(Minghui.org) एक अन्य अभ्यासी जिया (उपनाम) और मेरे बीच बहुत से मतभेद थे। अब, 20 वर्ष बीत जाने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि ये मतभेद मेरे साधना स्तर को सुधारने के अच्छे अवसर थे। लेकिन उस समय मेरे अंदर मानवीय धारणाएँ बहुत प्रबल थीं और मुझे स्वयं की साधना करना तथा फा के दृष्टिकोण से समस्याओं को देखना नहीं आता था, इसलिए मैं बार-बार इन अवसरों को दूर कर देती थी।
जब मुझे जबरन श्रम शिविर में हिरासत में रखा गया था, तब एक अन्य अभ्यासी ने मुझसे पूछा, “साधना क्या है?” मैंने उसे मास्टरजी का लेख “साधना क्या है?” दोहराकर सुनाया। उसने कुछ नहीं कहा। कविता दोहराने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैंने केवल फा सुनाया था, लेकिन मैंने उसे यह नहीं बताया था कि उसे क्या करना चाहिए या अपने अनुभवों का उपयोग करके उसे यह समझने में कैसे मदद करनी चाहिए कि साधना का वास्तव में क्या अर्थ है। अब मैं समझती हूँ कि उस समय मुझे वास्तव में यह पता ही नहीं था कि साधना का अर्थ क्या है।
जबरन श्रम शिविर से रिहा होने के बाद मैं बेघर हो गई। गुजारा चलाने के लिए मैंने कुछ मजदूरी का काम किया। जबरन श्रम शिविर में मिली अभ्यासी फेंग (उपनाम) ने सुझाव दिया कि मैं सत्य- स्पष्टीकरण सामग्री तैयार करने में उसकी मदद करूँ। वह बहुत लगन से साधना करती थी और अधिकांश काम वही करती थी। वह मेरे लिए एक अच्छा उदाहरण थी और मैं हमेशा उसके निर्देशों का पालन करती थी। सामग्री बनाने के स्थान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हम बहुत सतर्क रहते और खुद को छिपाकर रखते थे। हमारा संपर्क केवल कुछ अभ्यासीओं से था।
अपने स्थान को गुप्त रखने के लिए हम सामग्री वितरित करने या बाहर जाकर लोगों को सच्चाई बताने नहीं जाते थे। हम फा का अध्ययन करते, अभ्यास करते और फिर सामग्री तैयार करते। यही हमारा दैनिक जीवन था। फेंग सामग्री बनाने के स्थान की अच्छी तरह देखभाल करती थी और यह सुनिश्चित करने के लिए हर काम करती थी कि अन्य अभ्यासीओं द्वारा वितरित किए जाने के लिए सभी सामग्री तैयार रहे। ऐसा लगता था कि लंबे समय तक सामग्री बनाने के स्थान को चलाना हमारी जिम्मेदारी थी। यही हमारा साधना मार्ग था। लेकिन एक दिन बाहर जाने पर फेंग को गिरफ्तार कर लिया गया।
एक अन्य अभ्यासी ने मुझे साधना के अवसर दिए
मैंने उस स्थान के सभी काम अपने हाथ में ले लिए और समन्वयक बन गई। बाद में जिया भी मेरे साथ आ गई। मैंने सोचा कि मुझे भी उसका उसी तरह मार्गदर्शन करना चाहिए जैसे फेंग ने मेरा किया था। मैंने सामग्री बनाना एक काम समझ लिया और भूल गई कि यह साधना थी।
जिया का काम करने का तरीका और उसकी मानसिकता बिल्कुल अलग थी। मुझे लगा कि उसकी साधना की अवस्था अलग थी। जब वह आई, तो वह निराश थी और वहाँ सीमित रहने से परेशान थी। वह सामग्री बनाने का स्थान छोड़ना चाहती थी। लेकिन जब वह अपना सामान लेकर आई, तो मैंने सोचा कि उसने अपनी समस्याओं पर काबू पा लिया है और यहाँ रहने का फैसला किया है। लेकिन उसने अपने तरीके से काम करने पर जोर दिया।
