(Minghui.org) जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिता का मुझ पर गहरा प्रभाव था। वे अत्यंत विद्वान और गहन विचारों वाले व्यक्ति थे। जीवन में उनकी सबसे बड़ी इच्छा यह समझना थी कि जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है। बचपन में मैं सोचती थी कि जब मैं विश्वविद्यालय जाऊँगी, तब मुझे इस प्रश्न का उत्तर अवश्य मिल जाएगा।
लेकिन लगभग बीस वर्ष बाद, विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बावजूद भी मुझे इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला। मेरे प्राध्यापकों ने हमें मार्क्सवादी दर्शन, राजनीतिक अर्थशास्त्र और आधुनिक चीनी इतिहास पढ़ाया। यद्यपि मुझे अच्छे अंक प्राप्त हुए, फिर भी मेरे भीतर एक गहरा खालीपन बना रहा। जो ज्ञान मैंने प्राप्त किया था, वह मुझे जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझाने में असमर्थ था।
स्नातक होने के बाद मेरा विवाह हुआ और मैंने परिवार बसाया। कुछ समय बाद मेरा स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और मैं चिड़चिड़ी होती गई। आधुनिक चिकित्सा से उपचार कराने पर भी मेरी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। पुरानी समस्याएँ समाप्त नहीं हुईं और नई समस्याएँ लगातार सामने आती रहीं। मैं स्वयं को असहाय और भ्रमित महसूस करती थी। मुझे समझ नहीं आता था कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है और मेरा जीवन गलत दिशा में क्यों जा रहा है।
धीरे-धीरे मैं मानसिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह टूटने लगी। मुझे जीवन का उद्देश्य ही दिखाई नहीं देता था। पहले मैं सोचती थी कि जीवन का अर्थ सच्चा प्रेम प्राप्त करना है, लेकिन वास्तविकता ने इस विश्वास को पूरी तरह तोड़ दिया।
मेरे पति प्रतिभाशाली व्यक्ति थे, लेकिन वे अत्यंत पुरुष-प्रधान सोच वाले और असंवेदनशील थे। गर्भावस्था के दौरान उन्होंने मुझे थप्पड़ मारा। प्रसव के बाद जब मैं स्वास्थ्य लाभ कर रही थी, तब उन्होंने मुझे लात मारी। जब मैं मानसिक रूप से अत्यंत दुखी थी, तब वे दूसरी महिलाओं की तस्वीरें मेरे सामने रख देते थे। ऐसी घटनाएँ बार-बार होती रहीं।
परिणामस्वरूप, मैं उनसे घृणा करने लगी और हमेशा के लिए उन्हें छोड़ देना चाहती थी। लेकिन आर्थिक रूप से स्वयं का पालन-पोषण करने की क्षमता खो देने के कारण मैं स्वयं को असहाय और बंधा हुआ महसूस करती थी। हम दोनों लगातार एक-दूसरे को चोट पहुँचाते रहे और हमारा वैवाहिक जीवन पीड़ादायक तथा अस्वस्थ संबंधों से भरा रहा। मैं इस स्थिति को संभालने में पूरी तरह असमर्थ थी और बार-बार मिली भावनात्मक चोटों के कारण मेरे मन में गहरी कटुता भर गई थी।
मानसिक पीड़ा के साथ-साथ मेरा शारीरिक स्वास्थ्य भी तेजी से बिगड़ने लगा। रूमेटॉइड आर्थराइटिस के कारण मेरे शरीर का लगभग हर जोड़ दर्द से पीड़ित रहता था। चार वर्षों तक उपचार कराने के बाद भी कोई विशेष सुधार नहीं हुआ।
मैं अत्यंत दुबली-पतली और पीली पड़ गई थी। मेरी आयु केवल 27 वर्ष थी, लेकिन मुझे ऐसा लगता था मानो मेरी सारी युवावस्था समाप्त हो चुकी हो।
