(Minghui.org) 62 वर्षीय सुश्री हुआंग शु-नू का बचपन गरीबी और पारिवारिक कलह के बीच बीता। उन्होंने सोचा कि विवाह के माध्यम से अपने दुखद भाग्य को बदल सकेंगी, लेकिन इसके बजाय उन्हें ऐसी सास मिलीं, जिनके कारण पारिवारिक तनाव और बढ़ गया। उनकी बेटी को द्विध्रुवी विकार का निदान हुआ, जिससे वे लगभग निराशा के कगार पर पहुंच गईं। वे अक्सर सोचती थीं, “कुछ लोगों का जीवन इतना अच्छा क्यों होता है, जबकि मुझे इतना कष्ट क्यों सहना पड़ता है?”

उत्तर खोजने के लिए उन्होंने भाग्य के सिद्धांत और फोर पिलर्स ऑफ डेस्टिनी—प्राचीन चीनी पद्धति, जिसमें व्यक्ति के स्वभाव और भविष्य का विश्लेषण किया जाता है—का अध्ययन किया। लेकिन उन्हें पता चला कि ज्योतिष केवल किसी व्यक्ति के भाग्य की दिशा बता सकता है, उसे बदल नहीं सकता। वर्ष 2000 में उनकी मुलाकात ज़ुआन फालुन पुस्तक से हुई, जिसने उन्हें उत्तर खोजने की एक नई यात्रा पर ला दिया। धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि भले ही वे अपने जीवन की व्यवस्था को बदल नहीं सकतीं, लेकिन विपरीत परिस्थितियों का सामना करते समय अपनी मानसिकता बदल सकती हैं।

दुखों में जन्म

शु-नू का जन्म ताइवान के एक गरीब ग्रामीण परिवार में पांच बच्चों में सबसे छोटी के रूप में हुआ था। उनके पिता शराब पीते और जुआ खेलते थे और अंततः परिवार की सारी खेती की जमीन गंवा बैठे। बचपन में तेज बुखार के कारण उनकी मां की सुनने की क्षमता प्रभावित हो गई थी और बाद में एक कार दुर्घटना में उनका एक हाथ भी चला गया। उन्हें नौकरी नहीं मिल सकी और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उन्हें घर-घर जाकर छोटी-मोटी वस्तुएं बेचनी पड़ती थीं। बाद में उनके पिता के विवाहेतर संबंधों के कारण उनकी मां द्विध्रुवी विकार से पीड़ित हो गईं और अक्सर आत्महत्या करने की कोशिश करती थीं।

शु-नू याद करती हैं, “मेरे बचपन की सबसे स्पष्ट स्मृति यह है कि मेरे पिता नशे में घर आते, चिल्लाते और हंगामा करते थे। हम सभी बच्चे इतने डर जाते थे कि रजाइयों के नीचे छिपकर रोते थे।”

उनके बड़े भाई-बहनों ने कम उम्र में ही पढ़ाई छोड़ दी और परिवार का सहारा बनने के लिए काम करने घर से बाहर चले गए। वयस्क होने पर शु-नू दिन में अपनी पढ़ाई और जीवन-यापन का खर्च निकालने के लिए काम करती थीं और शाम को रात्रि विद्यालय में पढ़ती थीं। उन्हें उम्मीद थी कि मेहनत के बल पर वे गरीबी से बाहर निकल सकेंगी।

24 वर्ष की आयु में शु-नू ने अपने एक सहकर्मी से विवाह किया। उनके पति परिवार को प्राथमिकता देते थे, इसलिए उन्हें अपना करियर छोड़कर पूर्णकालिक गृहिणी बनना पड़ा। इस कारण उन्हें अपनी दबंग सास के निरंतर दबाव का सामना करना पड़ता था।

