(Minghui.org)  इस वर्ष फ़ा का स्मरण करते समय, मैंने निरंतर यह अनुभव किया कि मेरी कुछ पूर्वधारणाएँ धीरे-धीरे विलीन हो रही हैं, मेरा चरित्र उन्नत हो रहा है और मेरी मानसिकता अधिक स्थिर हो रही है। यहाँ, मैं अपने इस परिवर्तन को साझा करना चाहता हूँ।

जब  मैं फ़ा पढ़ता हूँ, तो कुछ अनुच्छेद सतही रूप से आसानी से समझ में आ जाते हैं। लेकिन उन्हें याद करने से मुझे फ़ा की गहरी समझ प्राप्त हुई, और इसके अधिक गूढ़ पहलू धीरे-धीरे मेरे सामने प्रकट हुए। मुझे पहले से अनदेखी धारणाओं के बारे में भी अधिक जागरूकता हुई।

बाद में, मैंने दाफा में “सरल सत्य और सरल शब्द” वाक्यांश की गहन बुद्धिमत्ता को और अधिक समझा। जब हम पूर्वाग्रहों से मुक्त होते हैं, तो केवल उनके शाब्दिक अर्थ को पढ़कर ही हम फ़ा के कई सिद्धांतों को समझ सकते हैं।

मैंने यह महसूस किया कि फ़ा हमेशा से मौजूद रहा है, लेकिन यदि हम इसे एकाग्रता के बिना पढ़ते हैं या उन अर्जित धारणाओं से बाधित होते हैं जिनसे हम अनजान हैं या जिन्हें छोड़ने से इंकार करते हैं, तो हम इसके उच्च स्तर के सिद्धांतों को समझ नहीं सकते।

मास्टर ली ने कहा, “जितने अधिक निम्न स्तर के चीगोंग पाठ आपने लिए हैं और उनसे जितना अधिक आपने आत्मसात किया है, उतना ही अधिक आपको नुकसान होगा—आपका शरीर पहले से ही बिगड़ा हुआ है।” (प्रथम व्याख्यान, जुआन फालुन )।

 मैं समझता हूँ कि हम इन निम्न स्तर की अवधारणाओं, जैसे मानवीय विधियों और सिद्धांतों को जितना अधिक आत्मसात करते हैं, वे हमारे मन में एक मानसिकता का निर्माण करते हैं, और फिर हमें और अधिक मजबूती से नियंत्रित और प्रभावित करते हैं। हमने वर्षों से इन्हें स्वीकार किया है और संचित किया है, और हमारा मन इनके लिए अभ्यस्त हो गया है, जैसे 1+1=2। अभ्यासी होने के नाते, हमें इन स्वयंसिद्ध सिद्धांतों से ऊपर उठना चाहिए और अर्जित धारणाओं के प्रभाव से स्वयं को मुक्त करना चाहिए।

बीमारी के बारे में हमारी समझ को बदलना

मैं बीमारी को एक वास्तविक, मूर्त अवस्था मानता था। मेरी समझ इस विचार तक सीमित थी कि अभ्यासियों को कोई बीमारी नहीं होती और मैं रोग कर्मो के लक्षणों को वास्तविक रोग नहीं मानता था। मास्टरजी ने 1997 में न्यूयॉर्क शहर में दिए गए फा प्रवचन में रोग कर्मो से संबंधित फा सिद्धांतों के बारे में बात की थी । जब मैंने इस प्रवचन को दोबारा सुना, तो मुझे एहसास हुआ कि "बीमारी" शब्द ही एक अवधारणा है जिसे हम सीखते हैं। अभ्यासियों के लिए, "रोग" की अवधारणा का कोई अस्तित्व नहीं है। अभ्यासी के ऊर्जा क्षेत्र में रोग -कर्म का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। जिन अभ्यासियों के पास गोंग होता है, उनके पास ची (ऊर्जा) नहीं होती, रोग तो दूर की बात है।

साधना करने वालों को कभी-कभी सिरदर्द और बुखार जैसे लक्षण महसूस होते हैं, जो असल में बीमारियाँ नहीं होतीं। यदि साधना करने वाला इन स्थितियों का आकलन करने के लिए मानवीय, अर्जित धारणाओं का उपयोग करता है, तो उसके निष्कर्ष सामान्य तर्क पर आधारित होंगे, जैसे कि शरीर का उच्च तापमान बुखार का संकेत है; गर्मी में चिलचिलाती धूप में खड़े रहने से बेचैनी होती है और लू लगने का खतरा रहता है; पास में किसी के छींकने से बैक्टीरिया और वायरस फैलते हैं; ठंड के मौसम में पर्याप्त कपड़े न पहनने से सर्दी लग सकती है।

कारण-परिणाम का यह तर्क आपको अवचेतन रूप से स्थितियों का आकलन मानवीय सामान्य ज्ञान के आधार पर करने के लिए प्रेरित करता है। आप जितना अधिक इन मानवीय धारणाओं पर निर्भर रहते हैं और उन्हें आत्मसात करते हैं, उतना ही वे आपके साथ बनी रहती हैं और आपके निर्णय को प्रभावित करती हैं। आप स्वाभाविक रूप से मानवीय अनुभवों और सोच पर निर्भर रहेंगे। हालांकि, साधना का अर्थ है सामान्यता से मुक्त होना, अर्जित धारणाओं से छुटकारा पाना, कर्मों का नाश करना और उत्थान करना।

