(Minghui.org) मेरा जन्म 2000 के दशक में हुआ। मेरे माता-पिता दोनों अनुभवी फालुन दाफा अभ्यासी हैं, जिन्होंने 1999 में दमन शुरू होने से पहले ही फ़ा प्राप्त कर लिया था। जब मैं छोटा था, तब मुझे नहीं लगता था कि मेरे माता-पिता अन्य लोगों के माता-पिता से अलग हैं। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, अपनी उम्र के लोगों से परिवार के बारे में बातें कीं, गैर-अभ्यासियों की पुरानी पीढ़ी के लोगों के साथ अधिक समय बिताया और समाज की विभिन्न परिस्थितियों को समझा, तब मुझे धीरे-धीरे एहसास हुआ कि अभ्यासी माता-पिता कई मायनों में गैर-अभ्यासी माता-पिता से भिन्न होते हैं।

अंकों और रैंकिंग को हल्के में लेना

चीन में "दूसरों के बच्चे" एक आम कहावत है, जिसका उपयोग माता-पिता अपने बच्चों को दूसरों से सीखने के लिए प्रेरित करने हेतु करते हैं। अक्सर माता-पिता कहते हैं, "ज़रा उस परिवार के बच्चे को देखो, और फिर खुद को देखो!"

चीन में माता-पिता अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करने के आदी हैं और आमतौर पर परीक्षा के अंक तथा रैंकिंग जैसी बातों को बहुत महत्व देते हैं। जब मैं हाई स्कूल में था, मेरी एक सहपाठी लड़की को उसके पिता ने केवल इसलिए पीटा क्योंकि परीक्षा में उसके अंक उनकी अपेक्षा के अनुसार नहीं आए थे।

लेकिन मेरे माता-पिता अलग थे। जब वे मेरी परीक्षा का परिणाम देखते, तो सबसे पहले अंक नहीं पूछते थे। वे मुझसे यह पूछते कि जिन प्रश्नों के उत्तर मैंने गलत दिए, क्या मुझे उनकी गलती का कारण समझ में आया है? क्या वे गलतियाँ लापरवाही के कारण हुईं या विषय का सही ज्ञान न होने के कारण?

यदि गलती लापरवाही से हुई होती, तो वे कहते कि अगली बार अधिक सावधानी रखना। और यदि ज्ञान की कमी के कारण हुई होती, तो वे पूछते कि क्या शिक्षक द्वारा समझाने के बाद मुझे वास्तव में वे प्रश्न समझ में आ गए हैं।

उनकी दृष्टि में परीक्षा केवल मेरे ज्ञान का आकलन करने का एक साधन थी, न कि किसी बच्चे की श्रेष्ठता को मापने या माता-पिता की प्रतिष्ठा बढ़ाने का मानदंड। मेरे अंकों के प्रति उनका दृष्टिकोण अधिकांश चीनी माता-पिता से बिल्कुल अलग था। एक ओर वे प्रसिद्धि और लाभ को बहुत हल्के में लेते थे। दूसरी ओर, उनके अनुसार वास्तव में अच्छा बच्चा वही है जिसमें दयालुता, ईमानदारी और निःस्वार्थता जैसे गुण हों।

मेरे माता-पिता मेरी शिक्षा को इतनी शांत और संतुलित दृष्टि से इसलिए देख पाते थे क्योंकि वे स्पष्ट रूप से जानते थे कि मनुष्य का जीवन दैवीय व्यवस्था के अनुसार पूर्वनिर्धारित होता है। जीवन कोई दौड़ या मैराथन नहीं है, बल्कि एक नाटक की तरह है जिसकी पटकथा पहले से लिखी हुई है, और प्रत्येक व्यक्ति दैवीय व्यवस्था के अनुसार अपनी भूमिका निभाता है।

आज अधिकांश लोग अपने प्रयासों से धन, प्रसिद्धि और बेहतर जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन वे यह नहीं समझते कि ये सब आशीर्वाद हैं, जो उन्हें "त" (सद्गुण) के बदले प्राप्त होते हैं।

