(Minghui.org) मैं वर्तमान में नौवीं कक्षा में पढ़ने वाला एक युवा फालुन दाफा अभ्यासी हूँ। यद्यपि मेरी माँ ने मेरे जन्म से ही मुझे फालुन दाफा का अभ्यास करने के लिए मार्गदर्शन दिया, लेकिन मैंने पाँचवीं कक्षा में ही स्वतंत्र रूप से साधना करना शुरू किया। छठी कक्षा में मुझे एहसास हुआ कि मैं वास्तव में एक साधक बनना चाहता हूँ और मैंने गेम खेलने की अपनी लत छोड़ दी। पढ़ाई के लिए अमेरिका आने के बाद मेरी साधना में बहुत तेजी से सुधार हुआ।

वीडियो गेम की लत से छुटकारा पाना

स्कूल शुरू करने के बाद मैंने फा पढ़ना बंद कर दिया। पहली कक्षा में मैंने अपने एक चचेरे भाई को वीडियो गेम खेलते देखा। मुझे वह मज़ेदार लगा, इसलिए मैंने उस टैबलेट कंप्यूटर में गेम डाउनलोड करना शुरू कर दिया, जिसका उपयोग मुझे पढ़ाई के लिए करना था।

शुरुआत में मेरी माँ ने इसका विरोध नहीं किया। लेकिन जब उन्हें एहसास हुआ कि मेरी लत कितनी गंभीर हो गई है, तो उन्होंने मुझे इसे छोड़ने के लिए समझाने की कोशिश की। मुझे याद है कि एक बार उन्होंने मेरा टैबलेट लेकर उसे एक दराज में बंद कर दिया। जब गेम खेलने की इच्छा बहुत प्रबल हुई, तो मैं चाबी खोजने के लिए पूरा घर अस्त-व्यस्त कर देता था और चाबी न मिलने पर चीज़ें इधर-उधर फेंक देता था।

महामारी के दौरान हमें घर से ऑनलाइन कक्षाएँ लेनी पड़ीं। इसके लिए प्रतिदिन कम से कम चार घंटे टैबलेट का उपयोग करना पड़ता था। टैबलेट आसानी से उपलब्ध होने के कारण मेरी गेम खेलने की लत और बढ़ गई। पहले मैं केवल कक्षाओं के बाद गेम खेलता था। बाद में मैंने कक्षा चलने के दौरान भी गेम खेलना शुरू कर दिया और कुछ अन्य शरारती विद्यार्थी भी मेरे साथ ऐसा करते थे।

जब मेरी माँ को इसका पता चला, तो वह बहुत नाराज़ हुईं। एक बार उन्होंने गुस्से में, मेरी जानकारी के बिना, टैबलेट को तोड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। जब मुझे पता चला कि टैबलेट गायब है, तो मैं बहुत क्रोधित हुआ। लेकिन मैंने कितना भी गुस्सा निकाला, मेरी माँ ने मुझे टूटा हुआ टैबलेट दिखाने से इनकार कर दिया।

टैबलेट न होने के कारण धीरे-धीरे मेरी गेम खेलने की लत कम होने लगी। यद्यपि मुझे स्वयं से फा पढ़ने की प्रेरणा नहीं थी, फिर भी जब मेरी माँ मुझे फा पढ़कर सुनाती थीं, तो मैं ध्यान से सुनता था। जल्द ही गेम खेलने की मेरी इच्छा समाप्त हो गई।

लेकिन बाद में जब मेरी माँ ने कहा कि वह टैबलेट ठीक करवाने वाली हैं, तो गेम खेलने की इच्छा फिर से जाग उठी। चौथी कक्षा में मेरी माँ ने टैबलेट मुझे वापस कर दिया और मैंने फिर से गेम खेलना शुरू कर दिया।

शुरुआत में मैंने अपनी माँ से कहा, “मैं गेम खेलने का समय दिन में 40 मिनट तक सीमित रखूँगा।” लेकिन इस वादे पर कायम रहना आसान नहीं था। पहले तो 40 मिनट पर रुकना आसान लगा, लेकिन जल्द ही मैं अपने गेम खेलने के समय में 10 या 20 मिनट और, फिर पूरा एक घंटा जोड़ने लगा।

जब मेरी माँ को एहसास हुआ कि मेरी लत फिर से लौट आई है, तो उन्होंने मेरा टैबलेट ले लिया और उसे मेरे पिता के पास सुरक्षित रखने के लिए दे दिया, क्योंकि मैं अपने सख्त स्वभाव वाले पिता के गुस्से से अधिक डरता था।

यह एक चक्र बन गया। मुझे टैबलेट वापस मिलता, मुझे उसकी लत लग जाती, वह मुझसे ले लिया जाता और फिर मैं लत छोड़ने की कोशिश करता। क्योंकि वास्तव में मैं इस लत को समाप्त करना नहीं चाहता था, इसलिए मैं इसे कभी पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया।

