(Minghui.org) मैंने 1997 में फालुन दाफा का अभ्यास शुरू किया था, लेकिन जुलाई 1999 में जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने दमन शुरू किया, तो मैंने अभ्यास छोड़ दिया। मास्टरजी की करुणामयी मुक्ति के कारण ही मैं अंततः फिर से साधना के मार्ग पर लौट सका। 2008 में, साथी अभ्यासी की सहायता से मैं इंटरनेट पर लगी रोक को पार करके मिंगहुई वेबसाइट तक पहुँच सका। मास्टरजी के सभी व्याख्यानों का अध्ययन करने के बाद मुझे यह गहराई से समझ में आया कि फा-सुधार काल में दाफा शिष्य बनना कितना महान सम्मान है।
दाफा का अभ्यास करने के बाद जीवन को नया रूप मिला
बचपन से ही मेरा शरीर बहुत कमजोर था। मैं लगातार सिरदर्द, अम्लपित्त (एसिड रिफ्लक्स), पेट फूलना, साइनसाइटिस और अन्य कई पुरानी बीमारियों से पीड़ित रहता था। कॉलेज के दिनों में मुझे चीगोंग और ऐसी साधना पद्धतियों में गहरी रुचि हो गई। मैं विज्ञान पत्रिकाओं में इनके बारे में लेख पढ़ता रहता था। अपनी बीमारियों से छुटकारा पाने और स्वास्थ्य सुधारने की आशा में मैंने कई प्रकार के चीगोंग का अभ्यास किया, लेकिन मेरी स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ गई।
नौकरी शुरू करने के बाद साइनसाइटिस के कारण मेरी दो बार शल्य-चिकित्सा हुई। इसके अलावा ब्रोंकिएक्टेसिस के कारण मेरे बाएँ फेफड़े का एक निचला भाग भी निकालना पड़ा। फिर भी कोई सुधार नहीं हुआ। मेरा वजन घटकर 110 पाउंड (लगभग 50 किलोग्राम) से भी कम रह गया। मैं अपने भविष्य को लेकर पूरी तरह निराश हो चुका था। मैं अक्सर सोचता था कि यदि मुझे केवल एक दिन के लिए भी स्वस्थ रहने का अवसर मिल जाए, तो उसके बाद मृत्यु भी स्वीकार है।
1997 में मेरे रूममेट ने मुझे ज़ुआन फालुन पुस्तक पढ़ने की सलाह दी। उसे पढ़ते समय मुझे जीवन से जुड़े अनेक प्रश्नों के उत्तर मिले। मेरी निराशा दूर हो गई और मेरे भीतर एक नई आशा जागी। मुझे समझ में आया कि साधना के माध्यम से एक साधारण मनुष्य भी महान दिव्य अस्तित्व बन सकता है, और तभी मैंने जाना कि जीवन वास्तव में सार्थक है।
साधना शुरू करने के बाद मैं मानो बिल्कुल नया व्यक्ति बन गया। संसार के प्रति मेरा दृष्टिकोण बदल गया और हर दिन आनंद से भरने लगा। जब भी समय मिलता, मैं समूह के साथ अभ्यास करता। छुट्टी के दिनों में पार्क जाकर लोगों तक दाफा का परिचय कराता। मधुर अभ्यास-संगीत, सुनहरे दाफा बैनर और अभ्यासियों के प्रसन्न एवं मैत्रीपूर्ण चेहरे देखकर मुझे लगता था कि मैं पृथ्वी के एकमात्र पवित्र स्थान पर हूँ। साधना के पहले दो वर्ष मेरे जीवन के सबसे सुंदर वर्ष थे।
इसी दौरान मेरे शरीर का भी शुद्धिकरण हुआ। एक दिन शहर लौटते समय शटल बस में मुझे अपने गले में हल्की गुदगुदी और मीठी-सी अनुभूति हुई। जैसे ही मैं बस से उतरा, मुझे ताज़ा खून की काफी मात्रा खाँसी के साथ निकलने लगी। आश्चर्य की बात यह थी कि मुझे न तो भय लगा और न ही कोई असुविधा हुई। मैंने समझ लिया कि मास्टरजी मेरा शरीर शुद्ध कर रहे हैं, संभवतः ब्रोंकिएक्टेसिस की वह समस्या भी, जो शल्य-चिकित्सा के बाद भी ठीक नहीं हुई थी। मेरा हृदय कृतज्ञता और आनंद से भर गया।
कभी-कभी मुझे अपने निचले पेट में सुखद और आरामदायक गर्माहट महसूस होती थी। मुझे पता था कि फालुन (सिद्धांत चक्र) मेरे उदर क्षेत्र को समायोजित कर रहा है। कुछ समय बाद मेरा गैस्ट्रोएंटेराइटिस पूरी तरह ठीक हो गया। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात यह थी कि मेरी सूँघने की शक्ति वापस आ गई। बचपन में साइनस की समस्या के कारण मैंने यह क्षमता खो दी थी, और दो शल्य-चिकित्साओं के बाद भी वह वापस नहीं आई थी।