उदाहरण के लिए, जब वह बाहर जाती थी, तो अपने पास सामग्री होने के बावजूद लोगों से फालुन दाफा के बारे में बात करती थी। मुझे हमारे स्थान की सुरक्षा की चिंता होती थी। वह इस बात पर जोर देती थी कि सामग्री बनाने का स्थान चाहे कहीं भी हो, हमें उसी क्षेत्र में सामग्री वितरित करनी चाहिए और लोगों से बात करनी चाहिए।
वह सामग्री बनाने में भी मेरे तरीके का पालन नहीं करती थी। इससे मैं परेशान होती थी। उसका मानना था कि हमें दूसरे अभ्यासीओं के लिए सारा काम स्वयं नहीं करना चाहिए, बल्कि कुछ काम उन्हें भी देना चाहिए। उदाहरण के लिए, उसने कहा कि सामग्री को बाइंड करने का काम दूसरे अभ्यासीओं से करवाना चाहिए। बाद में उसने कहा कि हमें सामग्री काटना बंद कर देना चाहिए और दूसरे अभ्यासीओं से पेपर कटर खरीदकर सामग्री कटवानी तथा बाइंड करवानी चाहिए। हम केवल सामग्री प्रिंट करेंगे, जिससे हमारे पास फा का अध्ययन करने के लिए अधिक समय होगा।
मैं खुश नहीं थी क्योंकि हमारे पास पहले से ही फा का अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय था। दूसरे अभ्यासी अपने काम में व्यस्त थे और मुझे लगता था कि उन्हें सामग्री बाँटने पर ध्यान देना चाहिए, जबकि हम सामग्री तैयार करते रहें। अगर वह सामग्री नहीं बनाना चाहती थी, तो यहाँ क्यों आई थी? मैं उसकी सोच या उसके काम करने के तरीके से सहमत नहीं थी। उसकी आदतें भी मुझे पसंद नहीं थीं। मुझे लगता था कि वह फेंग की तुलना में कहीं भी उतनी अच्छी नहीं थी।
फा-सुधार आगे बढ़ने के साथ, अभ्यासीओं को अपने-अपने सामग्री बनाने के स्थान स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। मैंने स्थानीय अभ्यासीओं के साथ इस बारे में चर्चा की। वे सहमत हुए, लेकिन प्रक्रिया सुचारु नहीं रही। कुछ अभ्यासीओं ने कहा कि वे धन की व्यवस्था करने की कोशिश कर रहे हैं। अगली बार जब मैं उनसे मिली, तो उन्होंने कहा कि उन्होंने अभी उपकरण नहीं खरीदे हैं। तीसरी बार उन्होंने कहा कि अन्य कारणों से इसमें देरी हुई। मैंने उनकी बात स्वीकार कर ली।
जिया अधीर हो गई और उसने कहा कि वे फा को स्पष्ट रूप से नहीं समझते तथा उनकी मानवीय धारणाएँ उन्हें काम जल्दी करने से रोक रही हैं। उसने यह भी कहा कि वे पर्याप्त सतर्क नहीं हैं और पुरानी शक्तियाँ उनकी कमियों का फायदा उठाकर उन्हें अपने सामग्री बनाने के स्थान स्थापित करने से रोकेंगी। वह उन अभ्यासीओं को सामग्री देना बंद करना चाहती थी, ताकि उन पर जल्दी से अपना-अपना सामग्री बनाने का स्थान स्थापित करने का दबाव पड़े।
लेकिन मैं उससे सहमत नहीं थी। मुझे लगा कि इसमें कोई समस्या नहीं है और हमें तब तक उनका समर्थन करते रहना चाहिए जब तक वे अपने स्वयं के सामग्री बनाने के स्थान स्थापित नहीं कर लेते।
विभिन्न बातों को लेकर हमारी राय हमेशा अलग होती थी। मुझे असहज महसूस होता था और मैं दूसरे अभ्यासीओं से उसके बारे में शिकायत करती थी। उन्होंने मुझे याद दिलाया कि मुझे समस्याओं के भीतर ही समस्याओं के बारे में चर्चा नहीं करनी चाहिए। लेकिन मैं सोचती थी कि अगर मैं समस्याओं के बारे में बात ही नहीं करूँगी, तो उन्हें हल कैसे करूँगी? मैं अपनी मानवीय धारणाओं में ही फँसी हुई थी।
