(Minghui.org) मेरी उम्र 54 वर्ष है। कई वर्ष पहले मेरे चचेरे भाई ने मास्टरजी के व्याख्यानों की श्रृंखला में भाग लिया। उनका अनुभव था कि यह फ़ा वास्तव में अद्भुत है। व्याख्यान समाप्त होते ही वे सीधे मेरे घर आए। मेरे पिता के मन में लंबे समय से ताओ की साधना करने की इच्छा थी। वे हर जगह किसी गुरु या ताओ की खोज में रहते थे। इसी कारण गाँव के लोग उन्हें मज़ाक में "आधा अमर" कहकर बुलाते थे। मेरे चचेरे भाई के आने के बाद मेरे पिता, माता और बड़े भाई हमारे परिवार में सबसे पहले फालुन दाफा का अभ्यास करने लगे।
1996 में मैं अपने तीन-चार वर्ष के बेटे के साथ माता-पिता से मिलने गई। शाम को जब घर के अन्य लोग अभ्यास कर रहे थे, तब मैं और मेरा बेटा बड़े कांग (ईंटों से बने गर्म बिस्तर) पर सो रहे थे। आधी नींद और आधी जाग की अवस्था में मैं अभ्यास का संगीत सुन रही थी। वह संगीत इतना मधुर था कि मानो स्वर्ग से धीरे-धीरे उतर रहा हो। उसकी दिव्यता का वर्णन शब्दों में करना कठिन है। अभ्यास समाप्त होने पर मैंने अपनी माँ से कहा, "अभ्यास का यह संगीत कितना सुंदर है, ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग से आ रहा हो।"
मेरी बात सुनकर माँ ने कहा, "तुम्हारा इस फ़ा से पूर्वनियत संबंध है।" इसके बाद उन्होंने मुझे "फालुन गोंग" पुस्तक पढ़ने के लिए दी।
दाफा ने मुझे एक खुशहाल इंसान बना दिया
उस समय मेरी शादी को केवल कुछ वर्ष ही हुए थे और मैं यह सीखना चाहती थी कि जीवन में कैसा आचरण करना चाहिए। मेरी सास बहुत दयालु और नेकदिल थीं तथा पूरे परिवार में उनका सम्मान था। इसके विपरीत, मेरे पति की बुआ बहुत हिसाबी और छोटी-छोटी बातों में उलझने वाली थीं। वे हर परिस्थिति में यह सुनिश्चित करती थीं कि उनका कभी नुकसान न हो। मैंने सोचा, "अब यह परिवार ही मेरा परिवार है, इसलिए मुझे भी उन्हीं की तरह बनना चाहिए ताकि कोई मेरा फायदा न उठा सके और न ही मुझे दबा सके।"
आज इतने वर्षों की साधना के बाद जब मैं उस सोच को याद करती हूँ तो डर लगता है। यदि मैंने दाफा का अभ्यास शुरू न किया होता, तो समाज के नैतिक पतन की धारा में मैं भी बह गई होती।
जब भी मुझे समय मिलता, मैं पुस्तक पढ़ती। पहली बार पढ़ते ही मैं उससे गहराई से प्रभावित हो गई। यद्यपि मुझे सारी बातें याद नहीं रहीं, लेकिन मास्टरजी की यह शिक्षा कि एक अच्छा इंसान बनना चाहिए, मेरे हृदय को गहराई से छू गई। इसने मेरे जीवन-दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया। मुझे एहसास हुआ कि इस संसार में ऐसी भी साधना है जो लोगों को अच्छा बनने की शिक्षा देती है। मुझे लगा कि मुझे अवश्य इसका अभ्यास करना चाहिए। उसी दिन दाफा मेरे हृदय में बस गया।
धीरे-धीरे मैंने समझा कि साधना का अर्थ अपने शिनशिंग (चरित्र और नैतिक स्तर) को ऊँचा उठाना है
उस समय मेरे पति की बहन की शादी नहीं हुई थी। घर में खाना बनाना और बर्तन धोना रोज़ विवाद का कारण बनता था। हम दोनों इस बात की तुलना करते रहते थे कि किसने अधिक काम किया और कौन कम काम कर रहा है। यह मानसिक रूप से बहुत थका देने वाला था।