शु-नू ने याद करते हुए कहा, “मुझे दिन में तीनों समय का खाना बनाना पड़ता था। अगर खाना ठीक से नहीं बनता, तो मेरी सास तुरंत नाराज हो जाती थीं। मुझे याद है, एक बार जब वे मुझे खाना बनाते हुए देख रही थीं, तो उन्होंने अचानक मेरे हाथ से चम्मच छीन लिया और मुझ पर चिल्लाने लगीं कि मैं गलत तरीके से खाना बना रही हूं।”

ऐसे समय में शु-नू से और सहन नहीं होता था और वे अपने कमरे में भाग जाती थीं। वे दरवाजा बंद कर लेतीं और सास के दरवाजा खटखटाने तथा चिल्लाने की अनदेखी करतीं। जब उनकी सास दरवाजे के बाहर रोने-बिलखने लगतीं, तो शु-नू के पास अपनी नाराजगी दबाकर बाहर आने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहता। वे अपनी सास के सामने घुटनों के बल बैठकर उनसे माफी मांगतीं।

उन्हें अक्सर लगता था कि जैसे उनके हिस्से में जीवन के सबसे खराब पत्ते आए हैं और वे समझ नहीं पाती थीं कि दूसरों का जीवन इतना आसान क्यों है।

भाग्य बताने से ज़ुआन फालुन की खोज तक

जब शु-नू ने देखा कि उनकी पुरानी सहपाठियां सरकारी सेवा की परीक्षाएं पास कर रही थीं या अपने करियर में आगे बढ़ रही थीं, जबकि वे रसोई और अपनी सास के साथ तनावपूर्ण संबंधों में फंसी हुई थीं, तो भाग्य की अवधारणा को लेकर उनकी जिज्ञासा और बढ़ गई। उन्होंने भाग्य के सिद्धांत और फोर पिलर्स ऑफ डेस्टिनी (बा ज़ी) का अध्ययन शुरू किया।

शु-नू ने कहा, “बा ज़ी का अध्ययन करने से पहले मैं जानती थी कि लोग ऐसे भाग्य के साथ जन्म लेते हैं, जो देवलोक द्वारा निर्धारित होता है। लेकिन भाग्य बताने से केवल व्यक्ति के पूर्वनिर्धारित मार्ग का पता चल सकता है। भाग्य बदलने के तरीके केवल सतही रूप से परिस्थितियों में सुधार करते हैं, मूलभूत परिवर्तन नहीं करते—वे वास्तव में कुछ भी नहीं बदल सकते। मैं बहुत निराश थी क्योंकि मैं वास्तव में अपना जीवन बदलना चाहती थी।”

वर्ष 2000 में उनके ससुराल वालों की एक खाली दुकान किराये पर नहीं जा रही थी, इसलिए उनके पति ने सुझाव दिया कि वे वहां किताबों की दुकान खोल लें। किराया न देना पड़ेगा और अपना व्यवसाय चलाने का अवसर मिलेगा—यह विचार शु-नू को पसंद आया और उन्होंने किताबों की दुकान चलाने की योजना बनानी शुरू कर दी।

दुकान खुलने के बाद फालुन दाफा (जिसे फालुन गोंग भी कहा जाता है) का अभ्यास करने वाले उनके एक दूर के रिश्तेदार ने सुझाव दिया कि वे ज़ुआन फालुन पुस्तक भी रखें। शु-नू को विभिन्न प्रकार की पुस्तकें बेचना पसंद था, इसलिए उन्होंने सहमति दे दी। इसके बाद कई फालुन दाफा अभ्यासी पुस्तकें खरीदने आने लगे और उत्साहपूर्वक उन्हें इस अभ्यास के बारे में बताने लगे।

जब दुकान में ग्राहक कम होते, तो शु-नू जिज्ञासावश ज़ुआन फालुन उठाकर पढ़ने लगतीं। उन्होंने कहा, “शुरुआत में मुझे लगा कि यह लोगों को अच्छा इंसान बनना सिखाने वाली पुस्तक है। बाद में मुझे समझ आया कि फालुन गोंग एक गहन साधना अभ्यास है। ज़ुआन फालुन में ‘त' (एक श्वेत पदार्थ) के बारे में विस्तार से बताया गया है और समझाया गया है कि जिन लोगों के पास प्रचुर मात्रा में त (एक श्वेत पदार्थ) होता है, वे अक्सर ऊंचे पद प्राप्त करते हैं या बहुत अधिक धन अर्जित करते हैं। मुझे अंततः समझ आया कि केवल साधना के माध्यम से—अपने चरित्र को ऊंचा उठाकर—मैं वास्तव में अपना भाग्य बदल सकती हूं।