पहले मेरा दूसरे अभ्यासीओं के साथ बहुत अच्छा संबंध था, विशेषकर जब हम जबरन श्रम शिविर में थे। हालाँकि हम एक-दूसरे से पहले कभी नहीं मिले थे, लेकिन मिलते ही ऐसा लगता था जैसे हम परिवार के सदस्य हों। हम एक-दूसरे की मदद करते थे और हमारे बीच कभी ऐसे मतभेद नहीं हुए थे। इसलिए यह स्थिति मेरे लिए बहुत कठिन थी।
एक रात मैंने सपना देखा कि मास्टरजी ने कहा, “ओह, तुम सामग्री बना रही हो। आओ, मैं तुम्हें भुगतान करता हूँ।” मैं हैरान होने के साथ-साथ खुश भी हुई। मैंने सोचा कि मैंने कभी किसी अभ्यासी के बारे में नहीं सुना था कि उसे सामग्री बनाने के लिए पैसे दिए गए हों। मैंने देखा कि मास्टरजी ने जिया को दस युआन दिए और मुझे छह युआन दिए।
मैं निराश हो गई और सोचने लगी कि मैं सामग्री पैसे के लिए नहीं बनाती थी, लेकिन अगर मास्टरजी हमें पैसे दे रहे थे, तो मुझे उससे कम क्यों मिले? इससे मेरा मन अशांत हो गया।
जागने के बाद मैंने सोचा कि क्या मास्टरजी ने मुझे संकेत दिया था कि जिया ने मुझसे बेहतर काम किया था, क्योंकि मास्टरजी ने उसे अधिक पैसे दिए थे। क्या इसका अर्थ यह था कि उसकी साधना मुझसे बेहतर थी? क्या फा की उसकी समझ सही थी और मेरी गलत? मुझे लगता था कि मैं हमेशा दूसरे अभ्यासीओं को प्राथमिकता देती हूँ। मास्टरजी ने मुझे यह संकेत किसी कारण से ही दिया होगा। मैंने खुद से कहा कि मुझे विश्वास करना चाहिए कि जिया की बात सही है।
आखिरकार मुझे समझ आया कि साधना का क्या अर्थ है
कुछ दिनों बाद एक परीक्षा आई। फा का अध्ययन करने के बाद हम एक ऐसी बात पर चर्चा कर रहे थे जिसका मुझसे कोई संबंध नहीं था। जिया ने उस विषय पर एक वाक्य कहा। उसने मुझे निशाना नहीं बनाया था और उसका कथन मुझसे संबंधित भी नहीं था। लेकिन मैंने उस पर बहुत तीखी और गुस्से वाली प्रतिक्रिया दी। मैं उससे बहस करने ही वाली थी। मुझे अपना सपना याद आया और मैंने अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने तथा उसे दोष न देने का प्रयास किया। मैंने खुद को शांत किया और फा का अध्ययन जारी रखा। जिया को पता ही नहीं चला कि मैं परेशान थी।
अचानक मुझे उस अभ्यासी की याद आई जिसने जबरन श्रम शिविर में रहते हुए मुझसे पूछा था कि साधना क्या है। मैंने सोचा: “यही तो साधना है!”
क्योंकि अभ्यासीओं ने अपने-अपने सामग्री बनाने के स्थान स्थापित कर लिए थे, इसलिए हम कम सामग्री बनाते थे और हमारे पास अन्य कार्य करने के लिए अधिक समय था। हमने स्वयं सामग्री वितरित करने का निर्णय लिया। मैं सामग्री वितरित करने को एक काम समझती थी और मुझे एहसास नहीं था कि यह एक पवित्र कार्य था, क्योंकि हम मास्टरजी को लोगों को बचाने में सहायता कर रहे थे। मैंने फा में स्वयं की साधना नहीं की और अपनी मानवीय समझ तथा मानवीय धारणाओं को पहचान नहीं पाई। इसी कारण जिया और मेरे बीच बहुत से मतभेद हुए।
एक रात हम पर्चे बाँटने के लिए बाहर गए। चलते समय जिया बार-बार कहती रही, “हमें इस घर के लोगों को बचाना है,” या “हमें उस घर के लोगों को बचाना है।” वह इन बातों को लगातार दोहराती रही। कुछ समय बाद मैं बहुत परेशान हो गई और मन ही मन कहा, “बकवास। ऐसा कौन-सा घर है जिसके लोगों को हमें नहीं बचाना चाहिए?”