जब मैं छठी कक्षा में था, मेरी माँ को एक फा अध्ययन समूह मिला और उन्होंने उसमें सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू किया। पहली बार जब मेरी माँ ने मुझे वहाँ जाने के लिए कहा, तो मैंने मना कर दिया, लेकिन अंततः वह मुझे खींचकर वहाँ ले गईं। इसके बाद मैंने स्वेच्छा से अध्ययन सत्रों में जाना शुरू कर दिया।

मास्टरजी की यह शिक्षा पढ़ने के बाद—

“एक साधक के लिए साधना की पूरी प्रक्रिया मानवीय आसक्तियों को लगातार त्यागने की प्रक्रिया है।”—( व्याख्यान एक, ज़ुआन फालुन)

मुझे एहसास हुआ कि गेम खेलना भी एक आसक्ति है! धूम्रपान की तरह गेम खेलना भी एक अवांछनीय लत है। मैंने टैबलेट अपने पिता को वापस कर दिया और गेम खेलने की आदत से पूरी तरह नाता तोड़ लिया।

मेरी माँ ने बताया कि मैंने यह लत पूरी तरह अपने प्रयास से छोड़ी। उन्होंने चाहे जो भी किया होता, वह कभी मेरा मन बदलने में सफल नहीं हो पातीं।

अपने चिड़चिड़े स्वभाव से छुटकारा पाना

गेम खेलने की लत के कारण मेरा स्वभाव बहुत चिड़चिड़ा हो गया था और छोटी-सी बात पर भी मैं भड़क उठता था। मेरी माँ ने तर्क देकर मेरी गेम खेलने की लत छुड़ाने की कोशिश की। लेकिन न केवल मैंने उनकी बातों को अनदेखा किया, बल्कि उनके बार-बार समझाने से मुझे उनसे नाराज़गी भी होने लगी।

जब भी वह गेम खेलने के नुकसान बतातीं, मैं जवाब देता, “जब मैंने शुरुआत की थी तब आपने कुछ क्यों नहीं कहा? अब जब मुझे इसकी लत लग गई है, तभी आप रोकने की कोशिश कर रही हैं। अब बहुत देर हो चुकी है!” मेरी माँ बहुत दुखी हुईं और उन्होंने मेरी गेम खेलने की आदत छुड़ाने के सभी प्रयास छोड़ दिए। पीछे मुड़कर देखने पर मुझे अपने भयानक व्यवहार पर पछतावा होता है।

यद्यपि अंततः मैंने गेम खेलने की लत पर विजय पा ली, लेकिन अपने स्वभाव में सुधार करने में मुझे कठिनाई होती रही। कुछ विषय सामने आते ही मैं गुस्से से भड़क उठता था, भले ही मुझे पता था कि यह गलत है और मुझे गुस्सा नहीं करना चाहिए। बाद में मैं स्वयं को सुधारता, लेकिन उन्हीं विषयों का दोबारा ज़िक्र होते ही मेरा गुस्सा फिर भड़क उठता।

हर फा अध्ययन सत्र के बाद मैं परेशान होता और सोचता कि मुझे इतना गुस्सा नहीं करना चाहिए था। मैं सोचता, “मैं खुद को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकता? यह निश्चित रूप से चीन में व्याप्त चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की संस्कृति के कारण है। विदेश में रहने पर मुझे निश्चित रूप से ये समस्याएँ नहीं होंगी।”

मैं केवल इन संघर्षों से बचना चाहता था और यह नहीं समझ पाया कि वे मेरे चरित्र में सुधार करने के अवसर थे।

एक दिन विदेश में रह रहे एक रिश्तेदार ने मुझसे पूछा कि क्या मैं अमेरिका के किसी अच्छे स्कूल में पढ़ना चाहता हूँ। यह चीन छोड़ने का मेरा अवसर था। मैं बहुत खुश हुआ!

मैं अमेरिका पहुँचा और उस स्कूल में पढ़ाई शुरू कर दी। यद्यपि मुझे वहाँ का आरामदायक वातावरण पसंद आया, फिर भी समस्याएँ आने पर मेरा गुस्सा भड़क उठता था। मैं असमंजस में था, “विदेश में रहने के बावजूद मैं अपने गुस्से को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकता?”

अपने अभिभावक के साथ एक फा अध्ययन सत्र के दौरान मुझे अचानक एहसास हुआ, “यदि कोई व्यक्ति स्वयं बदलना नहीं चाहता, तो बेहतर वातावरण में रहने पर भी वह नहीं बदलेगा। केवल वही व्यक्ति सफल होगा जो वास्तव में सुधार करना चाहता है।”

उस क्षण से, जब मुझे एहसास हुआ कि समस्या मेरे भीतर है, मैंने स्वयं को बदलना शुरू किया।

छह महीने के प्रयास के बाद मैंने सफलतापूर्वक अपने चिड़चिड़े स्वभाव से छुटकारा पा लिया। मेरे सहपाठियों सहित कुछ लोगों ने मुझसे कहा, “जब तुम पहली बार चीन से यहाँ आए थे, उसकी तुलना में अब तुम बहुत बेहतर इंसान हो।”

