(Minghui.org) जब मैं लोगों को दाफा के बारे में सच्चाई स्पष्ट कर रही थी, तब मेरी मुलाकात एक बुजुर्ग अभ्यासी से हुई। उन्होंने मुझे अपने पति के साथ चल रही कठिनाइयों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उनके पति उनकी साधना में हस्तक्षेप करते थे। जब वे फ़ा का अध्ययन करतीं, तो कभी उनके हाथ से पुस्तक छीन लेते, या जब वे अभ्यास करतीं, तो उनका एमपी3 प्लेयर छीन लेते। एक बार जब उनके पति ने उनसे ज़ुआन फालुन की प्रति छीनने की कोशिश की, तो झड़प में उनकी बाईं आँख घायल हो गई। उनके पति उन्हें धमकी देते थे कि वे स्थानीय पुलिस स्टेशन में उनकी शिकायत करके उन्हें कुछ वर्षों के लिए जेल भिजवा देंगे और फिर उनसे तलाक ले लेंगे। यह बताते समय वे बहुत उदास लग रही थीं। मैंने भी इसी तरह की पारिवारिक परीक्षाओं का सामना किया था। मैंने उनसे कहा, “आपको अपना मन स्थिर रखना चाहिए। मन में नाराजगी या अन्याय की भावना न रखें—इसके बजाय अपने परिवार के प्रति आसक्तियों को दूर करें।”
मैंने उन्हें अपना अनुभव बताया: “जब मैं पारिवारिक परीक्षा से गुजर रही थी, तब मुझे बहुत संघर्ष करना पड़ा, क्योंकि मैं बहुत-सी मानवीय आसक्तियों को पकड़े हुए थी। बाद में, फ़ा का अध्ययन करने, मिंगहुई वेबसाइट पर साथी अभ्यायियों के लेख पढ़ने, अन्य अभ्यायियों के साथ समस्याओं पर चर्चा करने और लगातार अंतर्मन की ओर देखने के माध्यम से मैंने धीरे-धीरे अपनी मानसिकता बदल ली। मुझे एहसास हुआ कि मेरे पति का व्यवहार मेरी मानवीय आसक्तियों से उत्पन्न हुआ था। वास्तव में, वे मेरी साधना के लिए एक सीढ़ी उपलब्ध कराने की भूमिका निभा रहे थे। वे वास्तव में मेरी मदद कर रहे थे और मुझे उनके प्रति आभारी होना चाहिए था। जैसे ही मैंने उनके प्रति अपनी नाराजगी छोड़ दी, उनकी आँखों का भाव बदल गया और उनका रवैया भी बेहतर हो गया। मैं उनके स्वाद के अनुसार भोजन बनाती और वे इस बात पर जोर देते कि मैं भी वही भोजन खाऊँ, जो पहले कभी नहीं हुआ था। जब आप वास्तव में जीवन और मृत्यु के प्रति अपनी आसक्ति को छोड़ देती हैं और फ़ा में दृढ़ रहती हैं, तो आपके पति आपको पुलिस में शिकायत करने की धमकी नहीं देंगे। जब वे परेशानी पैदा करें, तो उनसे बहस करने के बजाय सद्विचार भेजें।”
मेरी और उस अभ्यासी की बहुत घनिष्ठता नहीं थी, लेकिन उन्होंने मेरे साथ अपनी परीक्षा साझा की। इसलिए मुझे लगा कि मास्टरजी ने मुझे अपने अनुभव साझा करने और उनकी बाधा पार करने में मदद करने का अवसर देने के लिए इस परिस्थिति की व्यवस्था की थी। साधना वास्तव में अंतर्मन में देखने और स्वयं को साधने के बारे में है।
मैं एक वरिष्ठ अभ्यासी के साथ बातचीत का एक और अनुभव साझा करना चाहती हूँ। हमारे फ़ा-अध्ययन समूह में एक बुजुर्ग अभ्यासी थीं, जो बहुत सक्षम, अच्छी वक्ता और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली थीं। पहले वे अपने परिवार का व्यवसाय संभालती थीं। उस समय मैं अभी-अभी साधना में वापस लौटी थी और हम कम्युनिस्ट पार्टी पर नौ टिप्पणियाँ की प्रतियाँ तैयार कर रहे थे तथा सच्चाई स्पष्ट करने वाली डीवीडी बना रहे थे। मैं उनके शब्दों और कार्यों से बहुत प्रभावित थी और वर्षों के दौरान उनके प्रति मेरे मन में एक आसक्ति विकसित हो गई—मैं उनकी प्रशंसा करने और उन पर निर्भर रहने लगी।
