ कि भविष्य में हम वही करेंगे जो मास्टरजी हमसे अपेक्षा करते हैं, ताकि एक दिन हम उन्हें मुस्कराते हुए देख सकें।