वर्षों तक बीमारियों की पीड़ा सहने के बाद मेरी सबसे बड़ी इच्छा केवल एक स्वस्थ शरीर पाने की रह गई थी। उन चार वर्षों में राहत पाने के लिए मैंने लगभग हर संभव प्रयास किया। आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ मैंने बौद्ध और ताओवादी ग्रंथ पढ़े तथा दो अन्य चीगोंग पद्धतियों का भी अभ्यास किया, लेकिन उनसे मुझे बहुत कम लाभ मिला।
निराशा और असहायता के बीच मैं अक्सर कल्पना करती थी कि शायद कहीं कोई सच्चे गुरु हों जो मुझे इस दुःख से मुक्त कर सकें।
सन् 1996 में मेरे पति एक दिन काम से लौटे और उन्होंने बताया कि उनके एक सहकर्मी की माता ने चांगचुन में आयोजित नौ-दिवसीय फालुन दाफा व्याख्यान श्रृंखला में भाग लिया था।उन्होंने बताया कि केवल नौ दिनों में ही उनकी रूमेटॉइड आर्थराइटिस पूरी तरह ठीक हो गई। यह सुनकर मेरा हृदय गहराई से प्रभावित हुआ। मुझे दृढ़ विश्वास हुआ कि शायद अब मुझे भी बचाया जा सकता है। कुछ ही समय बाद मेरे पति फालुन दाफा की पुस्तकें, ऑडियो रिकॉर्डिंग और वीडियो टेप घर लेकर आए। मैंने उत्साहपूर्वक उन्हें पढ़ना और फ़ा का अध्ययन करना शुरू किया। इसके बाद मेरे जीवन में अद्भुत परिवर्तन आने लगे।
मेरी सभी बीमारियाँ धीरे-धीरे समाप्त हो गईं और बहुत कम समय में मेरा स्वास्थ्य तथा ऊर्जा पूरी तरह लौट आई। यह परिवर्तन इतना स्पष्ट था कि जिसने भी मुझे पहले और बाद में देखा, वह आश्चर्यचकित रह गया। जो व्यक्ति पहले अत्यंत कमजोर और बीमार रहता था, वही कुछ ही समय बाद स्वस्थ, ऊर्जावान और स्फूर्तिवान दिखाई देने लगा। कुछ समय बाद मैंने अपनी कंपनी द्वारा आयोजित 3,000 मीटर दौड़ में भाग लिया और दूसरा स्थान प्राप्त किया।
केवल एक महीने के भीतर मैं एक लंबे समय से बीमार रहने वाली रोगी से प्रतियोगिता की सबसे तेज़ धाविकाओं में से एक बन गई थी। मेरे इस आश्चर्यजनक परिवर्तन को देखकर मेरे रिश्तेदार, मित्र और सहकर्मी सभी हैरान रह गए।
मेरे शारीरिक स्वास्थ्य में आया सुधार आश्चर्यजनक था, लेकिन मेरे मन और सोच में आया परिवर्तन उससे भी अधिक गहरा था। मास्टरजी ने सरल और सहज भाषा में फालुन दाफा के गहन और दूरगामी सिद्धांतों को समझाया तथा उन मूलभूत प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दिया, जिनका उत्तर मैं वर्षों से खोज रही थी।
प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक, स्वर्ग से लेकर पृथ्वी तक, विशाल ब्रह्मांड से लेकर सूक्ष्मतम स्तर तक, साधना-जगत से लेकर मानव समाज तक—मास्टरजी ने उन अनेक रहस्यों की व्यापक व्याख्या की, जिन्होंने जीवन भर मुझे उलझाए रखा था। अंततः मुझे उत्तर मिल गया। मुझे वह मिल गया जिसकी मैं इतने वर्षों से तलाश कर रही थी—ब्रह्मांड का सत्य।
दाफा में बताए गए गहन सिद्धांतों को पढ़कर मैं अनेक बार भावुक होकर रो पड़ी। उसी क्षण से मेरी सबसे बड़ी इच्छा एक अच्छा और ईमानदार व्यक्ति बनने की थी—ऐसा व्यक्ति जो धीरे-धीरे अपने स्वार्थ को छोड़ सके और ज़ुआन फालुन में मास्टरजी द्वारा सिखाए गए सिद्धांतों तथा दाफा के मार्गदर्शन के अनुसार जीवन जी सके। मैं पूरे मन से सत्य, करुणा और सहनशीलता जैसे सुंदर सिद्धांतों को अपने दैनिक जीवन में अपनाना चाहती थी। मनुष्य के इस सीमित जीवन में इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है कि किसी को ब्रह्मांड का यह सार्वभौमिक सत्य प्राप्त हो और वह उसी के अनुसार जीवन जी सके?