दाफा का अभ्यास करने के बाद मैंने वह शिक्षा पढ़ी जिसमें कहा गया है कि कष्ट को आनंद समझो। मैंने सोचा, "यह तो केवल घर का काम है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन अधिक करता है और कौन कम?" इसके बाद मैंने बिना तुलना किए जो भी काम सामने होता, उसे करना शुरू कर दिया। मुझे यह दिखावा करने की भी आवश्यकता नहीं रही कि मैं बहुत मेहनती हूँ। परिणामस्वरूप मैं प्रतिदिन प्रसन्न रहने लगी। दाफा वास्तव में मेरे शरीर और मन—दोनों को बदल रहा था।
दाफा की चमत्कारी शक्ति
जब मेरा बेटा प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता था, तब उसकी एक आँख के कोने पर बार-बार गाँठें निकल आती थीं। वे फूट जातीं, फिर ठीक हो जातीं और कुछ समय बाद दोबारा निकल आतीं। यह सिलसिला एक वर्ष से भी अधिक समय तक चलता रहा।
गाँव के बुज़ुर्ग मुझे बार-बार डॉक्टर को दिखाने की सलाह देते थे। उनका कहना था कि यदि यह समस्या बनी रही तो उसकी आँख के पास स्थायी निशान पड़ सकता है। लेकिन मैंने इसे लेकर अधिक चिंता नहीं की। मुझे दाफा की शक्ति पर विश्वास था। मेरा मानना था कि मेरे अभ्यास का लाभ मेरे बेटे को भी मिलेगा और वह स्वाभाविक रूप से ठीक हो जाएगा।
एक दिन स्कूल से लौटते समय मेरे बेटे के साथ उसकी दो सहपाठी लड़कियाँ आईं। मैंने देखा कि उसकी आँख से खून निकल रहा था। उनमें से एक लड़की बहुत घबराई हुई थी। उसने बताया कि खेलते समय गलती से उसका पैर मेरे बेटे की आँख के पास लग गया था। वह मेरे बेटे की बेंच साथी थी और वह अक्सर शरारत करती रहती थी।
यह देखकर मुझे मास्टरजी द्वारा सिखाए गए कर्म-परिवर्तन के सिद्धांत की याद आई। मैंने सोचा कि शायद यही घटना उसकी आँख के पूरी तरह ठीक होने का कारण बनेगी। इसलिए मैं बिल्कुल शांत रही। मैंने उस लड़की को ढांढस बंधाया और कहा कि डरने की कोई बात नहीं है, मेरे बेटे की आँख बिल्कुल ठीक हो जाएगी।
वास्तव में वही घटना इस समस्या का अंत साबित हुई। उसके बाद उसकी आँख पूरी तरह ठीक हो गई। गाँठें फिर कभी नहीं निकलीं और कोई निशान भी नहीं रहा।
यह हमारे परिवार का दाफा की चमत्कारी शक्ति से पहला अनुभव था। बीस से भी अधिक वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन मेरा बेटा आज भी उस घटना को याद करता है। जब भी इस बात का ज़िक्र होता है, वह मुस्कुराते हुए कहता है कि उसी लड़की की ठोकर से उसकी आँख ठीक हो गई थी।
मैं अपने बेटे को स्वस्थ करने के लिए मास्टरजी के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ।
बेटे की पढ़ाई में उल्लेखनीय प्रगति
जब मेरा बेटा माध्यमिक विद्यालय की दूसरी कक्षा में था, तब उसके अंक केवल औसत थे। उसने मुझसे कहा, “माँ, मेरे वर्तमान अंकों के आधार पर तो अच्छे उच्च विद्यालय में प्रवेश पाना भी कठिन होगा।”
मैंने उससे कहा कि वह प्रतिदिन कुछ मिनट “फालुन दाफा अच्छा है, सत्य-करुणा-सहनशीलता अच्छी है” का दोहराना करे। मैंने उसे बताया कि इससे उसकी बुद्धि और समझ विकसित होगी।
बाद में, जब मैं काम के सिलसिले में दूसरे शहर में रहती थी और उससे फ़ोन पर बात करती थी, तो वह बताता कि उसके अंक लगातार बेहतर हो रहे हैं। उसने कहा कि वह हर रात सोने से पहले इन शुभ वचनों का दोहराना करता है। जब उच्च विद्यालय प्रवेश परीक्षा का समय आया, तो वह बिना किसी कठिनाई के उत्तीर्ण हो गया। उसका मानना था कि यह सफलता “फालुन दाफा अच्छा है” का दोहराना करने और एक अच्छा इंसान बनने का प्रयास करने का परिणाम थी।
