(Minghui.org) मैंने 1996 में फालुन दाफा का अभ्यास शुरू किया। आज मेरी आयु 79 वर्ष है, और मैंने केवल दो वर्ष की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की है। पहले मैं अनेक प्रकार की बीमारियों से पीड़ित थी, लेकिन सौभाग्य से जब मैंने दाफा साधना का मार्ग अपनाया, तो मेरा स्वास्थ्य सुधर गया और मेरी सभी बीमारियाँ समाप्त हो गईं। मेरा हृदय आनंद से भर गया, और मैं स्वस्थ, स्फूर्तिवान तथा ऊर्जा से परिपूर्ण हो गईं।
मेरे इस परिवर्तन को देखकर मेरे ग्रामीण पैतृक गाँव के 20 से अधिक रिश्तेदारों और ग्रामीणों ने भी फालुन दाफा का अभ्यास शुरू कर दिया। मेरे परिवार के सभी सदस्य मेरी साधना का समर्थन करते हैं, और बदले में उन्हें भी आशीर्वाद प्राप्त हुए हैं।
लोगों को फालुन दाफा की सच्चाई से अवगत कराना
20 जुलाई, 1999 को सीसीपी के नेता जियांग ज़ेमिन ने फालुन दाफा के विरुद्ध दमन शुरू किया, जिसके कारण मैं फ़ा-अध्ययन का अपना वातावरण खो बैठी। बाद में मैंने अपने घर पर एक छोटा फ़ा-अध्ययन समूह शुरू किया। सत्य स्पष्ट करने वाली सामग्री की आवश्यकता को पूरा करने के लिए, प्रारंभ में हम पर्चे हाथ से छापते थे। हम शाम से लेकर भोर तक काम करते थे, फिर भी एक हज़ार प्रतियाँ भी तैयार नहीं कर पाते थे। बाद में एक समर्पित सामग्री-निर्माण केंद्र स्थापित किया गया। उस समय मेरे बेटे का परिवार और मैं अलग-अलग एक-मंज़िला घरों में रहते थे, जिनके बीच दो अन्य परिवारों के घर थे। अन्य अभ्यासी मुद्रित अर्द्ध-तैयार सामग्री मेरे घर पहुँचाते थे। फिर अन्य अभ्यासी मेरे साथ मिलकर उन्हें क्रमबद्ध करते, पुस्तिकाओं के रूप में बाँधते, पैक करते तथा रिकॉर्ड की गई सीडी को उनके कवर में रखते थे। खरीदी गई सभी सामग्री और तैयार सत्य-स्पष्टीकरण सामग्री मेरे बेटे के घर में सुरक्षित रखी जाती थी। ताकि अभ्यासी आवश्यकता पड़ने पर आसानी से आ-जा सकें, मेरी बहू ने उन्हें घर की एक अतिरिक्त चाबी भी दे रखी थी।
बाद में शहरी पुनर्विकास परियोजना के कारण हमारे घरों का पुनर्वास किया गया। संयोग से, मेरे बेटे का परिवार और मैं एक ही अपार्टमेंट भवन में रहने लगे—उनका परिवार पाँचवीं मंज़िल पर और मैं दूसरी मंज़िल पर। रहने की परिस्थितियाँ बेहतर होने के बाद भी हमारा सामग्री-निर्माण केंद्र सत्य-स्पष्टीकरण सामग्री छापने और सीडी तैयार करने का कार्य करता रहा। इसके अतिरिक्त हमने सत्य-स्पष्टीकरण वाले डेस्क कैलेंडर और 'कम्युनिस्ट पार्टी पर नौ टिप्पणियाँ' की प्रतियाँ भी तैयार करनी शुरू कर दीं।
हर शाम मेरी बहू स्वेच्छा से मेरे फ्लैट में नीचे आ जाती थी और अन्य अभ्यासियों के साथ सामग्री तैयार करने में सहायता करती थी। वह मेरे घर आने वाले प्रत्येक अभ्यासी को पहचानती थी। कभी-कभी मेरा छोटा पोता भी अपनी माँ के साथ आता और कागज़ों को अलग-अलग करना तथा पन्नों को मोड़ना जैसे छोटे-छोटे कार्य करके हमारी सहायता करता था।