मानवीय धारणाओं को तोड़ना

मुझे एहसास हुआ कि जब हम कुछ कहते हैं, किसी चीज़ के प्रति कोई दृष्टिकोण अपनाते हैं, या किसी व्यक्ति के बारे में कोई राय बनाते हैं, तो हम अक्सर उसमें मानवीय धारणाएँ जोड़ लेते हैं। उस समय, हम चीजों को "अच्छे और बुरे में अंतर करने के सच्चे मापदंड" ("बुद्ध प्रकृति,"जुआन फालुन, खंड II ) से नहीं माप रहे होते हैं। ये धारणाएँ हमें प्रभावित करती हैं और विचार कर्म का निर्माण करती हैं।

इस घटना को समझने के बाद, मैं ऐसे विचारों के स्रोत को पहचान या समझ सका। उदाहरण के लिए, पहले जब मैं गाड़ी चला रहा होता था और अचानक कोई पैदल यात्री या इलेक्ट्रिक बाइक मेरी गाड़ी के सामने आ जाती थी, तो मैं तुरंत सोचता था कि वे इतनी तेज़ी से क्यों भाग रहे हैं या इतनी जल्दी क्यों जा रहे हैं। अब मुझे समझ में आया कि यह विचार इस सोच से उपजा है कि मैं बिना किसी अप्रत्याशित घटना के आराम से जीवन जीना चाहता हूँ। अपने सहकर्मियों से बातचीत करते समय, मैं अक्सर अनजाने में उनकी बातों से सहमत हो जाता था, भले ही वे एक अभ्यासी के मानकों पर खरी न उतरती हों।

मुझे एहसास हुआ कि मैं टकराव से बचने के लिए दूसरों के साथ सतही सामंजस्य और उनकी स्वीकृति पाने की कोशिश करता था। भारी बारिश के दौरान, जब मैं गाड़ी चला रहा होता था और लोगों को साइकिल चलाते हुए संघर्ष करते देखता था, तो मुझे लगता था कि काश मेरे पास कार होती और गाड़ी चलाना ज़्यादा आरामदायक होता। यह बेहतर चीज़ों की मेरी चाहत और दूसरों से आगे निकलने की इच्छा को दर्शाता था। जब मैं ऑनलाइन या किसी किताब में कुछ अच्छा पढ़ता था, तो मैं उसे दूसरों के साथ साझा करना चाहता था क्योंकि वह मेरे अपने विचारों से मेल खाता था। दरअसल, आम लोगों की लिखी बातें पहली नज़र में सही लग सकती हैं, लेकिन गहराई से देखने पर अक्सर उनमें जटिल कारक और लगाव छिपे होते हैं। वे मेरे विचारों को संतुष्ट करते थे, इसलिए मैं उन्हें अच्छी तरह से कही गई या ज्ञानवर्धक बातें मान लेता था।

मानवीय धारणाएँ अवचेतन रूप से हमें प्रभावित करती हैं। हालाँकि मेरे विचार साधारण और हानिरहित प्रतीत होते थे, वे मेरे वास्तविक स्वरूप से नहीं, बल्कि अर्जित धारणाओं से उत्पन्न हुए थे। इन विचारों ने मेरी सोच को नियंत्रित किया और मुझे चीजों का आकलन करने के लिए इन पर निर्भर रहने के लिए प्रेरित किया। फिर भी, मैंने गलती से यह मान लिया कि ये धारणाएँ मेरे मूल्यों को दर्शाती हैं, और मैंने इन्हें स्वाभाविक रूप से स्वीकार कर लिया।

मैंने गौर किया है कि मेरे मन में लगातार तरह-तरह के विचार आते रहते हैं। जब मैंने उनका गहराई से विश्लेषण किया, तो पाया कि वे विभिन्न धारणाओं से उत्पन्न होते हैं और विचार कर्म का निर्माण करते हैं, जो मेरी साधना को प्रभावित करता है। जब हम अनजाने में इन धारणाओं का उपयोग किसी स्थिति का आकलन करने या किसी विषय पर विचार करने के लिए करते हैं, तो हम आसानी से कर्म उत्पन्न कर लेते हैं। इसके अलावा, धारणाओं से चिपके रहने से एक भ्रम पैदा होता है कि जो हम समझते हैं वह सही है, जबकि दूसरे लोग सही दृष्टिकोण को समझने में असफल रहे हैं। यह हमें अपनी आदतों में फंसाए रखता है और सूक्ष्म धारणाओं द्वारा निर्देशित करता है। केवल अपने चरित्र में सुधार और अपनी सोच में परिवर्तन करके ही ऐसे कर्म और बाधाओं को दूर किया जा सकता है।

ऊपर दिए गए बिंदु मेरी वर्तमान समझ के कुछ अंश हैं। कृपया उन बिंदुओं को इंगित करें जो फा के अनुरूप नहीं हैं।