हालाँकि इसका यह अर्थ नहीं है कि हम निष्क्रिय होकर बैठ जाएँ और अच्छी चीज़ों के अपने आप मिलने की प्रतीक्षा करें। हम साधकों को अच्छा इंसान बनना चाहिए, बल्कि उससे भी बेहतर इंसान बनना चाहिए। इसलिए, एक विद्यार्थी के रूप में हमें मन लगाकर पढ़ाई करनी चाहिए, और समाज के सदस्य के रूप में हमें अपने कार्य भी पूरी मेहनत से करने चाहिए।

लेकिन हम पढ़ाई या काम इस उद्देश्य से नहीं करते कि साधारण समाज में किसी से प्रतिस्पर्धा करके कुछ हासिल करें। हम केवल अपने सामाजिक संबंधों से उत्पन्न जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करते हैं, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के। आश्चर्य की बात यह है कि जब हम बिना किसी स्वार्थ या पुरस्कार की इच्छा के कार्य करते हैं, तो अक्सर उसके परिणाम अच्छे ही प्राप्त होते हैं।

पारस्परिक सम्मान और एक-दूसरे की बात सुनना

इस वर्ष नववर्ष की पूर्वसंध्या पर, जब हम मेरी दादी के घर रात्रिभोज कर रहे थे, तब मेरे चाचा और उनकी पत्नी ने अचानक मेरे फालुन गोंग का अभ्यास करने पर असंतोष व्यक्त किया। उनका मानना था कि मैंने अपने पिता से बुरी आदतें सीख ली हैं। जब मैं मुस्कुराकर उनकी बात का उत्तर देने ही वाला था, तभी मेरी चाची तुरंत ऊँची और तेज़ आवाज़ में बोलने लगीं, ताकि मुझे बोलने का अवसर ही न मिले।

शायद इसलिए कि मैं बड़ों के सामने सामान्यतः शांत, विनम्र और आज्ञाकारी दिखाई देता हूँ, उन्हें लगा कि मैं अपने माता-पिता की हर बात बिना सोचे मान लेता हूँ और मेरी अपनी कोई सोच नहीं है। वे इस बात से भी सहमत नहीं थे कि कॉलेज से स्नातक होने के बाद मैं अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए अपने गृहनगर लौट आया। उनका मानना था कि युवाओं को समाज में लगातार आगे बढ़ना चाहिए—जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त करना या किसी बड़े शहर में नौकरी करना।

शुरुआत में मुझे लगा कि यह समान स्तर पर होने वाली बातचीत है, जिसमें दोनों पक्ष पारस्परिक सम्मान के आधार पर अपने विचार साझा कर सकते हैं। क्योंकि हमारे छोटे से परिवार में, जहाँ हम तीनों साधना करते हैं, हम हमेशा शांतिपूर्वक अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।

लेकिन इस बातचीत में मुझे अपनी कोई भी राय व्यक्त करने की अनुमति नहीं थी। मानो नियम यही हो कि "जब बड़े बात कर रहे हों, तो बच्चों को केवल सुनना चाहिए।" बच्चों को कुछ नहीं पता, वे जो भी कहें वह गलत है, और बड़ों की हर बात सही है। इस प्रकार की "अधिनायकवादी सोच" के अनुसार केवल बड़े ही निर्णय ले सकते हैं और अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं।

चीनी माता-पिता लंबे समय से सीसीपी की नियंत्रण और दमन वाली मानसिकता से गहराई से प्रभावित रहे हैं। इसलिए वे पारस्परिक सम्मान और दूसरों की बात ध्यान से सुनने जैसे मूल्यों को अच्छी तरह नहीं समझ पाते।

बहुत से माता-पिता सोचते हैं कि उनके बच्चे घर से दूर जाकर पढ़ाई या नौकरी इसलिए करते हैं क्योंकि वे महत्वाकांक्षी हैं। लेकिन युवाओं के दृष्टिकोण से यह हमेशा मुख्य कारण नहीं होता।