जब हम एक गली में पहुँचे, तो एक छोटा कुत्ता हम पर भौंकने लगा। मुझे डर था कि घर के अंदर का व्यक्ति बाहर आ जाएगा। इसलिए मैं उस घर को छोड़कर अगले घर की ओर बढ़ गई।
मैंने जिया से कहा, “कृपया उस घर पर पर्चा मत रखना।” उसने मेरी बात नहीं सुनी और सीधे उसी घर की ओर चली गई। वह अब भी बुदबुदा रही थी, “हमें उस घर के लोगों को बचाना है।” मैं चिंतित हो गई और उसे रोकने की कोशिश की। उसने मेरी बात नहीं मानी। जब मैं वास्तव में अधीर हो गई, तब उसने गेट के बाहर एक पर्चा रख दिया। अचानक छोटा कुत्ता भौंकना बंद कर दिया।
मैं स्तब्ध रह गई। मैंने फालुन दाफा की शक्ति और सद्विचारों की शक्ति को महसूस किया। मुझे एहसास हुआ कि लोगों को बचाने की जिया की करुणामय भावना ने वातावरण को बदल दिया था। मेरे पास सद्विचार नहीं थे और मैं मानवीय भावनाओं के साथ काम कर रही थी। मैंने मास्टरजी को सचेतन जीवों को बचाने में सहायता करने के कई अवसर गँवा दिए थे। इसके बाद मैंने जिया के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल लिया।
एक अन्य अवसर पर हम किसी विषय पर बात कर रहे थे। मैं हमेशा उन लोगों की ओर से बोलती थी जिनके साथ अन्याय हुआ हो या जो कमजोर हों। मुझे लगता था कि मैं बहुत न्यायप्रिय हूँ और मेरे अंदर न्याय की भावना है। जब मैं जोर-जोर से और भावनात्मक तरीके से बोल रही थी, तो उसने मुझे ठंडी नजर से देखा और कहा, “जब दूसरे लोगों के साथ अन्याय होता है तो तुम्हें गुस्सा आता है। अगर वही अन्याय तुम्हारे साथ हो, तो तुम और भी ज्यादा क्रोधित हो जाओगी।”
मैं निरुत्तर हो गई और मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे ऊपर ठंडे पानी की बाल्टी उड़ेल दी हो। हालाँकि मुझे इस बात से असहज महसूस हुआ कि उसने मुझे रोक दिया, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि उसकी बात उचित थी। हाँ, अगर मेरे साथ अन्याय होता, तो क्या मैं उसे जाने दे पाती? क्या मेरा मन शांत रह पाता? मैं इन बातों में इतनी डूब जाती थी कि लगभग खुद को नियंत्रित नहीं कर पाती थी।
कुछ समय तक जिया के साथ रहने के बाद मैंने अपने विचारों और कार्यों पर संदेह करना शुरू किया। उसकी कई समझ और कार्यों ने मुझे झकझोर दिया। मैं उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी और उन्हें अस्वीकार करने की कोशिश करती थी। मैंने अपनी हठधर्मिता को नियंत्रित करने का प्रयास किया। धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि उसकी समझ सही थी और फा के अनुरूप थी।
वह अक्सर कहती थी, “अलग-अलग स्तरों पर करुणा के अलग-अलग अर्थ होते हैं।” हाँ, वह सही थी। पहले मैं हर काम अपने हाथ में ले लेती थी और सोचती थी कि इससे दूसरे अभ्यासीओं के लिए काम आसान हो रहा है। मुझे एहसास नहीं था कि मैं वास्तव में उनसे स्वयं साधना करने के अवसर छीन रही थी।
मैं मानवीय धारणाओं और काम करने की मानसिकता में फँसी हुई थी। मैं जिया के प्रति दयालु नहीं थी और मैंने फा के दृष्टिकोण से अपने आसक्तियों, प्रतिस्पर्धा की भावना और दिखावा करने की मानसिकता को नहीं देखा। मैं अहंकारी थी और मुझे विनम्र होना नहीं आता था। मैं अपनी कमियों को नहीं देख पाई और साधना के दृष्टिकोण से पुरानी शक्तियों के हस्तक्षेप को भी नहीं पहचान पाई।
मैं हमेशा चाहती थी कि अभ्यासी अच्छी तरह साधना करें, लेकिन मुझे यह एहसास नहीं था कि मैं भी फा का एक कण हूँ। अगर मैं स्वयं अच्छी तरह साधना नहीं करती, तो मैं दूसरों की मदद कैसे कर सकती थी?