उच्च विद्यालय के दूसरे वर्ष में उसके शैक्षणिक परिणामों में आश्चर्यजनक सुधार हुआ और शीघ्र ही उसे विद्यालय की मेधावी कक्षा में स्थान मिल गया। विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा में उसने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और हमारे क्षेत्र में कला संकाय (लिबरल आर्ट्स) में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए।
इस समाचार ने पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी। विद्यालय के इतिहास में पहले कभी ऐसा छात्र नहीं हुआ था, इसलिए विद्यालय ने उसके सम्मान में बधाई के बैनर लगाए और उसकी सफलता की कहानी स्थानीय टेलीविजन पर भी दिखाई गई।
रिश्तेदार फ़ोन करके कहते थे कि मानो परिवार को “बिना किसी अतिरिक्त खर्च के एक विश्वविद्यालय का छात्र मिल गया।” उसके दादा-दादी निरक्षर थे, उसके माता-पिता रोज़गार के कारण घर से बाहर रहते थे, और उसने कभी किसी ट्यूशन कक्षा में भी भाग नहीं लिया था। फिर भी उसने इतनी उत्कृष्ट सफलता प्राप्त की।
वह अन्य विद्यार्थियों के लिए एक आदर्श बन गया और उसकी कहानी लंबे समय तक पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी रही।
मेरा विश्वास है कि यह सब दाफा और मास्टरजी का आशीर्वाद था, जिसने यह सिद्ध किया कि जब परिवार का एक सदस्य साधना करता है, तो उसका लाभ पूरे परिवार को मिलता है।
अन्यायपूर्ण जुर्माने की राशि सम्मानपूर्वक वापस मिली
एक दिन मेरे बड़े भाई, भाभी और कुछ अन्य अभ्यासी दूसरे क्षेत्र में लोगों को सत्य से अवगत कराने वाली सामग्री वितरित करने गए थे। रास्ते में पुलिस ने उन्हें रोककर हिरासत में ले लिया। कई दिनों तक उनके बारे में कोई समाचार नहीं मिला।
मैंने एक अन्य अभ्यासी की सास से सलाह की और हमने यह पता लगाने का निश्चय किया कि कहीं उन्हें स्थानीय पुलिस थाने में तो नहीं रखा गया है।
जब मैं वहाँ प्रभारी अधिकारी से मिली, तो मैंने कहा, “बच्चे घर पर अपनी माँओं के लिए रो रहे हैं। मैं यह पूछने आई हूँ कि क्या उन्हें यहाँ हिरासत में रखा गया है?”
महिला पुलिस अधिकारी ने मेरा नाम पूछा। जैसे ही मैंने अपना नाम बताया, उसने कहा, “हम तुम्हारा नाम बहुत पहले से जानते हैं। हम तुम्हें ढूँढ़ रहे थे, लेकिन तुम मिली नहीं। अब तुम स्वयं ही हमारे पास आ गई हो।”
मैंने उत्तर दिया, “बच्चे अपनी माँओं के लिए रो रहे हैं। मैं केवल यह पूछने आई हूँ कि उन्होंने कौन-सा कानून तोड़ा है।” इतना कहते ही मुझे भी पुलिस थाने में हिरासत में ले लिया गया। उसी दोपहर मेरे पिता मुझसे मिलने आए और फिर उन्होंने मेरे पति को सूचना दी। मेरे पति मुझे छुड़ाने के लिए पुलिस थाने पहुँचे।
पुलिस ने कहा कि यदि 2,000 युआन का जुर्माना भर दिया जाए, तो मुझे रिहा कर दिया जाएगा। मैंने जुर्माना देने से इनकार कर दिया, लेकिन मेरे पति ने मेरी जानकारी के बिना वह राशि जमा कर दी। घर लौटने के बाद मेरे ससुर ने मुझे बताया कि जुर्माना भर दिया गया है।
उस समय मेरे पति की नियमित नौकरी छूट चुकी थी और वे निर्माण स्थल पर कठिन मेहनत करके परिवार चलाते थे। बड़ी मुश्किल से पैसे कमाए जाते थे।
मैंने सोचा, “मैंने कोई कानून नहीं तोड़ा है। फिर यह पैसा पुलिस को क्यों दिया जाए?”