पहली बार शु-नू को उस प्रश्न का उत्तर मिला, जो वे इतने वर्षों से पूछ रही थीं: अपना भाग्य बदलने के लिए सबसे पहले स्वयं को बदलना आवश्यक है।

स्वयं को सक्रिय रूप से ऊंचा उठाने से शिकायत की भावना का समाप्त होना

फालुन दाफा की अभ्यासी बनने के बाद शु-नू लगातार अपने शब्दों और व्यवहार पर विचार करने लगीं और स्वयं को सत्य, करुणा और सहनशीलता के सिद्धांतों के अनुसार परखने लगीं। पहले उनकी सास का एक शब्द या छोटा-सा व्यवहार भी उन्हें परेशान कर देता था, लेकिन अब वे इसे इस रूप में देखने लगीं कि शायद पिछले जन्मों में उन्होंने अपनी सास के साथ कुछ ऐसा किया था, जिसका प्रतिफल अब उन्हें मिल रहा था।

उन्होंने पुरानी शिकायतें छोड़ दीं और अपनी सास की प्रेमपूर्वक देखभाल करने लगीं। उनकी विचारशील देखभाल से दोनों के बीच वर्षों से चली आ रही दूरी धीरे-धीरे कम होने लगी।

कई वर्ष पहले उनकी सास की हड्डियों में उभरे कांटों के लिए ऑपरेशन हुआ था और उसके बाद उन्हें चलने में कठिनाई होने लगी। उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा थी कि वे फिर से जवान हो जाएं। यह बात शु-नू के दिल को छू गई। उन्होंने अपनी सास को फालुन गोंग का अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित किया और उन्हें पार्क में अभ्यास स्थल पर ले गईं। इसके बाद वे रोज सुबह अपनी सास के साथ पार्क जातीं और दोनों साथ में अभ्यास करतीं, जब तक कि उनकी सास 88 वर्ष की आयु में शांतिपूर्वक इस संसार से विदा नहीं हो गईं।

शु-नू ने बताया कि दाफा का अभ्यास शुरू करने के बाद उनकी सास के पैरों का दर्द काफी कम हो गया था और जीवन के अंतिम वर्षों में वे प्रसन्नचित्त तथा दयालु हो गई थीं।

बेटी की बीमारी का सामना करुणा से करना

शु-नू की तीन बेटियां थीं और तीनों समझदार तथा अच्छी तरह व्यवहार करने वाली थीं। विशेष रूप से उनकी बड़ी बेटी एक प्रतिष्ठित विद्यालय में पढ़ने वाली प्रतिभाशाली छात्रा थी। लेकिन हाई स्कूल के अंतिम वर्ष में उसे द्विध्रुवी विकार का निदान हुआ। शुरुआत में उसे बोलते समय ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती थी और उसका मूड तेजी से बदलता रहता था। बाद में उसकी स्थिति इतनी बिगड़ गई कि वह अपना नियंत्रण खोकर स्कूल में भी गुस्से से चिल्लाने लगी।

शु-नू अपनी बेटी को डॉक्टरों के पास ले गईं। बेटी की देखभाल करते-करते उन्हें रातों की नींद खोनी पड़ती थी और धीरे-धीरे वे मानसिक रूप से पूरी तरह थकने लगीं। उन्होंने कहा, “उस समय बहुत थकान होती थी। जब भी मुझे लगता कि अब मैं और सहन नहीं कर सकती, मैं ज़ुआन फालुन खोलकर पढ़ने लगती। जैसे-जैसे मैं फा का अध्ययन करती, मेरे हृदय का दबाव धीरे-धीरे कम हो जाता।”