इसके लिए मैं मास्टरजी के प्रति असीम कृतज्ञ हूँ।
परिवार के सदस्य का कैंसर गायब हो गया
नवंबर 2013 में मेरी सास के छोटे भाई, लियांग, नियमित स्वास्थ्य जाँच के लिए अस्पताल गए। जाँच में उनके अन्नप्रणाली (इसोफेगस) के मध्य भाग में गाँठ जैसी संरचना दिखाई दी। बायोप्सी के बाद डॉक्टरों ने उन्हें अन्नप्रणाली का कैंसर बताया और तुरंत शल्य-चिकित्सा कराने की सलाह दी, जिसका खर्च लगभग एक लाख युआन बताया गया।
यह समाचार सुनकर मैंने लियांग और उनके परिवार को सांत्वना दी तथा सुझाव दिया कि वे उस नगर के अस्पताल में उपचार कराएँ जहाँ मैं अपने परिवार के साथ रहता था। मैंने उनके भर्ती होने की सभी औपचारिकताओं में सहायता की और उसी शाम उन्हें अपने घर ले आया।
उस रात मैंने उन्हें शेन युन का एक प्रदर्शन दिखाया और फालुन दाफा के बारे में सत्य बताया। मैंने उन्हें यह भी समझाया कि वे श्रद्धापूर्वक ये शुभ वाक्य दोहराएँ—“फालुन दाफा अच्छा है, सत्य-करुणा-सहनशीलता अच्छी है।” लियांग ने मुझ पर विश्वास किया और प्रतिदिन पूरे मन से इन वाक्यों का पाठ करने लगे।
दो दिन बाद उनकी फिर से गैस्ट्रोस्कोपी की गई। गाँठ अभी भी दिखाई दे रही थी, लेकिन नई बायोप्सी में कैंसर की एक भी कोशिका नहीं मिली। उपचार कर रहे चिकित्सक को लगा कि शायद काउंटी अस्पताल की पहली बायोप्सी गलत थी। इसलिए उन्होंने लियांग के परिवार से पुराना बायोप्सी नमूना मँगवाकर दोबारा जाँच कराई। नगर के अस्पताल ने उस नमूने की पुनः जाँच की और मूल निदान—अन्नप्रणाली के कैंसर—की पुष्टि कर दी।
डॉक्टर इस परिणाम पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने लियांग को अस्पताल से छुट्टी देते हुए एक महीने बाद पुनः जाँच के लिए आने को कहा।
घर लौटने के बाद भी लियांग प्रतिदिन उन शुभ वाक्यों का पाठ करते रहे। एक महीने बाद जब वे पुनः जाँच कराने गए, तब भी कैंसर की कोई कोशिका नहीं मिली। यह देखकर उनका मनोबल बहुत बढ़ गया।
पूरा परिवार फालुन दाफा की चमत्कारी शक्ति से अत्यंत प्रभावित हुआ और लियांग का जीवन बचाने के लिए मास्टरजी के प्रति गहरी कृतज्ञता से भर गया। लियांग के पुत्र और पुत्रवधू ने भी दाफा के बारे में सत्य जाना और सीसीपी तथा उससे संबद्ध संगठनों की सदस्यता छोड़ दी।
महाप्रबंधक: “यदि हर कोई फालुन दाफा का अभ्यास करे, तो दुनिया एक बेहतर जगह बन जाएगी”
मैं अपनी कंपनी में एक विभागीय प्रबंधक हूँ और मध्य-स्तरीय प्रबंधन की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाता हूँ। मैं सत्य-करुणा-सहनशीलता के सिद्धांतों का पालन करते हुए पूरी लगन से कार्य करता हूँ, बिना किसी शिकायत के, ताकि दूसरों के लिए एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर सकूँ।
मैं यश और व्यक्तिगत लाभ को हल्के में लेता हूँ। मैंने कभी भी ग्राहकों से उपहार या उपहार-कार्ड स्वीकार नहीं किए। यदि किसी अवसर पर मेरी अनुपस्थिति में कोई उपहार भेज दिया जाता और मैं उसे लौटाने में असमर्थ होता, तो बाद में किसी न किसी तरीके से उसकी भरपाई कर देता। एक दाफा अभ्यासी के रूप में मेरे आचरण और चरित्र की मेरे शाखा कार्यालय तथा मुख्यालय—दोनों के वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रशंसा की।
2014 की शुरुआत में मुझे एक महत्वपूर्ण सूचना-प्रौद्योगिकी परियोजना का नेतृत्व सौंपा गया। इसका उद्देश्य एक उन्नत मैन्युफैक्चरिंग एक्जीक्यूशन सिस्टम विकसित करना था, जिससे सामग्री और भंडार की ट्रेसबिलिटी बेहतर हो, गुणवत्ता में सुधार आए तथा लागत प्रबंधन अधिक प्रभावी बने।