दाफा और मास्टरजी की कृपापूर्ण मुक्ति के बिना मैं कभी अपनी गेम की लत नहीं छोड़ पाता, अपने स्वभाव में सुधार करना तो दूर की बात है। यह वास्तव में वैसा ही है जैसा मास्टरजी ने कहा है:

“...साधना अपने प्रयास पर निर्भर करती है, जबकि गोंग का रूपांतरण मास्टर द्वारा किया जाता है।”— (व्याख्यान दो, ज़ुआन फालुन)

सहपाठियों को दमन के बारे में बताना और उन्हें युवा पायनियर्स से त्यागपत्र देने के लिए प्रोत्साहित करना

COVID-19 महामारी के दौरान एक साथी अभ्यासी ने मुझे एक ऐसा टैबलेट दिया जिसमें सच्चाई स्पष्ट करने वाली बहुत-सी सामग्री थी। उन्हें पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि बहुत-से लोग सीसीपी द्वारा फालुन दाफा के दमन के बारे में नहीं जानते। मेरे हृदय में अधिक से अधिक लोगों को इसके बारे में बताने की इच्छा पैदा हुई।

क्योंकि मैं बहुत छोटा था, इसलिए फालुन दाफा अभ्यासी के रूप में अपनी पहचान बताने के संभावित परिणामों के बारे में मैंने नहीं सोचा। मैं केवल चाहता था कि मेरे सहपाठियों को सच्चाई पता चले और वे किसी आपदा का शिकार होने से बच सकें।

मैंने अपने तीन अच्छे मित्रों से शुरुआत की और उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा किए गए अत्याचारों के बारे में बताया। मैंने कहा, “कम्युनिस्ट पार्टी फालुन दाफा अभ्यासियों को प्रत्यारोपण के लिए मानव अंगों का स्थिर स्रोत बनाए रखने के लिए इस्तेमाल करती है। प्रत्यक्षदर्शियों ने डॉक्टरों को अभ्यासियों के जीवित रहते उनके अंग निकालते देखा है।”

मेरे दो मित्रों ने तुरंत कहा, “वे इतने दुष्ट कैसे हो सकते हैं?”

मैंने जवाब दिया, “उन्होंने इतने सारे बुरे काम किए हैं। फिर हमें उनके संगठन के सदस्य क्यों बने रहना चाहिए? पार्टी से त्यागपत्र क्यों न दे दें?”

मेरे दो सहपाठी तुरंत सहमत हो गए। मेरे तीसरे मित्र ने कहा, “मैं इस बारे में सोचूँगा,” लेकिन उसके बाद उसने मुझे कोई जवाब नहीं दिया।

हमारे छात्रावास में मैंने एक अन्य सहपाठी को सच्चाई बताई। उसने आश्चर्य से कहा, “कम्युनिस्ट पार्टी ऐसा कैसे कर सकती है!”

मैंने उससे पूछा, “क्या तुम्हें लगता है कि कम्युनिस्ट पार्टी को अपने कर्मों का दंड मिलेगा?”

उसने जवाब दिया, “इससे बच निकलना देवलोक के नियम के विरुद्ध होगा!”

मैंने आगे पूछा, “क्या तुम अभी भी सीसीपी के युवा पायनियर्स के सदस्य बने रहना चाहते हो?”

जब उसने कहा कि वह नहीं रहना चाहता, तो मैंने उससे कहा, “तो मैं विदेश में स्थित त्यागपत्र केंद्र के माध्यम से तुम्हें पार्टी से त्यागपत्र देने में मदद करूँ, ठीक है?”

वह सहमत हो गया। फिर उसने पूछा, “लेकिन मेरे भाई का क्या?”

मैंने कहा, “यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारा भाई तैयार है या नहीं। यदि सच्चाई सुनने के बाद वह हाँ कहता है, तो मैं उसे भी त्यागपत्र देने में मदद करूँगा। उसकी सहमति के बिना ऐसा करना मान्य नहीं होगा।”

मेरा सहपाठी सहमत हो गया। फिर उसने पूछा, “अगर स्कूल मुझे सदस्यता की शपथ लेने के लिए मजबूर करे तो क्या होगा?”

उसके अचानक पूछे गए प्रश्न से मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे सलाह दी कि शपथ लेते समय वह मन ही मन “फालुन दाफा अच्छा है, सत्य-करुणा-सहनशीलता अच्छी है” दोहराए। वह सहपाठी मेरा बहुत आभारी था।

मेरे जिन भी सहपाठियों ने सीसीपी और उसके संबद्ध संगठनों से त्यागपत्र दिया, उनमें से कोई भी COVID-19 महामारी के दौरान संक्रमित नहीं हुआ।

साधना में मेरी वृद्धि और प्रगति मास्टरजी के सूक्ष्म प्रयासों और देखभाल से अलग नहीं है। करुणापूर्ण मुक्ति के लिए धन्यवाद, मास्टरजी!