मैंने इंटरनेट पर अनेक युवाओं को यह कहते देखा है कि वर्तमान चीनी शैली की पारिवारिक व्यवस्था में गहरे पारिवारिक टकराव और लगातार नियंत्रण का वातावरण रहता है। इसलिए वे चाहते हैं कि स्नातक होते ही जल्द से जल्द आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनें और घर से दूर चले जाएँ।

हर व्यक्ति एक स्नेहपूर्ण और सुखी परिवार चाहता है। लेकिन जब माता-पिता अत्यधिक नियंत्रण और अधिकार जताने वाले तरीके अपनाते हैं, तो बच्चों को लगता है कि न तो उनका सम्मान किया जाता है और न ही उन्हें सच्चा स्नेह मिलता है। यदि किसी व्यक्ति को अपनी सोच रखने या अपनी बात कहने का अधिकार ही न मिले, तो वह ऐसे वातावरण में क्यों रहना चाहेगा? परिणामस्वरूप, बहुत से बच्चे घर से दूर जाने के लिए स्वयं को विवश महसूस करते हैं।

हमारे घर में, मेरे माता-पिता ने कभी भी मुझे केवल इसलिए हल्के में नहीं लिया कि मैं उनसे छोटा था या मेरे पास जीवन का कम अनुभव था। जब भी मेरी कोई राय होती, चाहे मैं उसे हकलाते हुए ही क्यों न व्यक्त करूँ, वे पूरे ध्यान और धैर्य से मेरी बात सुनते थे।

यदि हमारी राय अलग भी होती, तो वे मुझे कभी उपेक्षापूर्ण ढंग से नहीं डाँटते थे और न ही ऊँचे स्थान से आदेश देने की तरह व्यवहार करते थे। वे पहले मेरी पूरी बात सुनते, फिर शांतिपूर्वक अपना दृष्टिकोण बताते। उन्होंने कभी भी अपने विचार मुझ पर थोपने का प्रयास नहीं किया, बल्कि हमेशा मुझे स्वतंत्र रूप से सोचने के लिए प्रोत्साहित किया।

मेरी समझ में, ऐसा इसलिए था क्योंकि दाफा की साधना हमें सत्य, करुणा और सहनशीलता के सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीना सिखाती है; दूसरों का ध्यान रखना और स्वार्थ को छोड़ना सिखाती है।

एक स्वार्थी व्यक्ति दूसरों की भावनाओं की परवाह नहीं करता। इसलिए उसके शब्दों और व्यवहार में भी दूसरों के प्रति सम्मान नहीं झलकता।

इसके विपरीत, जो व्यक्ति हर परिस्थिति में दूसरों का विचार करता है, वह स्वयं को दूसरे के स्थान पर रखकर सोचता है, उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास करता है और स्वाभाविक रूप से उनका सम्मान करता है।

मेरी समझ में, सहनशीलता का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि विचारों में भिन्नता होने पर भी दूसरों को स्वीकार किया जाए। जब किसी व्यक्ति में करुणा का अभाव होता है और वह अपने विचारों से भिन्न लोगों या परिस्थितियों को सहन नहीं कर पाता, तब वह दूसरों को दबाने और उन्हें जबरन बदलने का प्रयास करता है।

कभी झूठ न बोलना और अपने वचन निभाना

चीनी कार्यस्थलों में एक कहावत प्रचलित है—"हवा में महल बनाना" । इसका अर्थ है कि नियोक्ता कर्मचारियों को लंबे समय तक काम कराने और अधिक मेहनत करवाने के लिए आकर्षक वादे करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें पूरा नहीं करते। ऐसा व्यवहार केवल कार्यस्थलों तक सीमित नहीं है; माता-पिता और बच्चों के संबंधों में भी यह देखा जाता है।

घर वह स्थान होना चाहिए जहाँ परिवार के सदस्य सबसे अधिक स्नेह, सुरक्षा और विश्वास का अनुभव करें। लेकिन यदि माता-पिता अपने बच्चों से झूठ बोलते हैं या किए हुए वादे पूरे नहीं करते, तो इससे परिवार के सदस्यों के बीच विश्वास की नींव गंभीर रूप से कमजोर हो जाती है।