हमारे द्वारा तैयार की गई विभिन्न सत्य-स्पष्टीकरण सामग्रियाँ स्थानीय फ़ा-अध्ययन समूहों तक पहुँचाई जाती थीं। शाम के समय अन्य अभ्यासी उन्हें गाँवों में वितरित करने के लिए वाहन से निकलते थे। जब भी मेरे बेटे और बहू की रात की ड्यूटी होती, मैं स्वयं बाहर जाकर ये सामग्री वितरित करती थी। उन दिनों मेरा छोटा पोता घर पर अकेला रहता था। वह मुझसे कहता, "दादी, मेरे सो जाने तक रुक जाइए, फिर आप बाहर जाइए।"
मेरे घर में अक्सर अनेक अभ्यासी आते-जाते रहते थे। सीसीपी द्वारा बनाए गए कठोर और दमनकारी वातावरण के बावजूद, मेरे बेटे ने कभी भी इसका विरोध नहीं किया। इसके विपरीत, वह मेरे घर आने वाले प्रत्येक अभ्यासी का मुस्कराकर गर्मजोशी से स्वागत करता था।
मेरी बहू ने सच्चाई को समझा और अभ्यासियों की रक्षा की
जुलाई 2015 की एक सुबह, जब अधिकांश लोग अभी सो रहे थे और मैं अभ्यास कर रही थी, तभी एक दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी जबरन मेरे घर में घुस आए। घर के बाहर पुलिस की गाड़ियाँ, 610 कार्यालय के कर्मचारी, पुलिस अधिकारी, घरेलू सुरक्षा विभाग (डोमेस्टिक सिक्योरिटी) के एजेंट और स्थानीय थाने के अधिकारी तैनात थे। वे डाकुओं की तरह घर की तलाशी लेने लगे। उन्होंने पूरे घर को अस्त-व्यस्त कर दिया और हर चीज़ उलट-पुलट कर रख दी। इस हंगामे से पड़ोसी जाग गए। उन्होंने तुरंत मेरी बहू, जो पाँचवीं मंज़िल पर रहती थी, को फ़ोन करके बताया कि मेरे घर पर कुछ असामान्य हो रहा है।
मेरी बहू तुरंत नीचे आई और इमारत के प्रवेश द्वार पर खड़ी हो गई, ताकि जो भी अभ्यासी फ़ा-अध्ययन करने या सामग्री लेने आएँ, उन्हें समय रहते सावधान कर सके। जैसे ही कोई अभ्यासी वहाँ पहुँचता, वह कहती, "मेरी सास के घर कुछ हो गया है। पुलिस उनके फ्लैट के अंदर है।" उसने इस प्रकार लगभग 10 अभ्यासियों को समय रहते रोक लिया, और उन सभी ने आगे अन्य अभ्यासियों को भी सूचना दे दी। यह दमनात्मक कार्रवाई पूरी तरह प्रांतीय पुलिस विभाग द्वारा योजनाबद्ध थी, और बड़ी संख्या में अभ्यासी उसके निशाने पर थे।
लेकिन जैसे ही यह समाचार एक-दूसरे तक पहुँचा, अभ्यासियों ने एक-दूसरे को समय रहते सचेत कर दिया, जिससे इस दमन के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सका। पुलिस कई घंटों तक मेरे घर की तलाशी लेती रही। अंततः जब सभी पुलिस वाहन वहाँ से चले गए, तभी मेरी बहू वापस फ्लैट में आई और पुलिस द्वारा फैलाए गए पूरे बिखराव और अव्यवस्था को साफ़ किया।
मेरे बेटे की बीमारी बिना चिकित्सीय उपचार के ठीक हो गई
