(Minghui.org) मैं 11 वर्ष का एक फालुन दाफा अभ्यासी हूँ। मैंने चार वर्ष की आयु में अपनी दादी के साथ साधना शुरू की थी। जब मैं सात वर्ष का हुआ, तब मैं स्वयं ज़ुआन फालुन पढ़ने लगा। मैं जानता हूँ कि मुझमें अभी भी कई आसक्तियाँ हैं, जैसे प्रतिस्पर्धा की मानसिकता, ईर्ष्या और व्यक्तिगत हितों से लगाव। लेकिन जैसे-जैसे मैं साधना में आगे बढ़ रहा हूँ, मैं धीरे-धीरे इन आसक्तियों को छोड़ रहा हूँ।

एक बार हमारी कक्षा में पारंपरिक कहानी सुनाने की प्रतियोगिता हुई। मैं वास्तव में जीतना चाहता था, लेकिन मेरे एक सहपाठी ने कई अन्य सहपाठियों से बात करके उन्हें अपने पक्ष में मतदान करने के लिए मना लिया। अंततः वही जीत गया। मुझे बहुत अन्याय महसूस हुआ। उस समय मैं स्वयं को एक साधक के दृष्टिकोण से देखना भूल गया और मेरी प्रतिस्पर्धा की मानसिकता तथा ईर्ष्या हावी हो गई। यह अफसोस की बात है कि उस समय मुझे अपने अंतर्मन की ओर देखना नहीं आया। अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि वह वास्तव में स्वयं को सुधारने का एक अच्छा अवसर था। मैं उस समय इसे क्यों नहीं समझ पाया?

जब मुझे यह एहसास हुआ कि मुझे एक साधक की तरह व्यवहार करना चाहिए और अपनी लड़ाकू मानसिकता, स्वार्थ तथा प्रतिष्ठा की आसक्ति को छोड़ना चाहिए, तब मेरे सहपाठियों के साथ होने वाले टकराव कम होने लगे। अब जब भी कोई मतभेद होता है, मैं सबसे पहले अपनी ही कमियों और आसक्तियों को खोजने की कोशिश करता हूँ। जैसे-जैसे मैं फा का अध्ययन करता हूँ, वैसे-वैसे उसके सिद्धांतों की मेरी समझ भी गहरी होती जाती है।

एक दिन शारीरिक शिक्षा की कक्षा में हम रस्सी कूदने के लिए पंक्ति में खड़े थे। मुझे प्यास लगी, इसलिए मैं और मेरा एक मित्र पानी पीने चले गए। लौटकर हम अपनी पहले वाली जगह पर खड़े हो गए। पंक्ति के पीछे खड़े एक सहपाठी ने व्यंग्य करते हुए कहा, “तुम लोग जाकर सबसे पीछे क्यों नहीं खड़े हो जाते?” मेरे मित्र ने उत्तर दिया, “हम तो अभी कुछ देर पहले यहीं खड़े थे।” इस बात पर दोनों में बहस शुरू हो गई और बात बढ़ते-बढ़ते बड़ा विवाद बन गई। मैं भी बहुत परेशान हो गया और मेरे भीतर लड़ने की मानसिकता उभर आई।

उस दिन जब मैं रात का खाना नहीं खाना चाहता था, तो मेरी माँ ने पूछा कि क्या बात है। मैंने उन्हें स्कूल में हुई पूरी घटना बताई। माँ ने मुझे अपने साथ सद्विचार भेजने के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने ऐसा ही किया। उसके बाद हमने इस विषय पर चर्चा की। मैंने अपने भीतर लड़ने की मानसिकता, मनमुटाव और ईर्ष्या को पहचाना तथा उन्हें छोड़ने का दृढ़ निश्चय किया। इसके बाद मेरा मन हल्का हो गया और सारी नकारात्मक भावनाएँ समाप्त हो गईं। फिर मैंने खुशी-खुशी रात का भोजन किया। धन्यवाद, मास्टरजी!

कुछ महीने पहले एक दिन मैंने हमारे भवन के गलियारे में एक नया पोस्टर देखा। उस पोस्टर में मास्टरजी के प्रति अपमानजनक बातें लिखी थीं। मैंने उसे फाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया। ऐसा करते ही मुझे अचानक बहुत प्रसन्नता महसूस हुई, क्योंकि मुझे लगा कि मैंने हमारे करुणामय मास्टरजी की रक्षा की और लोगों को झूठे प्रचार से भ्रमित होने से बचाने का प्रयास किया। मास्टरजी, आपके प्रोत्साहन और सुदृढ़ीकरण के लिए धन्यवाद!

मैं स्वयं को अत्यंत भाग्यशाली मानता हूँ कि मैं एक युवा फालुन दाफा अभ्यासी हूँ और समाज में फैले पतित विचारों से सुरक्षित हूँ। मैं हमेशा स्वयं को एक साधक मानकर अपने अंतर्मन की ओर देखता हूँ, अपनी गलतियों को सुधारता हूँ और मास्टरजी द्वारा निर्धारित साधना-पथ पर दृढ़ता से आगे बढ़ता हूँ।

एक बार फिर धन्यवाद, मास्टरजी!