सत्य, करुणा और सहनशीलता को जीवन का आधार बनाना

मेरे माता-पिता ने हमेशा सत्य, करुणा और सहनशीलता को हमारे आचरण का आधार बनाया। जब मैं बड़ा हो रहा था, वे हमेशा अपने वचन के पक्के रहे। यदि उन्हें किसी बात का पूरा विश्वास नहीं होता था, तो वे सहजता से कोई वादा नहीं करते थे। यहाँ तक कि वे छोटी-से-छोटी बात पर भी मुझसे झूठ नहीं बोलते थे।

उदाहरण के लिए, हाई स्कूल के दौरान एक बार हमारी कक्षा परीक्षा देने के लिए दूसरे शहर गई थी। शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक सभी एक ही स्थान पर ठहरे हुए थे। संयोग से उसी समय मेरा जन्मदिन भी था। मेरे शिक्षक और सहपाठियों ने मुझे आश्चर्यचकित करने के लिए एक केक खरीदा और मेरी माँ से कहा कि इस बात को मुझसे गुप्त रखें।

लेकिन सबके असामान्य व्यवहार से मुझे संदेह हो गया कि वे मेरे लिए कोई सरप्राइज़ की योजना बना रहे हैं। मैंने अपनी माँ से सीधे पूछा कि क्या ऐसा ही है। यदि कोई गैर-अभ्यासी होता, तो संभवतः वह सरप्राइज़ बनाए रखने के लिए आसानी से इनकार कर देता और इसे एक हानिरहित झूठ मानता। लेकिन मेरी माँ ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया।

हालाँकि उस क्षण सरप्राइज़ का रोमांच समाप्त हो गया, फिर भी मैं बहुत खुश था, क्योंकि उन्होंने सत्य के सिद्धांत का दृढ़ता से पालन किया और मुझसे झूठ नहीं बोला। अपनी गलतियों को खुले मन से स्वीकार करना

मेरी एक मित्र ने एक बार मुझे अपनी माँ के साथ हुई चैट दिखाई। उसकी माँ को किसी घटना की याद गलत थी। जब मेरी मित्र ने उन्हें सही करने की कोशिश की, तो उनकी माँ ने उल्टा यही ज़ोर देकर कहा कि गलती मेरी मित्र की याददाश्त में है और अपनी भूल मानने से इंकार कर दिया।

तब मेरी मित्र ने अपने पिता से उस घटना की पुष्टि की और पिता के साथ हुई बातचीत का स्क्रीनशॉट अपनी माँ को भेज दिया। इस पर उसकी माँ ने केवल इतना कहा, "तुम हर बात को इतना गंभीर क्यों बना देती हो?" मेरी मित्र को यह बहुत अनुचित लगा। उसे लगा कि जब उससे कोई गलती होती है, तो उसे डाँटा जाता है और उसकी आलोचना की जाती है। लेकिन जब उसकी माँ स्वयं गलत निकलीं, तो उन्होंने न केवल अपनी गलती स्वीकार नहीं की, बल्कि उल्टा अपनी बेटी पर ही यह आरोप लगा दिया कि वह छोटी-सी बात को अनावश्यक रूप से बढ़ा रही है।

हमारे परिवार में यदि किसी को किसी दूसरे में कोई कमी दिखाई देती थी, तो वह उसे ईमानदारी से बता देता था, और फिर हम सभी उसे सुधारने का पूरा प्रयास करते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि मेरे माता-पिता मुझे केवल अपना बच्चा नहीं मानते थे, बल्कि अपना साथी अभ्यासी भी मानते थे—एक ऐसा व्यक्ति जो साधना के मार्ग पर उनके समान है।

हालाँकि शुरू-शुरू में ऐसा भी होता था कि जब मैं किसी की गलती बताता, तो सामने वाला मेरी बात नहीं मानता था। लेकिन बाद में मुझे समझ आया कि इसका कारण अक्सर यह नहीं होता था कि वे सुधार नहीं चाहते थे, बल्कि यह था कि जिस तरीके से मैं उनकी ओर ध्यान दिलाता था, उसे स्वीकार करना उनके लिए कठिन होता था।