बाद में हमारे सामग्री बनाने के स्थान में तोड़फोड़ की गई। जिया के साथ मेरा पूर्व-निर्धारित संबंध समाप्त हो गया और हम अलग हो गए।
मैं अपने सामान्य जीवन में लौट आई और काम में व्यस्त हो गई। मैंने अभ्यास और फा के अध्ययन में ढिलाई बरती और सांसारिक मामलों में उलझ गई। मेरे पास अपनी साधना के बारे में सोचने के लिए मुश्किल से ही समय होता था और मैं बार-बार परीक्षाओं में असफल होती रही।
हाल ही में मुझे एहसास हुआ कि मुझे और समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी, अधिक अभ्यास और फा का अध्ययन करना शुरू किया तथा साधना में आगे बढ़ने की कोशिश की। अब मेरे पास अपनी साधना की यात्रा पर विचार करने का भी समय है।
अब मैं अपनी कई कमियों और आसक्तियों को देख सकती हूँ।
पहली, मेरे अंदर भय था। मैं सामग्री वितरित करने या लोगों को फालुन दाफा और दमन के बारे में बताने की हिम्मत नहीं करती थी। ऊपर से देखने पर इसका कारण सामग्री बनाने के स्थान की सुरक्षा बनाए रखना था। लेकिन सच्चाई यह थी कि मैं डरती थी। मैंने सद्विचारों से दमन को नकारा नहीं। मैं फा के सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से नहीं समझती थी और फा-सुधार की प्रगति के साथ कदम नहीं मिला पा रही थी।
दूसरी, मैं सामग्री बनाना अपना काम और मास्टरजी को अपना बॉस समझती थी। मुझे लगता था कि मुझे मास्टरजी का अनुसरण करना चाहिए और सामग्री बनाने के स्थान पर अच्छा काम करना चाहिए। मुझे एहसास नहीं था कि यह अपने मन की साधना करने का एक अवसर था। इसी कारण मुझे वह सपना आया था।
तीसरी, मुझे यह तय करने के लिए एक अभ्यासी की तुलना दूसरे अभ्यासी से नहीं करनी चाहिए कि कौन अच्छी साधना कर रहा है और कौन नहीं। हर व्यक्ति में अपनी-अपनी खूबियाँ होती हैं।
फेंग अपने विश्वास में दृढ़ थी और बहुत लगन से साधना करती थी। जबरन श्रम शिविर से रिहा होने के बाद उसने फा की पुष्टि करने के लिए बहुत से कार्य किए। उससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली।
जिया फा के सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझती थी और फा-सुधार की प्रगति के साथ कदम मिलाकर चलती थी। वह मेरी साधना की कमियों को पहचान सकती थी।
मैं मास्टरजी को धन्यवाद देना चाहती हूँ कि उन्होंने जिया को मेरे साथ रहने की व्यवस्था की। फा की उसकी स्पष्ट समझ और दृढ़ इच्छाशक्ति ने मेरी गहराई से जमी हुई मानवीय धारणाओं और मानवीय मानसिकता को तोड़ दिया। उसने मुझे अपनी सीमित साधना अवस्था और फा की अपर्याप्त समझ का एहसास कराया।
अब मुझे लगता है कि हमारे द्वारा फा-सुधार में बाधा डालने का मूल कारण यह है कि हमने स्वयं अच्छी तरह साधना नहीं की है। मैं समझती हूँ कि केवल अंतर्मन में देखकर, अपने मन की साधना करके और अपनी कमियों को पहचानकर ही मैं वास्तव में साधना कर रही हूँ।
सामग्री बनाने के स्थान पर पैसे की बहुत तंगी रहती थी, क्योंकि अभ्यासी बहुत सादगी से रहते थे ताकि हम सामग्री तैयार करने के लिए पैसे बचा सकें। सर्दियों में बहुत ठंड होती थी। मेरे कोट में हुड था, जबकि जिया के कोट में नहीं था। मैंने जिया के लिए टोपी खरीदने पर पैसे खर्च नहीं करने का निर्णय लिया। मैं यहाँ उससे माफी माँगना चाहती हूँ।
जिया ने न केवल मेरी साधना में बहुत मदद की, बल्कि मास्टरजी ने मेरे लिए अलग-अलग अभ्यासीओं की भी व्यवस्था की, जिन्होंने मेरी मदद की, ताकि मैं परीक्षाओं को पार कर सकूँ और फा-सुधार की प्रगति के साथ कदम मिला सकूँ।
मास्टरजी, आपकी सावधानीपूर्वक की गई व्यवस्थाओं के लिए धन्यवाद। साथी अभ्यासीओं, आप सभी का धन्यवाद।
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