(Minghui.org) हर वर्ष मैं अपने समुदाय के साथ 4 जुलाई (स्वतंत्रता दिवस) का उत्सव मनाता हूँ। संगीत, स्वादिष्ट भोजन और आतिशबाज़ी—ये सब छोटे-बड़े सभी लोगों के लिए आनंद और विश्राम का अवसर बनते हैं।

जैसे-जैसे अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ निकट आ रही है, मैं इस बार और भी भव्य उत्सव की अपेक्षा कर रहा हूँ। पृथ्वी के दूसरे छोर से आए एक व्यक्ति के रूप में, मैं इस परंपरा को और भी अधिक संजोता हूँ, क्योंकि अमेरिका में जिन स्वतंत्रताओं का हम आनंद लेते हैं, वे साम्यवादी चीन में उपलब्ध नहीं हैं।

आस्था पर आधारित एक राष्ट्र

संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना स्वतंत्रता, स्वाधीनता और ईश्वर के प्रति श्रद्धा जैसे आदर्शों पर हुई थी। ये मूलभूत मूल्य मेफ्लावर की ऐतिहासिक समुद्री यात्रा से लेकर स्वतंत्रता की घोषणा तक, संस्थापक नेताओं के विचारों से लेकर पिछले ढाई सौ वर्षों में विश्व को दिए गए उसके योगदान तक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

सन 1620 में मेफ्लावर की यात्रा केवल समुद्र पार करने की कहानी नहीं थी, बल्कि अस्तित्व की रक्षा का संघर्ष भी थी। पिलग्रिम धार्मिक स्वतंत्रता की खोज में इस कठिन यात्रा पर निकले थे। वे अपने जीवन को ईश्वरीय कृपा और संरक्षण के दृष्टिकोण से देखते थे। मेफ्लावर कॉम्पैक्ट ने जहाज़ के सभी 102 यात्रियों—चाहे वे धार्मिक हों या न हों—को एक संगठित नागरिक समाज के रूप में एकजुट किया।

अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने ब्रुकलिन से बच निकलने की घटना से लेकर डेलावेयर नदी पार करने तक अनेक ऐसे अनुभव किए, जिन्हें वे ईश्वरीय चमत्कार मानते थे। अपने भाषणों में वे अक्सर "दैवीय व्यवस्था" जैसे शब्दों का प्रयोग करते थे।

सन 1796 में अपने विदाई भाषण में उन्होंने कहा: "राजनीतिक समृद्धि की ओर ले जाने वाले सभी स्वभावों और आदतों में धर्म और नैतिकता अपरिहार्य आधार हैं।"

अमेरिका के दूसरे राष्ट्रपति जॉन एडम्स ने लिखा: "हमारा संविधान केवल एक नैतिक और धार्मिक समाज के लिए बनाया गया है। किसी अन्य प्रकार के समाज के शासन के लिए यह पूरी तरह अपर्याप्त है।"

संस्थापक नेताओं का विश्वास था कि नैतिक अधिकार का सर्वोच्च स्रोत सरकार नहीं, बल्कि ईश्वर है। इसी विचार को उन्होंने स्वतंत्रता की घोषणा में इन शब्दों में व्यक्त किया:

"हम इन सत्यों को स्वयं-सिद्ध मानते हैं कि सभी मनुष्य समान बनाए गए हैं; उन्हें उनके सृष्टिकर्ता द्वारा कुछ ऐसे अविच्छेद्य अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिनमें जीवन, स्वतंत्रता और सुख की खोज का अधिकार शामिल है।"

समुद्र के उस पार एक स्पष्ट विरोधाभास

पूरे इतिहास में चीनी सभ्यता में ईश्वर और दिव्य शक्तियों के प्रति गहरी श्रद्धा रही है। इसका प्रमाण पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे ऐसे कहावतों में मिलता है, जैसे—"सिर से तीन फ़ुट ऊपर देवता तुम्हें देख रहे हैं" और "योजना मनुष्य बनाता है, लेकिन परिणाम स्वर्ग के हाथ में होता है।" ये पारंपरिक मान्यताएँ समाज की नैतिक नींव को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।

लेकिन आज का चीन बिल्कुल अलग है। 1949 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के सत्ता में आने के बाद, उसने अपनी नास्तिक विचारधारा को ज़बरदस्ती कई पीढ़ियों पर थोप दिया और किसी भी उच्च शक्ति में विश्वास को "अंधविश्वास" कहकर खारिज कर दिया। जहाँ पारंपरिक चीनी मान्यताएँ लोगों को नैतिक रूप से उन्नत होने और प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहने की प्रेरणा देती थीं, वहीं माओ ज़ेदोंग ने "आकाश, धरती और मनुष्य से संघर्ष करने" में "असीम आनंद" बताया।