दिसंबर 2024 में मेरे बेटे की रीढ़ की हड्डी के बिल्कुल पास उसकी पीठ पर एक गाँठ (ट्यूमर) उभर आई। दर्द इतना असहनीय था कि वह न ठीक से खा पाता था और न ही सो पाता था। हम उसे प्रांतीय अस्पताल ले गए, जहाँ विशेषज्ञों ने जाँच के बाद बताया कि यह फाइब्रोमा (सौम्य रेशेदार गाँठ) है। लेकिन उन्होंने कहा कि इसका ऑपरेशन नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह ट्यूमर रीढ़ के पास की रक्त वाहिकाओं से चिपका हुआ था और उन्हें लगभग चारों ओर से घेरे हुए था। डॉक्टरों ने बताया कि यदि ऑपरेशन के दौरान उन रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुँच गई, तो वे फट सकती हैं और इतनी तेज़ी से रक्तस्राव होगा कि रक्त ऊपर छत तक जा सकता है। उन्होंने सलाह दी कि बेहतर उपचार के लिए बीजिंग या शंघाई के किसी बड़े अस्पताल में जाना चाहिए। फिलहाल केवल इंजेक्शन द्वारा उपचार ही संभव था, लेकिन उन दवाओं में स्टेरॉयड शामिल थे। मेरा बेटा अत्यधिक मानसिक दबाव में था और दिन-ब-दिन अधिक दुबला तथा कमजोर होता जा रहा था।
अपने बेटे को इतनी पीड़ा में देखकर और उसे निराश एवं चिंतित देखकर मैंने उससे कहा, "इस बात को लेकर घबराओ मत। मास्टरजी के फ़ा-उपदेशों की रिकॉर्डिंग सुनो और पूरे मन से तथा श्रद्धा के साथ 'फालुन दाफा अच्छा है, सत्य-करुणा-सहनशीलता अच्छी है' दोहराओ। यदि तुम ऐसा करोगे, तो तुम स्वस्थ हो जाओगे और मास्टरजी तुम्हारी देखभाल करेंगे।" उसने मेरी बात को गंभीरता से स्वीकार किया। वह प्रतिदिन बिना किसी चूक के मास्टरजी के फ़ा-उपदेश सुनता और मन ही मन पूरे विश्वास के साथ दोहराता, "फालुन दाफा अच्छा है, सत्य-करुणा-सहनशीलता अच्छी है।" मेरी बहू भी उसके साथ मिलकर यह वाक्य दोहराने में उसकी सहायता करती थी। धीरे-धीरे मेरे बेटे की ताकत लौटने लगी। पूरे शरीर का दर्द काफी कम हो गया और वह फिर से सामान्य रूप से भोजन करने लगा।
बाद में वह पुनः प्रांतीय अस्पताल जाँच के लिए गया। वहाँ उसके एक्स-रे किए गए और विशेषज्ञों की राय के लिए उन्हें शंघाई के एक बड़े अस्पताल भेजा गया। जाँच में पता चला कि ट्यूमर कैल्सीफाइड (कैल्शियमयुक्त) हो चुका था। अब वह खतरनाक नहीं रहा था और ऑपरेशन की कोई आवश्यकता नहीं थी। डॉक्टरों ने कहा कि केवल सूजन कम करने के लिए साधारण आई.वी. ड्रिप पर्याप्त होगी।
मेरा बेटा यह सुनकर बहुत खुश हुआ। उसने वे आई.वी. उपचार भी नहीं करवाए। उसने मुझसे कहा, "मैंने केवल मास्टरजी के फ़ा-उपदेश सुने और 'दाफा अच्छा है' दोहराया, और मैं स्वस्थ हो गया। दाफा वास्तव में असाधारण है! यदि यह मेरे अपने साथ न हुआ होता, तो शायद मैं इस पर विश्वास ही नहीं करता।" अब मेरे बेटे का वजन बढ़ गया है। वह अच्छी तरह खाता-पीता है और पूरे दिन प्रसन्नचित्त रहता है।
मेरे विचार में, यह दाफा के प्रति उसके सम्मान और सद्भाव का प्रतिफल है। उसने न कोई इंजेक्शन लिया, न कोई दवा। उसने केवल मास्टरजी के फ़ा-उपदेश सुने और "फालुन दाफा अच्छा है, सत्य-करुणा-सहनशीलता अच्छी है" का श्रद्धापूर्वक पाठ किया। लेखक के अनुसार, मास्टरजी की कृपा से वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया।
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