कोविड महामारी के दौरान मैं उनके घर पर फ़ा-अध्ययन के लिए नहीं जा सकी, क्योंकि उनके परिवार के गैर-अभ्यासी सदस्य नहीं चाहते थे कि बाहर के लोग घर आएँ। तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं उन पर निर्भर हो गई थी। उनके घर जाकर फ़ा का अध्ययन न कर पाने की कल्पना से ही मैं व्यथित हो जाती थी।
मैंने स्वयं से कहा, “मैं घर पर भी उतनी ही अच्छी तरह फ़ा का अध्ययन कर सकती हूँ। जो व्यथित है, वह मेरा वास्तविक स्व नहीं है।” अंततः घर पर फ़ा का अध्ययन करने को लेकर मेरी व्याकुलता समाप्त हो गई। महामारी कम होने के बाद उन्होंने साथी अभ्यायियों को फिर से अपने घर पर फ़ा-अध्ययन के लिए आमंत्रित किया।
बाद में मुझे महसूस हुआ कि वे लगातार बोलती रहती थीं और बातचीत पर अपना प्रभुत्व बनाए रखती थीं। उनकी कुछ बातें फ़ा के अनुरूप भी नहीं थीं। वे लंबे समय से बाहर जाकर लोगों को दाफा के बारे में सच्चाई स्पष्ट करने नहीं गई थीं और जब मैं उनसे इस बारे में बात करने की कोशिश करती, तो वे सुनती नहीं थीं। जब मैं उनके घर जाती, तो मुझे लगता जैसे कोई अदृश्य शक्ति मुझे दबा रही हो, जिसके कारण मुझे फ़ा याद नहीं आता था और न ही मैं उचित ढंग से प्रतिक्रिया दे पाती थी।
मैंने कारण खोजने के लिए अंतर्मन में देखा और महसूस किया कि यह उनके प्रति मेरी प्रशंसा की आसक्ति थी, क्योंकि मैं उन्हें बहुत सक्षम मानती थी। मुझे इस आसक्ति को दूर करना था। मैंने उनसे कहा कि मैं कुछ समय के लिए समूह छोड़ रही हूँ ताकि स्वयं को समायोजित कर सकूँ, अंतर्मन की ओर देख सकूँ और अपनी मानवीय आसक्तियों को दूर कर सकूँ।
कुछ महीनों बाद मुझे लगा कि एक ही आवासीय परिसर में रहना हमारे बीच एक पूर्वनिर्धारित संबंध है और चूँकि उन्होंने पहले मुझे एक पारिवारिक परीक्षा पार करने में मदद की थी, इसलिए मुझे फिर से उनके घर जाकर फ़ा का अध्ययन करना चाहिए। जब मैं वापस गई, तो पहले जैसा दबाव महसूस नहीं हुआ। हमने बहुत कम बातचीत की और अपना ध्यान फ़ा के अध्ययन पर रखा। मुझे पता था कि मैंने अपनी आसक्ति छोड़ दी थी।
मुझे एहसास हुआ कि जो कुछ मैं देखती हूँ या जिसका सामना करती हूँ, वह संयोग से नहीं होता। हर चीज़ की व्यवस्था मास्टरजी ने मेरी उन्नति में सहायता करने के लिए की है। जब मैं वास्तव में भीतर की ओर देखती हूँ, तो मुझे उन चीजों का पता चलेगा जिन्हें मुझे साधना के माध्यम से सुधारना है और उन मानवीय आसक्तियों का भी, जिन्हें मुझे छोड़ना है। मुझे अपनी मानसिकता बदलनी होगी और हर चीज़ को अपनी साधना की एक सीढ़ी के रूप में देखना होगा।
ये मेरी व्यक्तिगत साधना से प्राप्त कुछ समझ हैं। यदि इनमें से कुछ भी फ़ा के अनुरूप नहीं है, तो कृपया दयापूर्वक इसकी ओर संकेत करें।
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