इस विचारधारा ने अनेक विनाशकारी परिणाम उत्पन्न किए। ज़मींदारों के विरुद्ध चलाए गए रक्तरंजित राजनीतिक अभियानों से लेकर महान अकाल तक, जो मानव-निर्मित त्रासदी थी और जिसमें करोड़ों लोगों की जान चली गई। इसके बाद सीसीपी ने सांस्कृतिक क्रांति शुरू की, जिसका उद्देश्य पारंपरिक चीनी संस्कृति को पूरी तरह समाप्त करना था। ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट किया गया, पारंपरिक नैतिक मूल्यों को त्याग दिया गया, और यहाँ तक कि परिवार के सदस्यों को भी एक-दूसरे के विरुद्ध भड़काया गया। धर्मग्रंथ जला दिए गए, भिक्षुओं और भिक्षुणियों को जबरन गृहस्थ जीवन में लौटने पर मजबूर किया गया, और नैतिकता तथा आस्था लगभग मिटा दी गई।

जो लोग यह आशा कर रहे थे कि अंततः चीन में स्वतंत्रता और आज़ादी आएगी, उनके लिए 1989 का तियानमेन चौक नरसंहार उस आशा पर अंतिम प्रहार सिद्ध हुआ।

आस्था और अंतरात्मा की रक्षा की आवश्यकता

फिर भी, सब कुछ समाप्त नहीं हुआ। 1992 में जब फालुन दाफा का चीन में सार्वजनिक परिचय कराया गया, तो इस अभ्यास ने लगभग 10 करोड़ लोगों को अधिक नैतिक जीवन जीने और दिव्य सत्ता में अपना विश्वास पुनः प्राप्त करने की प्रेरणा दी। सत्य-करुणा-सहनशीलता के सिद्धांतों पर आधारित फालुन दाफा ने न केवल अभ्यासियों के मन और शरीर को लाभ पहुँचाया, बल्कि पूरे समाज के लिए भी सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न किया। 1998 में चीन के राज्य खेल ब्यूरो द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 97.9% फालुन दाफा अभ्यासियों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ, जबकि 77.5% लोग अपनी बीमारी या अन्य शारीरिक समस्याओं से पूरी तरह स्वस्थ हो गए।

फालुन दाफा की बढ़ती लोकप्रियता, जो सीसीपी के नियंत्रण से बाहर थी, को देखकर सीसीपी ने जुलाई 1999 में फालुन दाफा को समाप्त करने के उद्देश्य से राष्ट्रव्यापी उत्पीड़न शुरू कर दिया।

उस समय के सीसीपी नेता जियांग ज़ेमिन ने घोषणा की कि वह तीन महीनों के भीतर फालुन दाफा का सफाया कर देगा। बाद में उसने आदेश दिया कि अभ्यासियों की "प्रतिष्ठा नष्ट कर दो, उन्हें आर्थिक रूप से बर्बाद कर दो, और शारीरिक रूप से समाप्त कर दो।"

पिछले 27 वर्षों से सीसीपी व्यवस्थित रूप से इसी नीति को लागू कर रही है। अपने विशाल सरकारी प्रचार तंत्र का उपयोग करके उसने चीन के भीतर और बाहर फालुन दाफा को बदनाम करने के लिए असंख्य झूठ गढ़े हैं।

गिरफ्तारी, हिरासत और कारावास के अतिरिक्त, चीन में अभ्यासियों को प्रताड़ित किया गया, जबरन श्रम कराया गया, और यहाँ तक कि जबरन अंग निकाले जाने  जैसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का भी सामना करना पड़ा। इस उत्पीड़न के कारण हजारों अभ्यासियों की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है, जबकि वास्तविक संख्या संभवतः इससे कहीं अधिक है।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने लिखा था: "कहीं भी होने वाला अन्याय, हर जगह न्याय के लिए खतरा है।"

जैसे-जैसे सीसीपी अपना धार्मिक उत्पीड़न विदेशों तक फैलाने तथा समाचार माध्यमों में हेरफेर और कानूनी मुकदमों के माध्यम से फालुन दाफा को निशाना बनाने का प्रयास कर रही है, वैसे-वैसे स्वतंत्र समाजों के लिए उसका खतरा पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।

दशकों से संयुक्त राज्य अमेरिका विश्वभर में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। 1998 में अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम  पारित करते समय अमेरिकी कांग्रेस ने लिखा:

"धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका की उत्पत्ति और अस्तित्व का मूल आधार है... अपनी स्थापना से लेकर आज तक, संयुक्त राज्य अमेरिका ने धार्मिक स्वतंत्रता की इस विरासत को अत्यंत महत्व दिया है और धार्मिक उत्पीड़न से पीड़ित लोगों को शरण देकर इस परंपरा का सम्मान किया है।"

यदि अमेरिका अपने संस्थापकों की उस दूरदर्शिता का अनुसरण करता रहे और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता रहे, तो यह उसके निरंतर विकास और समृद्धि का आधार बना रहेगा। जब आस्था और अंतरात्मा पर आक्रमण किया जाता है, तब उन मूलभूत स्वतंत्रताओं की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है, जिन पर इस राष्ट्र की स्थापना हुई थी।