(Minghui.org) मैं 85 वर्ष की हूँ और मैंने 1997 में फालुन दाफा का अभ्यास शुरू किया था। लगभग तीन दशकों से साधना करने के दौरान, मैं कभी-कभी अपनी साधना में लड़खड़ाई भी हूँ।
विशेषकर हाल के वर्षों में, मुझे कई ऐसे संघर्षों का सामना करना पड़ा, जिन्होंने मेरे शिनशिंग की मूल रूप से परीक्षा ली। अंततः मैंने यह समझना शुरू किया कि अंतर्मन में कैसे देखना है और वास्तव में स्वयं की जाँच कैसे करनी है। ऐसा लगता है जैसे मैंने अब जाकर वास्तव में साधना करना शुरू किया है।
फा-अध्ययन को गंभीरता से लेना
जब मैंने पहली बार साधना शुरू की, तो मुझे घर के बहुत से काम करने पड़ते थे और अपने पोते की देखभाल में भी मदद करनी पड़ती थी। मुझे फा-अध्ययन के मूलभूत महत्व का एहसास नहीं था और मैं सोचती थी कि दाफा की किसी परियोजना में शामिल होना ही पर्याप्त है।
जब मैं फा का अध्ययन करती थी, तो मेरा ध्यान केंद्रित नहीं रहता था और मेरा मन अक्सर भटक जाता था या मैं दूसरी चीजों के बारे में सोचने लगती थी। इसलिए मेरी प्रगति बहुत धीमी थी। वर्षों तक मैं केवल अच्छा बनने की कोशिश करने के स्तर पर ही अटकी रही, बजाय इसके कि मैं फा में समाहित होती और अपनी सोच तथा मानसिकता को ऊँचा उठाने के लिए उसे अपना मार्गदर्शक बनाती।
जब मैंने मिंगहुई वीकली में अन्य अभ्यसियों के लेख पढ़े, तो मैंने देखा कि दूसरे अभ्यासी किस प्रकार दृढ़ता और निरंतरता से साधना करते हुए स्वयं को ऊँचा उठा रहे थे और तीन कार्य अच्छी तरह कर रहे थे।
मैं उनके साथ कदम मिलाने के लिए उत्सुक थी, लेकिन मुझे लगता था कि मैं इस अंतर को पाट नहीं सकती। मास्टरजी ने देखा कि मैं वास्तव में सुधार करना चाहती हूँ, इसलिए उन्होंने मेरे साथ अध्ययन करने के लिए आइलींग नाम की एक अभ्यासी की व्यवस्था की। शुरुआत में आइलींग सप्ताह में एक बार आती थीं, फिर हमने सप्ताह में दो बार मिलने का निर्णय लिया।
आइलींग की मदद से मेरा फा-अध्ययन अधिक नियमित हो गया और मुझे पता चला कि मेरी साधना क्यों रुकी हुई थी। आइलींग फा का अध्ययन करते समय पूरी तरह ध्यान केंद्रित रखती थीं और जो अंश पढ़ती थीं, उन्हें समझती थीं। यदि कभी उनका ध्यान भटक जाता, तो वे अध्ययन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए पूरा अनुच्छेद दोबारा पढ़ती थीं।
जब मैंने स्वयं पर विचार किया, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं फा पढ़ते समय केवल औपचारिकता निभा रही थी। मैं वास्तव में यह नहीं समझती थी कि मैं क्या पढ़ रही हूँ। अपनी मानसिकता को बदलने और फा-अध्ययन को गंभीरता से लेने के बाद मेरी साधना में सुधार होने लगा।
मेरी आसक्तियाँ उजागर हुईं
जैसे-जैसे फा के सिद्धांतों की मेरी समझ बेहतर हुई, मैंने सड़क पर मिलने वाले लोगों को दमन के बारे में सच्चाई स्पष्ट करना शुरू किया। मैं बिलियन नाम की एक अभ्यासी के साथ काम करती थी, जो मिलनसार और लोगों के साथ आसानी से घुल-मिल जाती थीं। हम दोनों एक-दूसरे के साथ अच्छी तरह काम करती थीं।
कुछ समय बाद, चुनली नाम की एक अन्य अभ्यासी ने हमारे साथ शामिल होने के लिए कहा। मैं अनिच्छुक थी क्योंकि मुझे लगता था कि समूह जितना बड़ा होगा, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों का ध्यान आकर्षित होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। लेकिन चुनली ने कई बार आग्रह किया, तो मुझे उन्हें मना करने में बुरा लगा और अंततः मैं सहमत हो गई।
मुझे उम्मीद नहीं थी कि इसके तुरंत बाद संघर्ष शुरू हो जाएंगे। हमारे साथ शामिल होने के बाद, जब हम पर्चे बाँटती और लोगों को सच्चाई स्पष्ट करतीं, तो चुनली अक्सर बिलियन के साथ-साथ चलती थीं और मैं पीछे अकेली रह जाती थी। शुरुआत में मैंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन एक-दो बार तो वे पूरी तरह गायब हो गईं। मैं उम्रदराज हूँ और मोतियाबिंद के कारण मेरी दृष्टि भी अच्छी नहीं है। कभी-कभी पलक झपकते ही वे गायब हो जातीं और कहीं दिखाई नहीं देती थीं।