एक वर्ष अपनी बेटी की जापान यात्रा की इच्छा पूरी करने के लिए शु-नू उसके साथ होक्काइडो गईं। लेकिन दस दिन की यात्रा के दौरान उनकी बेटी ने कई बार अपना नियंत्रण खो दिया और अपनी हताशा शु-नू पर निकाल दी।

इतनी बड़ी परीक्षा का सामना करने के बावजूद शु-नू को यह नहीं लगा कि जीवन उनके साथ अन्याय कर रहा है और न ही उन्होंने पहले की तरह सब कुछ छोड़कर भाग जाने के बारे में सोचा। इसके बजाय, लगातार फा का अध्ययन करने और स्वयं पर विचार करने के माध्यम से उन्हें धीरे-धीरे समझ आया कि उनकी बेटी भी पीड़ित थी और उसने जानबूझकर उन्हें चोट पहुंचाने की कोशिश नहीं की थी।

उन्होंने अपनी शिकायतें छोड़ना सीखा और अपनी बेटी के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास किया। उन्होंने उसके साथ दयालुता और समझदारी से व्यवहार किया। उन्होंने साथ बिताए समय को संजोया और बेटी की सारी हताशा को शांतिपूर्वक सहन किया।

शु-नू ने कहा, “उन कष्टदायक दिनों से गुजरने की शक्ति मुझे दाफा ने दी।”

जैसे-जैसे शु-नू का मन धीरे-धीरे शांत होता गया, उनकी बेटी के साथ उनका संबंध भी बदलने लगा। उनकी बेटी की स्थिति में काफी स्थिरता आने लगी। उनका जीवन फिर से शांत हो गया और परिवार के रिश्ते अधिक सौहार्दपूर्ण हो गए।

शु-नू और उनकी सबसे छोटी बेटी, जो स्वयं भी फालुन गोंग की अभ्यासी हैं, खुशी से मुस्कुराते हुए

जीवन का वास्तविक अर्थ जानना

शु-नू पहले सोचती थीं कि अपना भाग्य बदलने का अर्थ जीवन की विपरीत परिस्थितियों से छुटकारा पाने का कोई रास्ता ढूंढना है। अब उन्हें समझ आया है कि वे यह तय नहीं कर सकतीं कि जीवन उनके सामने कौन-सी परिस्थितियां लाएगा, लेकिन वे यह चुन सकती हैं कि उनका सामना किस प्रकार करना है।

जीवन की तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, शु-नू अब दुखों में फंसी हुई नहीं हैं, बल्कि उन्होंने अपने जीवन को फिर से संवार लिया है। उन्होंने स्वयं सैक्सोफोन बजाना सीखा और तियान गुओ मार्चिंग बैंड की निदेशक बन गईं। उन्होंने विभिन्न सामुदायिक कार्यक्रमों में भाग लिया और भाषण देकर अपने अनुभव साझा किए कि फालुन दाफा ने उनके जीवन को किस प्रकार बदल दिया है।

शु-नू (बाएं), हाथ में सैक्सोफोन लिए तियान गुओ मार्चिंग बैंड के दो अन्य सदस्यों के साथ

अपने जीवन पर पीछे मुड़कर देखते हुए—बचपन की गरीबी और पारिवारिक असामंजस्य से लेकर सास के साथ संघर्ष और बेटी की बीमारी तक—शु-नू ने बार-बार स्वयं से पूछा, “मेरे साथ ही ऐसा क्यों?”

अब वे इसके लिए आभारी हैं। उन्होंने कहा, “मैं मास्टरजी की बहुत आभारी हूं कि उन्होंने मुझे इतनी अद्भुत साधना प्रदान की, जिसने मुझे जीवन के अर्थ और उद्देश्य को समझाया। इसने वास्तव में मेरे हृदय को बदल दिया और मेरा भाग्य बदल दिया।”