मैंने निश्चय किया कि पुलिस विभाग के निदेशक को फ़ोन करूँगी। पहले के संपर्कों के कारण मेरे पास उनका फ़ोन नंबर था।
मास्टरजी के सशक्त समर्थन से मेरी उनसे बात हो गई। मैंने कहा, “निदेशक महोदय, मुझे बीजिंग जाकर न्याय की अपील करनी पड़ेगी। मैं इस तरह नहीं जी सकती।”
वे चौंक गए और बोले, “क्या हुआ?”
मैंने पूरी घटना बताई, “मेरे भाई और भाभी कई दिनों से घर नहीं लौटे थे। मैं केवल यह पूछने पुलिस थाने गई थी कि क्या वे वहाँ हैं। लेकिन उन्होंने मुझे भी हिरासत में ले लिया और 2,000 युआन का जुर्माना लगा दिया। इसलिए मुझे न्याय की गुहार लगाने बीजिंग जाना पड़ेगा।”
मेरी बात सुनकर निदेशक ने कहा, “चिंता मत कीजिए। मैं इस मामले का समाधान करूँगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपका पैसा वापस कर दिया जाएगा।”
दो दिन बाद हमारे कस्बे के पुलिस थाने के प्रभारी ने मुझे फ़ोन करके जुर्माने की राशि वापस लेने के लिए आने को कहा।
मेरे ससुर ने मुझे रोकने की कोशिश करते हुए कहा, “चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जो पैसा वे निगल चुके हैं, क्या कभी वापस करेंगे?”
मैंने उत्तर दिया, “कोई बात नहीं। मैंने कोई कानून नहीं तोड़ा है, इसलिए वे मेरा क्या कर सकते हैं?”
अगले दिन मैं सम्मान और आत्मविश्वास के साथ पुलिस थाने पहुँची अगले दिन मैं सिर ऊँचा करके पुलिस थाने पहुँची। मुझे देखते ही थाने के प्रभारी अधिकारी का व्यवहार बहुत विनम्र था। उन्होंने कहा, “हमने आपका पैसा वापस दिला दिया है। उन्होंने आपको किस आधार पर हिरासत में लिया था? आप हमारे ही क्षेत्र की निवासी हैं; उन्हें आपको हिरासत में रखने का कोई अधिकार नहीं था। कल पुलिस विभाग के निदेशक ने बैठक में इस मामले पर उस थाने को कड़ी फटकार लगाई।”
यह कहते हुए उन्होंने मुझे जुर्माने के 2,000 युआन वापस कर दिए। मैं मास्टरजी की संरक्षण और कृपा के लिए हृदय से कृतज्ञ हूँ।
साधना के चमत्कार
दाफा का अभ्यास करते हुए इन वर्षों में मैंने इतने चमत्कार देखे हैं कि यह समझना कठिन है कि कहाँ से लिखना शुरू करूँ। दो दशकों से अधिक की अपनी साधना-यात्रा में मैं स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली मानती हूँ कि मास्टरजी की निरंतर देखभाल और मार्गदर्शन में साधना के मार्ग पर आगे बढ़ती रही हूँ।
मैं जिन दाफा परियोजनाओं पर कार्य करती हूँ, वे सब मास्टरजी के सशक्त समर्थन और मार्गदर्शन से संभव हो पाई हैं।
मेरे पति दाफा का अभ्यास नहीं करते, इसलिए मैं अपने दाफा से जुड़े कार्य उनकी जानकारी के बिना करती हूँ। जब भी मैं किसी परियोजना पर काम करना चाहती, संयोग से उन्हें किसी सामाजिक कार्यक्रम में जाना पड़ जाता। उनके घर से निकलते ही मैं अपना कार्य शुरू कर देती। अक्सर ऐसा होता कि जैसे ही मेरा काम पूरा होता, वे वापस आ जाते।
कभी-कभी यदि थोड़ा-सा काम शेष रह जाता, तो मुझे दूसरे कमरे से उनकी आवाज़ सुनाई देती, लेकिन वे उस कमरे में नहीं आते जहाँ मैं काम कर रही होती। और जैसे ही मेरा काम पूरा होता, वे तुरंत अंदर आ जाते।
एक दिन जैसे ही मैंने काम शुरू किया, मैंने देखा कि कमरे में कुछ मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। मैंने सोचा कि पहले इन्हें भगा दूँ, क्योंकि उनका शोर ध्यान भटका रहा था।