करुणा के साथ कमियों की ओर ध्यान दिलाना 

उदाहरण के लिए, जब मैंने देखा कि मेरी माँ किसी के साथ शिनशिंग (सद्गुण) की परीक्षा से गुजर रही थीं और मुझे लगा कि उन्होंने उस परिस्थिति को ठीक ढंग से नहीं संभाला, तो मैं भावनाओं में आकर तुरंत उनकी ओर ध्यान दिला देता था। ऐसी स्थिति में मेरी माँ पहले यह स्वीकार नहीं करती थीं कि उनकी भावनाएँ तर्क पर हावी हो गई थीं। वे कहती थीं कि उन्हें नहीं लगता कि उनमें ऐसी कोई समस्या है।

लेकिन अक्सर, जब वे शांत हो जातीं, तो उन्हें एहसास होता कि मेरी बात सही थी। तब वे ईमानदारी से मुझे धन्यवाद देतीं कि मैंने उनकी कमी देखने में उनकी सहायता की। बाद में मुझे भी यह समझ में आया कि जिस तरीके से मैं उनकी कमियाँ बताता था, उसमें करुणा का अभाव था। इसलिए मेरी बात स्वीकार करना उनके लिए कठिन हो जाता था।

समय के साथ मैंने अपना तरीका बदल लिया। अब जब भी मुझे कोई समस्या दिखाई देती, तो मैं उसे मन में रखता, माँ के शांत होने की प्रतीक्षा करता, और फिर बिना किसी व्यक्तिगत धारणा या भावनात्मक प्रतिक्रिया के वह बात कहता। तब वे उसे सहजता से स्वीकार कर लेती थीं।

यह सब इसलिए संभव था क्योंकि दाफा हमें सिखाता है कि जब भी कोई समस्या सामने आए, तो सबसे पहले अपने अंतर्मन में देखना चाहिए। जब कोई हमारी कमी बताता है, तो हमारी पहली प्रतिक्रिया यह नहीं होनी चाहिए कि, "तुम स्वयं कौन-से बहुत अच्छे हो, जो मुझे सीख दे रहे हो?" इसके बजाय हमें दाफा के सिद्धांतों को मापदंड बनाकर यह देखना चाहिए कि क्या वास्तव में हमने कोई गलती की है।

हमारे परिवार में यदि हममें से किसी में कोई कमी होती, तो हम उसे सुधारने का पूरा प्रयास करते थे। अपनी गलती स्वीकार करना कोई शर्म की बात नहीं है। केवल अपनी गलतियों का सीधे सामना करके ही उन्हें सुधारा जा सकता है। तभी परिस्थितियाँ वास्तव में बेहतर बनती हैं।

यदि हम अपनी गलतियों को स्वीकार करने के बजाय उनका लगातार इनकार करें और दोष दूसरों पर डालते रहें, तो हमारे भीतर केवल शिकायत और कटुता ही बढ़ेगी। ऐसा व्यक्ति वास्तव में साधना नहीं कर रहा होता। अंतर्मन में देखने की इस आदत ने हमारे परिवार को शांत और सामंजस्यपूर्ण बनाए रखा। हमारे बीच बहुत कम मतभेद होते थे, और यदि कभी कोई विवाद हो भी जाता, तो वह जल्दी समाप्त हो जाता। कोई भी उसे मन में नहीं रखता था।

ऐसा इसलिए था क्योंकि किसी भी टकराव की स्थिति में हम दूसरे को दोष देने या उसकी शिकायत करने के बजाय पहले अपनी कमियों पर विचार करते थे। जब हर व्यक्ति अपने अंतर्मन में देखता है, तो झगड़े की गुंजाइश ही नहीं रहती।

मेरा मानना है कि यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार आत्मनिरीक्षण करना सीख जाए, तो हमारा समाज भी कहीं अधिक सौहार्दपूर्ण और दयालु बन सकता है।