कुशल सॉफ्टवेयर डेवलपरों की भारी कमी के कारण मुझे लगभग पूरी परियोजना स्वयं ही पूरी करनी पड़ी। यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी। लेकिन मैंने अपनी मानसिकता को सही रखा और न तो पीछे हटा, न ही कोई शिकायत की।
परियोजना के डिज़ाइन चरण में मैं अक्सर प्रतिदिन दस घंटे से भी अधिक समय कंप्यूटर के सामने बैठकर योजना बनाने और विभिन्न संभावनाओं का परीक्षण करने में बिताता था। आश्चर्यजनक रूप से, पूरे समय मैं ऊर्जावान और स्वस्थ बना रहा। कई बार जब मुझे लगता कि अब कोई नया विचार नहीं बचा, तभी अचानक नई प्रेरणा मिल जाती।
एक वर्ष से अधिक के कठिन परिश्रम के बाद, मार्च 2015 में परियोजना का वास्तविक समय में परीक्षण और डिबगिंग शुरू हुई। बाद में इसमें कई अतिरिक्त प्रबंधन सुविधाएँ भी जोड़ी गईं। इस प्रणाली ने कंपनी के प्रबंधन की गुणवत्ता और प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय सुधार किया तथा ग्राहकों और कर्मचारियों—दोनों से सर्वसम्मत प्रशंसा प्राप्त की। कम लागत में उच्च गुणवत्ता के कारण इस परियोजना को विशेष रूप से सराहा गया।
जब कंपनी के अध्यक्ष ने मेरे बारे में मेरे महाप्रबंधक से पूछा, तो उन्होंने कहा: “यदि हर कोई फालुन दाफा का अभ्यास करे, तो दुनिया एक बेहतर जगह बन जाएगी।”
दाफा का एक चमत्कार अपनी आँखों से देखना
लगभग दो वर्ष पहले की बात है। शाम 6 बजे सद्विचार भेजने के बाद मैं थोड़ी देर के लिए झपकी लेने लगा। आधी नींद की अवस्था में मैंने स्वयं को बिस्तर पर लेटे हुए देखा। तभी मैंने मास्टरजी की आवाज़ सुनी, “दर्द नहीं होगा।”
मैंने देखा कि मास्टरजी ने मेरे सिर के पीछे का भाग खोल दिया और ब्रश जैसे एक उपकरण से उसमें मौजूद छोटी-छोटी कीड़ों जैसी वस्तुओं को साफ करने लगे। मुझे बिल्कुल भी दर्द नहीं हुआ। इसके विपरीत, मुझे केवल ठंडक और अत्यंत आरामदायक अनुभूति हो रही थी। यह सब कुछ थोड़ी ही देर चला, और फिर मैं अचानक जाग गया। मैंने अपने सिर के पीछे हाथ लगाकर देखा—सब कुछ बिल्कुल सामान्य था।
अगले दिन मेरी छुट्टी थी, इसलिए मैं कार से शहर के बाहर एक साथी अभ्यासी से मिलने गया। लौटते समय मुझे आश्चर्य हुआ कि दोपहर में झपकी न लेने के बावजूद मुझे बिल्कुल भी नींद नहीं आ रही थी, जबकि पहले ऐसा कभी नहीं होता था। साथ ही, मेरे सिर के पीछे हल्की गर्माहट भी महसूस हो रही थी। पहले यदि मैं दोपहर की नियमित झपकी न लेता, तो गाड़ी चलाते समय मुझे अवश्य कहीं रुककर आराम करना पड़ता था।
घर लौटने के बाद भी मेरे भीतर भरपूर ऊर्जा थी। मैंने दूसरा अभ्यास पूरे एक घंटे तक किया। अभ्यास के दौरान मुझे महसूस हुआ कि मेरे सिर के पीछे से निकलती हुई गर्माहट धीरे-धीरे शरीर के ऊपरी हिस्से में फैल रही है। मेरा मन अत्यंत शांत और स्पष्ट था, और जैसे-जैसे अभ्यास आगे बढ़ा, मैं स्वयं को और अधिक ऊर्जावान महसूस करने लगा।
यह मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था। पहले तो आधा घंटा अभ्यास करने पर भी मुझे अक्सर नींद और चक्कर आने लगते थे। लेकिन उस दिन आधी रात के बाद तक भी मैं पूरी तरह सतर्क था, और सिर के पीछे की गर्माहट बनी हुई थी।
उसी क्षण मुझे समझ में आया कि मास्टरजी ने मेरे मस्तिष्क से कर्म का शुद्धिकरण किया था। यह आनंदमय अवस्था लगातार तीन दिनों तक बनी रही।
धन्यवाद, मास्टरजी!
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