फिर मुझे लगा कि मेरे पास समय नहीं है। मैंने मन ही मन सोचा, "इन्हें बस स्थिर कर देती हूँ।"
यह विचार आते ही मैं अपने काम में पूरी तरह लग गई और मक्खियों की बात भूल गई।
जब काम समाप्त हुआ, तो मैंने देखा कि तीन मक्खियाँ अपने सिर आपस में जुड़े हुए अजीब-सी मुद्रा में बिल्कुल स्थिर थीं। आसपास की कुछ अन्य मक्खियाँ भी ऐसी ही निश्चल पड़ी थीं, मानो मर गई हों। लेकिन ध्यान से देखने पर पता चला कि वे जीवित थीं।
तभी मुझे याद आया कि मैंने उन्हें स्थिर करने का विचार किया था, और वास्तव में वे हिल नहीं पा रही थीं।
मुझे लगा कि दाफा वास्तव में अद्भुत है। जब हमारे विचार सद्विचार होते हैं, तो हमारी अलौकिक क्षमताएँ हर समय और हर स्थान पर हमारी सहायता करती हैं।
पिछले कुछ वर्षों से मैं और मेरे पति अपने एक रिश्तेदार की कंपनी में काम कर रहे हैं। उस समय व्यापार अच्छा नहीं चल रहा था।कंपनी के छात्रावास में हम सहित कई कर्मचारी रहते थे। खर्च कम करने के लिए कंपनी ने छात्रावास की सफाई करने वाले कर्मचारी को हटा दिया और फैक्टरी की सफाई करने वाली महिला से कहा कि वह प्रतिदिन एक अतिरिक्त घंटा देकर छात्रावास के गलियारों और दो शौचालयों की सफाई भी करे।
उस महिला ने शिकायत की कि एक घंटा पर्याप्त नहीं है; काम पूरा करने में उससे अधिक समय लगता है। इसलिए उसने अतिरिक्त वेतन की माँग की।
दोपहर में कार्यालय में मेरे पास अधिक काम नहीं होता था। मैंने सोचा कि इस खाली समय का उपयोग किया जा सकता है। मैंने अपने रिश्तेदार, जो कंपनी के मालिक थे, से कहा कि मैं प्रतिदिन एक घंटे छात्रावास की सफाई कर दूँगी। मैंने सुझाव दिया कि इसके लिए अलग से किसी कर्मचारी को वेतन देने की आवश्यकता नहीं है। मैं इसे अपने व्यायाम का हिस्सा मानकर कर लूँगी। वे बहुत प्रसन्न हुए और तुरंत सहमत हो गए।
मैं पूरी लगन से सफाई करती और बहुत जल्दी काम समाप्त कर लेती। उसके बाद जो समय बचता, उसमें छात्रावास में बैठकर अपनी दाफा परियोजना पर काम करती। जब मेरे मन में यह विचार आया, तो अगले ही दिन मुझे पहले से भी अधिक समय मिलने लगा। धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई कि मैं सफाई का पूरा काम केवल दस मिनट से कुछ अधिक समय में समाप्त कर लेती थी। यह मेरे लिए वास्तव में आश्चर्यजनक था।
मैं जानती थी कि मास्टरजी मेरी सहायता कर रहे हैं और मेरी परियोजना के लिए अधिक समय उपलब्ध करा रहे हैं। बाद में मुझे एहसास हुआ कि मैं हमेशा अपने कार्य को छिपाकर नहीं कर सकती। मास्टरजी के सशक्त समर्थन से मैंने अपना भय छोड़ दिया।
अक्सर ऐसा होता कि मेरे पति सोफ़े पर बैठकर अपने मोबाइल फ़ोन में व्यस्त रहते, जबकि मैं उनके सामने कंप्यूटर पर बैठकर अपनी दाफा परियोजना पर काम करती। फिर भी उन्हें कभी पता नहीं चला कि मैं वास्तव में क्या कर रही हूँ।
मैं मास्टरजी की निरंतर देखभाल, संरक्षण और सशक्त समर्थन के लिए हृदय से अत्यंत कृतज्ञ हूँ। उन्हीं की कृपा से मैं आज तक साधना के इस मार्ग पर आगे बढ़ सकी हूँ।
मास्टरजी धैर्यपूर्वक अंतिम लक्ष्य से हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं—उस गंतव्य की ओर, जिसकी प्राप्ति के लिए हम सभी साधना कर रहे हैं।
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