वचन और आचरण—दोनों से शिक्षा देना

एक बार मैं परिवार के संस्कारों के महत्व पर अपनी एक मित्र से बात कर रहा था। उसने मुझे एक रेस्तराँ की घटना सुनाई। उस रेस्तराँ में एक पेय मशीन लगी थी, जहाँ ग्राहक एक बार पेय खरीदने के बाद उसी रेस्तराँ के दिए गए गिलास का उपयोग करके जितनी बार चाहें उतनी बार पेय भर सकते थे।

मेरी मित्र ने देखा कि एक माँ अपने लगभग छह या सात वर्ष के बेटे से कह रही थी कि वह घर से लाया हुआ गिलास मशीन में लगाकर पेय भर ले। लड़के ने संकोच करते हुए कहा कि उन्हें तो रेस्तराँ द्वारा दिया गया गिलास ही इस्तेमाल करना चाहिए। उसकी माँ ने झुँझलाकर कहा, "जो कहा है वही करो! तुम्हें इतनी चिंता करने की क्या ज़रूरत है?"

इसके बाद उस लड़के ने घर से लाए हुए गिलास में पेय भर लिया। यह कहानी सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। एक बच्चे का स्वभाव जन्म से ही निष्कपट और भला होता है। लेकिन यदि माता-पिता उसे छोटी-छोटी बातों में अनुचित लाभ उठाना और नियमों की अनदेखी करना सिखाएँ, तो उसका प्रभाव उसके चरित्र पर पड़ता है। छोटे बच्चे अत्यंत प्रभावशील होते हैं। उन्हें बड़ों से सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

वयस्कों को केवल नैतिक सिद्धांतों की बातें ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने व्यवहार से भी उनका उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। बच्चे अपने माता-पिता को देखकर सीखते हैं और मानते हैं कि बड़े जो करते हैं, वही उचित है। सौभाग्य से, मेरे माता-पिता फालुन दाफा का अभ्यास करते हैं। इसलिए वे अपने दैनिक जीवन में सत्य, करुणा और सहनशीलता के सिद्धांतों के अनुसार आचरण करते हैं। उन्होंने इन्हीं मूल सिद्धांतों के आधार पर मेरा पालन-पोषण किया, और इसी कारण मैं एक दयालु तथा दूसरों का ध्यान रखने वाला व्यक्ति बन सका।

ज़ुआन फालुन ने मुझे एक सुखी परिवार दिया

जब मैंने अपने एक मित्र को साधना का मार्गदर्शन करने वाली पुस्तक ज़ुआन फालुन के बारे में बताया, तो मैंने यह भी साझा किया कि दाफा का अभ्यास करने से हमारे माता-पिता और मेरे बीच के संबंधों पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। यह सुनकर उसने कुछ ईर्ष्या और प्रशंसा के भाव से कहा, "काश! जब मैं छोटा था, तब मेरे माता-पिता ने भी यह पुस्तक पढ़ी होती।" मुझे एक कहावत याद आती है—परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है, और परिवार में सामंजस्य होने से ही समाज में स्थिरता आती है।

फालुन दाफा ने मुझे एक शांतिपूर्ण, सामंजस्यपूर्ण और सुखी परिवार दिया है। यदि लाखों परिवार इसी प्रकार सौहार्दपूर्ण बन जाएँ, तो मेरा विश्वास है कि हमारा समाज भी कहीं अधिक बेहतर बन जाएगा। मैं पूरे मन से आशा करता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति ज़ुआन फालुन पढ़े।

यह केवल ऐसी पुस्तक नहीं है जो साधकों को उनके वास्तविक मूल की ओर लौटने का मार्ग दिखाती है, बल्कि यह लोगों को नैतिक जीवन जीना भी सिखाती है।

यह पुस्तक बताती है कि एक स्नेहपूर्ण और सुखी परिवार कैसे बनाया जाए, पढ़ाई और कार्य को किस दृष्टिकोण से देखा जाए, एक अच्छा इंसान कैसे बना जाए, और समाज का उपयोगी सदस्य कैसे बना जाए।

सबसे बढ़कर, यह पुस्तक जीवन के वास्तविक अर्थ तथा जीवन में मिलने वाले सभी कष्टों और सुखों के मूल कारण को समझने का मार्ग भी दिखाती है।