जुलाई 1999 में फालुन दाफा पर क्रूरतापूर्ण उत्पीड़न शुरू हुआ।मैं न्याय की अपील करने और फालुन दाफा के लिए निष्पक्ष व्यवहार की माँग करने तीन बार बीजिंग गई।इसके परिणामस्वरूप मुझे अवैध रूप से श्रम शिविर और बाद में कारावास की सज़ा दी गई।
इस दौरान मेरे रिश्तेदारों, मित्रों और सहकर्मियों ने मुझे गलत समझा। कार्यस्थल पर भी मुझे भेदभाव और विभिन्न प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ा।रिहा होने के बाद मैं पुनः अपने कार्यस्थल पर लौट आई। कुछ अधिकारी और सहकर्मी मेरे प्रति सहानुभूति रखते थे, कुछ ने सहायता की पेशकश की, जबकि कुछ ने पूछा कि वे मेरी किस प्रकार मदद कर सकते हैं। लेकिन मैंने महसूस किया कि अधिकांश लोग केवल मेरे प्रति सहानुभूति रखते थे। वे वास्तव में फालुन दाफा, साधना या उसके उत्पीड़न को समझ नहीं पाए थे।
कई लोगों का विचार था कि मैं एक अच्छी इंसान तो हूँ, लेकिन भोली, नासमझ या परिस्थितियों से अनभिज्ञ हूँ। कुछ लोग मुझे नज़रअंदाज़ करते थे और कुछ तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे। मैंने निश्चय किया कि लोगों को वास्तविक स्थिति समझानी चाहिए।इस उद्देश्य से मैंने इंटरनेट के माध्यम से उनसे संवाद करना शुरू किया। मैं आधुनिक चीन के इतिहास और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के उदय से बात शुरू करती, फिर फालुन दाफा के प्रसार और उसके बाद हुए उत्पीड़न के बारे में बताती।
मूल तथ्यों से लेकर सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों तक, मैं धैर्यपूर्वक लोगों को चरण-दर-चरण वास्तविक स्थिति समझाती। मेरे लिए यह वास्तव में अच्छाई और बुराई के बीच का संघर्ष था।समाज में नैतिक मूल्यों के पतन और सीसीपी के लंबे समय से चल रहे प्रचार के कारण बहुत-से लोगों के लिए वास्तविकता को स्पष्ट रूप से देखना कठिन था। कभी वे एक दिन सच्चाई समझ जाते, लेकिन अगले ही दिन फिर भ्रमित हो जाते।
इस प्रक्रिया में कुछ लोगों ने मेरी शिकायत करने की धमकी दी, कुछ ने मेरा उपहास किया और अपमानित किया, कुछ मेरी असफलता की प्रतीक्षा करते रहे, जबकि कुछ मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे। इन बाधाओं को कम करने के लिए मैं प्रतिदिन सुबह दो घंटे तथा दोपहर और शाम को एक-एक घंटे सद्विचार भेजती थी। मैं मास्टरजी से शक्ति और मार्गदर्शन की प्रार्थना करती थी। मुझे दृढ़ विश्वास था कि मास्टरजी की सुरक्षा में कोई भी मुझे वह करने से नहीं रोक सकता जिसे मैं सही मानती हूँ।लगातार दो वर्षों तक धैर्यपूर्वक लोगों को सच्चाई समझाने के बाद मेरे अनेक सहकर्मी और मित्र अंततः फालुन दाफा को समझने लगे।सत्य जानकर वे प्रसन्न और कृतज्ञ हुए।
उनकी सोच पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक और खुली हो गई तथा वे उन अनेक विषयों को समझने लगे जिन्हें पहले नहीं समझ पाते थे। उन्होंने सीसीपी के कार्यों की हानिकारक प्रकृति को भी पहचानना शुरू किया, और उनमें से कुछ ने स्वेच्छा से सीसीपी तथा उससे संबद्ध संगठनों से अपने संबंध समाप्त कर लिए। लेखिका के अनुसार, उनके एक सहकर्मी ने सच्चाई जानने और सीसीपी, कम्युनिस्ट यूथ लीग तथा यंग पायनियर्स से अपने संबंध समाप्त करने के बाद, अंतिम चरण के यकृत (लिवर) कैंसर से उल्लेखनीय रूप से स्वास्थ्य लाभ किया।
फालुन दाफा की साधना करते हुए और फ़ा-संशोधन में सहयोग करते हुए बीते बीस से अधिक वर्षों को पीछे मुड़कर देखने पर मुझे स्पष्ट दिखाई देता है कि मास्टरजी ने हर समय मेरी रक्षा की है और मेरा मार्गदर्शन किया है। मेरी साधना संभव हो सके, इसके लिए उन्होंने मेरे स्थान पर असंख्य कठिनाइयाँ सहन कीं तथा मेरे असीम कर्म और पापों का भार उठाया—जितना मैं कभी जान भी नहीं सकती।
लेकिन मैं इतना अवश्य जानती हूँ कि यदि मास्टरजी का करुणामय उद्धार न होता, तो न तो मुझे आज का यह जीवन मिलता और न ही भविष्य की कोई आशा होती।हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण मास्टरजी के असीम त्याग और कष्टों के कारण ही संभव हुआ है।
जब यह बात समझ में आती है, तो फिर साधना में परिश्रम क्यों न किया जाए? आज भी असंख्य जीव ऐसे हैं जो सच्चाई नहीं जानते और उद्धार की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसलिए हमें और अधिक परिश्रमी बनना चाहिए, फ़ा का अच्छी तरह अध्ययन करना चाहिए, सद्विचार दृढ़ता से भेजने चाहिए और अधिक से अधिक लोगों तक सच्चाई पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए। अंत में, मैं एक बार फिर मास्टरजी की असीम करुणा और उनके उद्धार के लिए अपनी हृदय से गहरी कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ।
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