तभी मेरी सभी मानवीय धारणाएँ और आसक्तियाँ सतह पर आने लगीं। मुझे दुख हुआ और मुझे लगा कि चुनली ने बिलियन और मेरे बीच लंबे समय से चले आ रहे अच्छे सहयोग को बिगाड़ दिया है। जैसा कि चीनी लोग अक्सर कहते हैं, “तीन औरतें मिलकर तमाशा खड़ा कर देती हैं।” मेरा असंतोष, ईर्ष्या और संघर्ष करने की प्रवृत्ति सब उभर आई।
मैं कड़वाहट से भर गई और चुनली को स्वार्थी समझकर उनसे नाराज़ रहने लगी। मुझे नहीं पता था कि परिस्थिति को दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से कैसे देखूँ और मैं एक गैर-अभ्यासी की मानसिकता में फँसी हुई थी। मैंने अंतर्मन में देखकर स्वयं की जाँच करने के बारे में सोचा ही नहीं, यह तो दूर की बात है कि इसे अपने अंदर सुधार करने का एक शानदार अवसर मानती।
जब मैं इन सब बातों से परेशान और नाराज़ थी, तब आइलींग हमेशा की तरह मेरे घर आईं और मेरे साथ फा का अध्ययन किया। एक दिन जब हम साथ पढ़ रही थीं, तो अचानक मेरे मन में आया:
“यह कोई संयोग नहीं है कि चुनली हमारे साथ जुड़ी हैं। यह मास्टरजी की व्यवस्था है, ताकि मेरी जिद्दी नाराज़गी और ईर्ष्या उजागर हो सके। मास्टरजी इन आसक्तियों को समाप्त करने में मेरी मदद कर रहे हैं।”
साधना का अर्थ लगातार अपनी मानवीय धारणाओं और आसक्तियों को त्यागना है। मास्टरजी ने देखा कि मेरी आसक्तियाँ बहुत गहरी जड़ें जमा चुकी थीं, इसलिए उन्होंने तीन लोगों की यह परिस्थिति मेरे लिए व्यवस्थित की ताकि मैं सुधार कर सकूँ। मुझे चुनली के प्रति आभारी होना चाहिए—मैं उनसे नाराज़ कैसे हो सकती हूँ?
जब मैंने ध्यान से स्वयं की जाँच की, तो मुझे पता चला कि मुझे आलोचना पसंद नहीं थी, मैं प्रतिष्ठा से आसक्त थी और दूसरों पर निर्भर रहना पसंद करती थी। सबसे छिपी हुई आसक्ति अपनापन महसूस करने और अन्य अभ्यसियों के बीच आराम तथा सहारा पाने की इच्छा थी। इन सभी को त्यागना आवश्यक था। जब मैं इसे समझ गई, तो मेरा मन अचानक हल्का और उज्ज्वल हो गया।
स्वार्थ की आसक्ति को त्यागना
इसके तुरंत बाद मुझे एक और परीक्षा का सामना करना पड़ा। एक दिन मेरी पड़ोसन ने मुझे बताया कि किसान बाजार में सब्जियाँ बिक्री पर थीं और उसने मुझे जल्दी वहाँ जाने के लिए कहा, इससे पहले कि बिक्री समाप्त हो जाए। पहले मैं तुरंत बाजार चली जाती।
लेकिन उस क्षण मेरे भीतर एक झटका-सा लगा और मुझे इस संबंध में मास्टरजी का फा याद आया। मुझे एहसास हुआ कि एक साधक को इस मानवीय संसार में लाभ और हानि को हल्के में लेना चाहिए। सांसारिक जीवन में हम जिन अतिरिक्त लाभों के पीछे भागते हैं, वे बहुत संभव है कि हमारे बहुमूल्य द (नैतिकता)के बदले में प्राप्त होते हों।
हमें अपने हृदय की साधना करनी है और अपनी नैतिकता को ऊँचा उठाना है—फिर हम ऐसे छोटे-मोटे लाभों से कैसे आसक्त हो सकते हैं? यह समझते ही मैंने स्वार्थ की अपनी आसक्ति तुरंत छोड़ दी और अपनी पड़ोसन से कहा, “मैं ठीक हूँ, धन्यवाद।”
इन दो घटनाओं के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि हमारी साधना में आने वाले सभी संघर्ष और परीक्षाएँ वास्तव में अच्छी होती हैं—मास्टरजी ने हमारी उन्नति में मदद करने के लिए इनकी सावधानीपूर्वक व्यवस्था की है। किसी अभ्यासी के प्रति नाराज़गी रखने से लेकर उसके प्रति आभार महसूस करने तक, अपनी मानसिकता को बदलने की यह प्रक्रिया ही शिनशिंग को ऊँचा उठाने की प्रक्रिया है।
अब मुझे इस बात की और गहरी समझ हो गई है कि मास्टरजी ने फा- सुधार को लंबे समय तक जारी रखने के लिए कितने बड़े कष्ट सहे हैं, ताकि हम अधिक जीवों को बचाने में सहायता कर सकें। हर सेकंड सोने के बराबर मूल्यवान है। केवल फा का अच्छी तरह अध्ययन करके, संघर्षों और परीक्षाओं के दौरान मिलने वाले हर अवसर को सँजोकर और अपनी कमियों को खोजने के लिए वास्तव में अंतर्मन में देखकर ही हम अपनी विभिन्न मानवीय धारणाओं और आसक्तियों के आवरण को देख सकते हैं और उन्हें दूर कर सकते हैं।
तभी हम अनगिनत जन्मों के बाद मिले इस अनमोल अवसर के योग्य सिद्ध हो सकते हैं और साधना के इस मार्ग पर दृढ़ता तथा मजबूती से आगे बढ़ सकते हैं।
मास्टरजी को मेरी हृदय से गहरी कृतज्ञता।
हेशी।
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